भू-कानून को लेकर स्वाभिमान महारैली
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मुख्यमंत्री धामी ने जगाई नई आस
अब मुख्यमंत्री धामी ने यह कहकर सशक्त भूकानून की आशा फिर जगा दी कि उत्तराखंड (उत्तरप्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम 1950) (अनुकूलन एवं उपांतरण आदेश, 2001) में 2017 के बाद किए गए संशोधनों के लक्ष्य हासिल नहीं हुए हैं। उस समय राज्य में 125 लाख करोड़ के पूंजी निवेश के इच्छापत्रों पर हस्ताक्षर हुए थे। लेकिन अब मुख्यमंत्री ने स्वीकार कर लिया कि संशोधनों से भूमि कानून में दी गई शिथिलता के बावजूद औद्योगिक निवेश का मकसद हल नहीं हुआ इसलिए उन संशोधनों पर पुनर्विचार किया जाएगा और जरूरी हुआ तो उन्हें हटा दिया जाएगा।
इन्हीं संशोधनों के खिलाफ उत्तराखण्ड में जहां तहां लोग सड़कों पर उतर रहे हैं। यही नहीं मुख्यमंत्री ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि सशक्त भू-कानून के लिए गठित सुभाष कुमार समिति की सिफारिशों की भी समीक्षा की जा रही है और सरकार अगले बजट सत्र में निश्चित रूप से एक सशक्त भूकानून को पास करा देगी।
सुभाष कुमार समिति ने हिमाचल प्रदेश कास्तकारी एवं भूमि सुधार अधिनियम 1972 की धारा 118 से मिलती जुलती 23 सिफारिशें कर रखी हैं और उत्तराखण्ड में हिमाचल प्रदेश के इसी कानून की तर्ज पर भूकानून बनाने की मांग जोर पकड़ती जा रही है।
नगरों ने निगली सर्वाधिक कृषिभूमि
औद्योगीकरण के नाम पर कानून में ढील दिए जाने से सन् 2018 से लेकर अब तक उत्तराखण्ड की प्राइम लैंड लगभग बिक चुकी है। जमीनों की बेतहाशा खरीद फरोख्त नगरीय क्षेत्रों और उनके आसपास ही हुई है, इसलिए भूमि कानून में धारा -2 रखी गई थी। उस धारा के अनुसार कृषि भूमि की खरीद पर अंकुश वाला प्रावधान नगर निकाय क्षेत्रों पर लागू नहीं होता है। जबकि पहले अध्यादेश वर्ष 2003 संख्या 6 में समस्त उत्तरांचल पर यह बंदिश लागू करने का प्रधान रखा गया था।
इस धारा का लाभ भूमि सौदागरों को पहुंचाने के लिए सन् 2017 में ही प्रदेश के 13 में से 12 जिलों के 385 गावों को 45 नगर निकायों में शामिल कर 50,104 हेक्टेअर जमीन को खरीद फरोख्त की बंदिशों से मुक्त कर दिया गया था।
राज्य सरकार के इस निर्णय से अकेले गढ़वाल मण्डल में देहरादून जिले में सर्वाधिक 85 ग्रामों के 20221.294 हैक्टेयर ग्रामीण क्षेत्र को नगर निगम के अतिरिक्त हरबर्टपुर, विकास नगर, ऋषिकेश, डोईवाला शामिल किया गया है। यही नहीं गैरसैण तहसील में जमीनों की खरीद पर 2012 में लगी रोक को 2018 में सरकार ने हटा दिया था।
उत्तराखण्ड अकेला हिमालयी राज्य जहां भूखोरों का खुली छूट
उत्तराखण्ड अकेला हिमालयी राज्य है जहां जमीनों की बिकवाली और दलाली का धन्धा सर्वाधिक फलफूल रहा है। उत्तराखण्ड की व्यावसायिक और आवासीय महत्व की सभी जमीनें भूखोरों के चंगुल में चली गई हैं और सर्वाधिक आमदनी वाला प्रॉपर्टी डीलिंग का व्यवसाय उत्तराखण्ड में दिन दुगनी और रात चौगुनी रफ्तार से फलफूल रहा है।
