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लता मंगेशकर: एक सदी की आवाज़

सार

यह लता मंगेशकर ही थीं, जो अपने सैद्धान्तिक आग्रह पर टिकी हुई सिनेमा की उस दुनिया से तब होड़ ले रही थीं, जब उनका करियर अपने सबसे सुनहरे दौर में था और किसी भी तरह का जोखिम लेना उनके काम को खतरे में डाल सकता था। 
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लता मंगेशकर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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लता मंगेशकर जैसी शख़्सियतें बार-बार जन्म नहीं लेतीं। ऐसे लोगों का इस धरती पर आना सोद्देश्य होता है, जो अपना बड़ा रचनात्मक संसार रचने के बाद हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दर्ज़ हो जाते हैं। मेरे जैसा कोई भी लेखक, उनका प्रशंसक या सिनेमा और संगीत की दुनिया का बड़ा विश्लेषक चाहकर भी कुछ शब्दों या पन्नों में उनकी साधना का सारा पक्ष समेट नहीं सकता। आज जब वह भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, ढेरों ऐसी बातें मिसाल की तरह याद आती हैं, जिनके स्मरण से इस बात की पुष्टि होती है कि कलाओं के समाज में अनथक परिश्रम करने वाली जिजीविषा समय और विचारधारा से परे होती है। आज, जब स्त्री विमर्श की बातें हर एक तबके में अधिकार की तरह बरती जाती हैं, यह देखना हैरानी में डालता है कि एक तेरह साल की संघर्षरत लड़की अपने काम को इतना बड़ा बना सकती है कि उसके अवसान पर राष्ट्रीय ध्वज शोक में दो दिन ससम्मान झुका रहे।

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यह हमेशा ही विमर्श का मुद्दा रहेगा कि वे कौन सी बातें थीं, जिनके कारण एक पार्श्वगायिका जीते जी किंवदंती और भारतीय समाज के लिए अपरिहार्य बन गईं। मेरे ख़ुद के जुड़ाव और पिछले 20 साल के सम्बन्ध में एक ज़रूरी चीज़, जो मैंने लता जी के बारे में पाई, वह यह कि किसी भी प्रकार के विवादों से बचकर हमेशा अपनी कला और साधना में एकाग्र बने हुए समर्पित रहना। उनसे बातचीत का कोई भी प्रश्न हमेशा घूम-फिरकर संगीत और अन्ततोगत्वा सिनेमा की दुनिया के परिसर में विस्तृत हो जाता था। कितने ही क़िस्से थे, जो उनसे सुनते हुए इस बात में भरोसा बढ़ाते थे कि एक कलाकार को सिर्फ़ अपनी कला में डूबे रहना चाहिए।

उन्होंने एक प्रश्न के दौरान मुझे यह समझाया था कि कला और राजनीति दो अलग-अलग चीज़ें हैं और एक कलाकार को कभी भी राजनीति में पड़ने से बचना चाहिए। कला का जीवन उदात्त और आनन्द से भरा है, जिसमें ख़ुद को छोटा करके देखने की युक्ति और राजनीति में सफल बनाने वाली पैंतरेबाजी शामिल नहीं है। शायद यही कारण है कि समय-समय पर भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में उन्हें जिसका काम पसन्द आया, उसकी मुक्त कण्ठ सराहना की। यह बात प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू, इन्दिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी से होकर वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक आती है। उन्होंने कभी इस बात का संशय नहीं पाला कि उनके विचार और सामाजिक सरोकार, धार्मिक आस्थाएं व संगीत की दुनिया में उनकी मैत्री और अपनत्व का मूल्यांकन समाज किस तरह करेगा।
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यह लता मंगेशकर ही थीं, जो अपने सैद्धान्तिक आग्रह पर टिकी हुई सिनेमा की उस दुनिया से तब होड़ ले रही थीं, जब उनका करियर अपने सबसे सुनहरे दौर में था और किसी भी तरह का जोखिम लेना उनके काम को खतरे में डाल सकता था। रॉयल्टी के लिए प्रसिद्ध फ़िल्मकार राजकपूर और पार्श्वगायक मो. रफ़ी से विवाद, एक गलतफहमी के चलते संगीतकार ओपी नैयर के साथ मतभेद तथा अपनी उपस्थिति को पुख़्ता करते जाने के जतन में समकालीन गायिकाओं मसलन- मुबारक बेगम, सुमन कल्याणपुर और सुधा मल्होत्रा को अवसर कम मिलने के आरोप, सभी को बड़े संयत भाव से लता ने लिया। उन्होंने ख़ुद के लिए यह कसौटी तय की कि अपने काम को ही बेहतर से बेहतर बनाते हुए उन्हें आम भारतीय दर्शक और श्रोता की नब्ज पकड़नी है, जो उनकी सफलता को चौबीस कैरेट सोने में परिवर्तित करता है।

