प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की गत 27 फरवरी को गंगोत्री के शीतकालीन पूजास्थल मुखवा और हरसिल की यात्रा प्रस्तावित थी जो कि खराब मौसम की चेतावनी के कारण स्थगित हो गई। उसी मौसम विभाग ने 27 फरवरी को उत्तराखण्ड में मौसम के बहुत खराब रहने और हिमस्खलन की चेतावनी भी दी थी। मौसम विभाग के पूर्वानुमान के आधार पर राष्ट्रीय आपदा प्राधिकरण ने 27 फरवरी के लिए जो हिमस्खलन की चेतावनी जारी की थी उसमें अन्य क्षेत्रों की तरह चमोली जिले के लिए यलो एलर्ट में रखा गया था और 28 फरवरी के लिए रेड एलर्ट की गंभीर चेतावनी जारी की गई थी।
उस गंभीर चेतावनी में हिमस्खलन के लिए जम्मू-कश्मीर के 9 जिलों, लद्दाख के कारगिल, हिमाचल प्रदेश के भी 4 जिलों और उत्तराखण्ड के चमोली जिले को शामिल किया गया था। रेड एलर्ट की चेतावनी 2400 मीटर से ऊपर के इलाकों के लिए थी और बाकी उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, पिथौरागढ़ और बागेश्वर के लिए यलो एलर्ट था।
इन चेतावनियों के बावजूद चमोली जिले में माणा दर्रे और और बदरीनाथ के बीच लगभग 4000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित घस्तोली के निकट हिमस्खलन का इतना बड़ा हादसा हो गया जिसमें 55 मजदूर दब गए। जो कि मानव जीवन के प्रति एक घोर लापरवाही का ताजा तरीन उदाहरण है। हालांकि सौभाग्य से बर्फ के विशाल मलबे के नीचे दबे लोगों को बाहर तो निकाल लिया गया मगर इस संकट से बचने की सावधानी और सतर्कता अभी भी दफन नजर आ रही है।
इस क्षेत्र में यह पहली घटना नहीं है। इससे पहले भारत-तिब्बत सीमा के निकट स्थित मलारी और सुमना के बीच ऐसा ही एवलांच हादसा हुआ था जिसमें एक दर्जन से अधिक मजदूर एवलांच में दब कर मर गए थे। ये घटनाएं केवल चमोली जिले के उच्च हिमालयी क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं।
जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखण्ड में हिमालय की विशेष भौगोलिक स्थिति के कारण इस तरह की घटनाएं न केवल आम हैं अपितु जलवायु परिवर्तन के कारण इन घटनाओं में वृद्धि भी हो रही है। ये प्राकृतिक घटनाएं निरन्तर होती रहेंगी और इनसे बचाव का सबसे बड़ा उपाय सावधानी और सतर्कता ही है जो कि कहीं दिखाई नहीं दे रही है जिसका एक और जीता जागता उदाहरण माणा में सामने आ गया है।
हिमालय क्षेत्र में हिमस्खलन (Avalanche ) एक गंभीर प्राकृतिक आपदा है, जो हर साल कई लोगों की जान लेती है। विशेष रूप से, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, लद्दाख, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश जैसे क्षेत्रों में यह खतरा अधिक रहता है। ग्लोबल वॉर्मिंग, मानवजनित गतिविधियों और प्रशासनिक लापरवाही के चलते हाल के वर्षों में हिमस्खलनों की संख्या में वृद्धि देखी गई है।
इन क्षेत्रों में बर्फ की मोटी परतें जमा होती हैं, जो किसी भी हलचल, कंपन या तापमान परिवर्तन के कारण नीचे खिसक सकती हैं। पिछले कुछ दशकों में कई विनाशकारी हिमस्खलन हुए हैं। 2021 में उत्तराखंड के जोशीमठ के पास आए हिमस्खलन में कई मजदूर और सेना के जवान प्रभावित हुए थे। 2019 में सियाचिन ग्लेशियर में हिमस्खलन की चपेट में आकर भारतीय सेना के 4 जवान और 2 कुली मारे गए थे। 2016 में सियाचिन ग्लेशियर में ही एक और हिमस्खलन हुआ, जिसमें 10 सैनिकों की जान गई थी।
2013 में उत्तराखंड त्रासदी में भी हिमस्खलनों ने तबाही मचाई थी। हालांकि, सावधानी ही सबसे बड़ा बचाव है लेकिन हिमस्खलन से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए पर्याप्त सावधानियां नहीं बरती जाती हैं। जलवायु परिवर्तन की अनदेखी इसका एक बड़ा कारण है। तापमान में वृद्धि के कारण
ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे हिमस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं। इसके अलावा, निर्माण कार्यों का अंधाधुंध विस्तार भी खतरा बढ़ा रहा है। सड़कों, जलविद्युत परियोजनाओं और पर्यटन स्थलों के अनियंत्रित निर्माण से पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ रहा है। समुचित चेतावनी प्रणाली का अभाव भी एक प्रमुख समस्या है, क्योंकि उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में हिमस्खलन की चेतावनी देने वाली तकनीक का अभाव है। आपदा प्रबंधन की कमजोर स्थिति के कारण राहत कार्यों में देरी होती है, जिससे जान-माल का अधिक नुकसान होता है।
हिमस्खलन का सबसे अधिक खतरा उन इलाकों में होता है जहां अधिक ऊंचाई पर बर्फ जमती है और फिर कमजोर परतें बनकर नीचे खिसकती हैं। सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में सियाचिन ग्लेशियर, उत्तराखंड के बद्रीनाथ, केदारनाथ, जोशीमठ और पिथौरागढ़, हिमाचल प्रदेश के किन्नौर और लाहौल-स्पीति, लद्दाख और काराकोरम क्षेत्र, और सिक्किम तथा अरुणाचल प्रदेश के ऊँचाई वाले इलाके शामिल हैं। इन क्षेत्रों में सेना और स्थानीय लोगों को हमेशा सतर्क रहना पड़ता है। जाती हुसी सर्दियों में हिमस्खलन का खतरा सबसे अधिक मार्च के महीने में रहता है।?
हिमस्खलन के कई कारण हो सकते हैं। भूगर्भीय गतिविधियाँ जैसे भूकंप और हलचल बर्फ के बड़े टुकड़ों को अस्थिर कर सकते हैं। मानवजनित गतिविधियाँ, जैसे सड़क निर्माण, विस्फोट और भारी वाहन चलाने से कंपन पैदा होता है, जिससे बर्फ खिसक सकती है। जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान में वृद्धि हो रही है, जिससे बर्फ की स्थिरता प्रभावित हो रही है। अत्यधिक बर्फबारी और तेज हवाएँ भी बर्फ के कमजोर हिस्सों को अस्थिर कर सकती हैं। सर्दियों में भारी हिमपात के बाद यदि तापमान अचानक बढ़ता है, तो हिमस्खलन की संभावना अधिक हो जाती है।
हिमस्खलन से होने वाली क्षति को रोकने के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते हैं। अत्याधुनिक चेतावनी प्रणाली विकसित की जानी चाहिए ताकि समय पर लोगों को सतर्क किया जा सके। संवेदनशील क्षेत्रों का नक्शा बनाकर वहां के विकास कार्यों को नियंत्रित किया जाना चाहिए। प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को बचाव तकनीक और आपदा प्रबंधन में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। वनों की कटाई रोककर प्राकृतिक अवरोध बनाए जा सकते हैं, जिससे हिमस्खलनों के प्रभाव को कम किया जा सके।
अनियंत्रित पर्यटन और भारी निर्माण कार्यों पर भी रोक लगाई जानी चाहिए। हिमस्खलन से पहले, रेडियो सुनें, टीवी देखें और समाचार पत्रों से मौसम अपडेट प्राप्त करें। यदि आधिकारिक चेतावनी जारी की जाती है, तो घर के अंदर रहें और सभी बाहरी योजनाओं को निलंबित कर दें। खड़ी ढलानों और संवेदनशील क्षेत्रों से बचें। निकासी योजना तैयार रखें और निकासी मार्गों को चिह्नित करें। यदि खतरा कम है, तो ढलानों पर सावधानीपूर्वक चलें और अपने ट्रैकिंग पथ को किसी कपड़े, लकड़ी की छड़ी आदि से चिह्नित करनी चाहिए।
यदि हिमस्खलन में फंस जाएं, तो सतह के करीब रहने या किनारे की ओर हटने का प्रयास करें। किसी मजबूत वस्तु को पकड़ना चाहिए। एक हाथ से वायु जेब बनाकर सांस लेने की जगह बनाएं। यदि सतह तक नहीं पहुंच सकते, तो शांत और नियंत्रित रूप से सांस लें। शांत रहें और बचाव दल को संकेत देने के लिए नियमित रूप से सतह पर प्रहार करें।सतर्क रहें, तैयार रहें।
हिमालयी क्षेत्र में हिमस्खलन एक गंभीर खतरा बना हुआ है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। प्रशासन, वैज्ञानिक समुदाय और स्थानीय लोगों को मिलकर इस चुनौती से निपटने के लिए प्रभावी कदम उठाने होंगे। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने और सतत विकास को अपनाने से ही हिमस्खलन के खतरों को न्यूनतम किया जा सकता है।
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