यहां तक कि बड़ी संख्या में राजनीतिक लोग भी इस धन्धे में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से शामिल हैं। फिर भी अगर सरकार सचमुच एक सशक्त भूमि कानून बना रही है तो उसे सरकार का देर से आया हुआ दुरुस्त फैसला माना जा सकता है, बशर्ते सरकार जनभावनाओं के अनुकूल और व्यवहारिक कानून बना दे। अगर सरकार उत्तराखण्ड में उपान्तरित और अनुकूलित जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम-1950 में 2017 के बाद के सभी संशोधन समाप्त कर देती है तो भी पूरा मकसद हल नहीं होता।
इसके साथ ही सरकार को अधिनियम की धारा दो पर भी पुनर्विचार करना चाहिए, क्योंकि उत्तराखण्ड में बहुत तेजी से नगरीकरण हो रहा है और उसी तेजी से सरकारें नगर निकायों का विस्तार और उनकी संख्या बढ़ाती रही हैं। इस तरह जो ग्रामीण क्षेत्र नगर निकायों में मिलाए जाएंगे वहां भूमि सौदागरों और भूखोरों की मौज आ जाएगी।
मूल निवास-भू कानून रैली
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एक समग्र भू-संहिता की आवश्यकता
राज्य को विरासत में उत्तर प्रदेश से जमीन संबंधी विभिन्न कानून मिले थे। इन सभी कानूनों को मिला कर एक भूमि संहिता बनाई जा सकती है। सरकार का काम भूमि प्रबंधन के साथ भूमि सुधार भी है। सरकार को भूस्वामित्व के रिकॉर्ड के साथ ही भूमि के प्रकार की इन्वेंटरी भी चाहिए। वर्तमान में भाूमि का प्रबंधन राजस्व विभाग के पास और भूमि उपयोग कराने वाले कृषि और उद्यान दो अलग-अलग विभाग है।
गांवों में जमीनों की अदलाबदली के कारण भूमि रिकार्ड अपडेट नहीं हैं। राजस्व अधिनियम 1901के अध्याय 5 से लेकर 8 तक लोप हो जाने के कारण सरकार के पास जमीनों का बंदोबस्त करने का कोई कानूनी आधार नहीं हैं। सन् 60 के दशक से प्रदेश में जमीनों के बन्दोस्त नहीं हुये हैं इसलिये रिकार्ड अद्यतन नहीं हैं। छोटी और बिखरी जोतें भी भूमि सुधार की दिशा में सबसे बड़ी अड़चन है लेकिन सरकार चकबन्दी भी नहीं कर पा रही है। एक एक खाते में दर्जनों खातेदार हैं और उनमें से बहुत सारे पलायन कर दूर चले गए हैं। पलायन के कारण जिन खेतों में झाड़ियां और जंगल उग गए उनके बारे में भी सरकार को सोचना चाहिये। अगर कानून बन रहा है तो उसमें भूमि संबंधी सभी मुद्दों का समावेश होना चाहिए।
भूमि प्रबंधन में पंत, परमार और तिवारी की रही यादगार भूमिका
गोविन्द पन्त ने आजादी से पहले ही भूमि सुधार को आजादी के बराबर महत्व देते हुए स्वतंत्र भारत का सबसे पहला भूमि सुधार कानून ‘‘उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि सुधार अधिनियम 1950’’ बनवाया था और डॉ. परमार ने सन् 1971 में हिमाचल प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलने के साथ ही हिमाचल प्रदेश कास्तकारी एवं भूमि सुधार अधिनियम-1972 बनाया था।
इसी तरह उत्तराखण्ड के पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री पंडित नरायण दत्त तिवारी ने कास्तकारों की जमीनें भूखोरों से बचाने के लिए ‘‘उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि सुधार अधिनियम 1950’’ में संशोधन कर गैर कृषकों द्वारा कृषकों की जमीनें खरीदने पर रोक लगाने की कानूनी व्यवस्था कर दी थी।
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