यह लता ही थीं, जो पुरुषवादी समाज में बड़े गीतकारों को भी यह चुनौती दे सकती थीं कि स्त्री गरिमा के अनुरूप यदि गीतों के बोल वे नहीं लिखते हैं, तो वे गाना नहीं गाएंगी। उन्हीं के इसरार पर यह परिपाटी विकसित हुई कि साहिर लुधियानवी, मजरूह सुलतानपुरी, राजा मेंहदी अली ख़ाँ, कैफ़ी आज़मी और शैलेन्द्र जैसे गीतकार भी रिकॉर्डिंग के समय कोशिश करते थे कि वे स्टूडियो में मौजूद रहें, जिससे यदि लता मंगेशकर को कोई शब्द सटीक नहीं लगता तो उसका फेरबदल किया जा सके।

यह सब बातें आज लिखते हुए भले ही बहुत प्रासंगिक न लगती हों, क्योंकि आधुनिक समय में हमने शब्दों और संगीत के सन्धान में अतिरेक का वरण कर लिया है, मगर इस बात से कौन सहमत नहीं होगा कि यह सब चलन शुरू करने में लता की निर्णायक भूमिका रही। वे सही अर्थों में स्त्री की उन्मुक्तता का सबसे जीवन्त प्रतीक थीं। उनके होने से फ़िल्म निर्माताओं और रेकॉर्ड कम्पनियों को इस बात की सहूलियत मिलती थी कि उनके गाने से फ़िल्म का आर्थिक मुनाफा पक्का है। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि बदलते संगीत के परिदृश्य में, जिसमें लता मंगेशकर के सात दशकों की यात्रा शामिल रही है, संगीत एनालॉग पैटर्न से आगे बढ़कर डिजिटल युग तक चला आया है। स्पूल टेप, 78 आरपीएम के रेकॉर्ड से आगे बढ़कर कैसेट और सीडीज के युग से होते हुए आज हम पुराने गीतों को भी डिजिटली डाउनलोड करते हैं। ऐसे में इतने बदलावों के बाद अगर लता मंगेशकर तकनीकी रूप से सफल और सर्वश्रेष्ठ बनी रहीं तो यह कहीं न कहीं उनकी मेधा और मेहनत का ही परिणाम है।



उन्होंने जो सबसे दिलचस्प बात मुझसे साझा की थी, वह यह कि ढेरों शास्त्रीय घरानों के संगीत को ग़ौर से सुनते हुए और दिग्गज संगीतकारों की सोहबत में संगीत के तकनीकी पक्ष की बारीकियों को सीखते हुए अपने गायन में उन्होंने हर चीज़ को प्रमुखता से स्थान दिया। अनिल विश्वास ने उन्हें गीतों के बीच सांस लेने के चलन का अन्दाज़ सिखाया तो मास्टर गुलाम हैदर ने धुनों और बोलों के बीच स्पष्टता से गायन का मर्म बताया कि कैसे गाते हुए गीतों के अर्थ उभरने चाहिए। नौशाद, एसडी बर्मन और रोशन के यहां उन्होंने शास्त्रीय संगीत की बारीकियों को तीन मिनट के गीतों में डालने की युक्ति सीखी तो मदन मोहन से संगीत में श्रुतियों का काम।

लता जी ने ही बताया था कि पण्डित भीमसेन जोशी के साथ युगल गायन में ‘राम का गुणगान करिए’ गाते हुए उन्होंने किस तरह गीत के बीच में उस्ताद बरकत अली ख़ां की तान की हूबहू नकल की थी। इसी तरह ‘मेरा साया’ के गीत ‘तू जहां-जहां चलेगा, मेरा साया साथ होगा’ को गाते समय उस्ताद अमीर ख़ां की राग नन्द में गाई बन्दिश ‘ढूंढूं बारे सैंया’ को ध्यान में रखा था। यह कुछ उदाहरण भर हैं, जिससे लता मंगेशकर की मेहनत और उनके काम में उस परफेक्शन के इशारे मिलते हैं, जिसे बड़े जतन से उन्होंने विकसित किया। आज फ़िल्म संगीत में कितने ऐसे पार्श्वगायक, गायिकाएं होंगे, जो अपना कोई गीत रेकॉर्ड करते हुए किसी दिग्गज उस्ताद या सीनियर प्लेबैक सिंगर की युक्तियों को जेहन में रखते हों? इसी कारण लता असाधारण थीं और कला की दुनिया में एक उतनी ही असाधारण घटना... उनके होने से फ़िल्म संगीत को ऊंचाई मिलती थी और शीर्ष पर मौजूद अभिनेत्रियों को गौरवबोध, कि जिन सुपरहिट बन जाने वाले गीतों की वे किरदार मात्र हैं, उनको लता जी ने आवाज़ दी है।

कई अवसरों पर लता मंगेशकर की दक्षता, ठोस गायिकी के लम्बे अनुभव, संगीतकारों के साथ सामंजस्य और बदलते हुए परिदृश्य को भांपकर नये दौर की बेहतर चीज़ों को अपनाने का भाव उन्हें एक ऐसे अनूठे किरदार में तब्दील करता है, जिसके पास भी जल्दी कोई फटक नहीं सका। आज विज्ञान ने भले ही कितनी तरक्की क्यों न कर ली हो, मगर वह लता मंगेशकर की आवाज़ का क्लोन बनाने में अक्षम है। कई भाषाओं, विभिन्न विधाओं, विविध मानवीय संवेदनाओं में गीत गाकर उन्होंने यह भी साबित किया कि वे कैसा भी गाना आसानी से बरत सकती हैं।
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यह रेकॉर्ड भी उनके ही ख़ाते में दर्ज़ है कि हिन्दी सिनेमा के शुरुआती दौर की अभिनेत्रियों मसलन- कामिनी कौशल, दुर्गा खोटे और नलिनी जयवन्त से लेकर बाद में लगभग सभी शीर्ष अभिनेत्रियों से होते हुए आधुनिक दौर में माधुरी दीक्षित, काजोल और तब्बू की आवाज़ भी वे बनी रहीं। अपने पीछे वे इतनी बड़ी लकीर खींच गई हैं कि आने वाली पीढ़ियों में दक्षता प्राप्त करने वाली पार्श्वगायिकाओं को यह कहकर मिसाल दी जाती रहेगी कि- ‘क्या लता मंगेशकर बनना है?’ उनके अवसान से जो सांस्कृतिक खालीपन उपजा है, मुझे नहीं लगता कि आज कोई सीखी हुई पार्श्वगायिका उनके मुकाम तक पहुंच सकती है। आस्था, जुनून, समर्पण और मेहनत की जो पूंजी और करिश्मा लता मंगेशकर के पास था, उसे पुनः आविष्कृत करने में सदियां लग जाएंगी।

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