लोकतंत्र को जिंदा रखने के लिए एक मजबूत विपक्ष का होना बहुत जरूरी है।
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लोकतंत्र को जिंदा रखने के लिए विपक्ष कितना जरूरी?
बहरहाल, इस चुनावी उठापटक के बीच भले ही जनता ने बहुमत से अपनी पसंद के नेता को चुन लिया हो लेकिन विपक्ष का कमजोर होना भी कई मायनों में चिंताजनक है।
दरअसल, लोकतंत्र को जिंदा रखने के लिए एक मजबूत विपक्ष का होना बहुत जरूरी है। सरकार जो भी काम कर रही है, अगर उसमें कोई गलती होती है तो उसपर सवाल विपक्ष ही उठाएगा। जिन लोगों की आवाज सरकार नहीं सुनती वो आवाज विपक्ष ही सरकार तक पहुंचाता है।
एक ऐसा कानून जो किसी वर्ग विशेष को फायदा पहुंचाता हो और एक अन्य वर्ग के लिए खतरा उत्पन्न कर रहा हो, इस कानून को पास होने से रोकने में भी विपक्ष ही बड़ी भूमिका निभा सकता है।
ऐसे में साफ सीधी बात ये है कि अगर विपक्ष मजबूत होगा तो सरकार तानाशाह नहीं होगी और देश की संवैधानिक संस्थाएं भी आजादी से बिना डरे अपना काम कर पाएंगी। यानी अगर एक मजबूत विपक्ष होगा तो वो सरकार को निरंकुश होने से रोकेगा। सरकार की मनमानी को रोकेगा।
क्या है निरंकुशता?
अगर सरकार निरंकुशता की ओर बढ़ती है तो एक मजबूत विपक्ष को देख वह अपने कदम पीछे खींच लेती है। कई बार विपक्ष जनहित के फैसलों और जनकल्याण के फैसले लेने के लिए सरकारों को बाध्य करता है। निर्णयों पर सोचने के लिए मजबूर करता है।
पिछली सरकार में सुप्रीम कोर्ट के चार जजों का प्रेस कॉन्फ्रेंस करना गंभीर चिंता का विषय था, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि न्यायपालिका के कामकाज को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है। यही नहीं सीबीआई के निदेशक की नियुक्ति के दौरान भी हमें उठापटक देखने को मिली। ये सारे मामले बताते हैं कि लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका ना केवल प्रभावी होती है बल्कि सरकारों की निरंकुशता को भी नियंत्रण में रखने में भी कारगर होती है।
कांग्रेस कार्यसमिति में राहुल और सोनिया गांधी
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भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक मजबूत विपक्ष की भूमिका आज से नहीं बल्कि दशकों से देखी जाती रही है। 1975 में लगी इमरजेंसी और बाद में उसका विरोध भी विपक्ष के बूते ही संभव था। एक वो भी दौर था जब संसद में अटल बिहारी वाजपेयी, भैरों सिंह शेखावत और लाल कृष्ण आडवाणी जैसे नेता बोलते थे तो सत्ता पक्ष गंभीरता से उन्हें सुनता था। ये वो लोग तो सरकारों के दिशाहीन और निरंकुश होने की प्रवृत्ति पर लगाम लगाने वाले रहे।
2014 से पहले यूपीए-2 की सरकार में टूजी से लेकर कोयला घोटाले जैसे मामलों में विपक्ष की भूमिका ही थी जिसने सड़क से लेकर संसद तक सरकार को घेरा और आखिरकार चुनाव के समय सत्ता से उखाड़ फेंका। यही नहीं इससे पहले 2004 में एनडीए-1 में वाजपेयी सरकार भी जमीन पर लोकलुभावन नारों से जनता को रिझाती रही तो कांग्रेस ने जमीनी मुद्दों और गरीबों के हक की आवाजों को उठाकर इंडिया शाइनिंग नारे की हवा निकालती। नतीजा यूपीए-1 के सामने हमारे पास आया।
खास बात यह है कि 70 के दशक के बाद भारत की सत्ता में लंबे समय तक एक ही दल की सरकार होने की वजह से भारत की संसदीय प्रणाली में विपक्ष का चेहरा वैसा नहीं बन पाया जो एक समय नेहरु की सरकार के समय समाजवादियों का रहा। डॉ राम मनोहर लोहिया, मधु लिमिये, आचार्य नरेंद्र देव जैसे समाजवादियों ने कांग्रेस के सामने विपक्ष का जो चेहरा रखा वैसा चेहरा नेहरु के जाने के बाद नहीं दिखा।
लोहिया की मृत्यु और नेहरु का जाना विपक्ष के बीच के संबंधों की रेखा को भी तार-तार कर गया। हालांकि जयप्रकाश नारायण ने जो तेवर इंदिरा सरकार को दिखाए वैसे बाद में देखने को नहीं मिले, लेकिन जेपी पार्टी से दूर जनांदोलन के नेता थे और वे एक विशाल जनसमूह को सरकार की नीतियों के खिलाफ एकजुट करने में सफल रहे। यह वह समय था जब तानाशाही सरकारों को सत्ता से उखाड़ने के लिए विपक्ष के चेहरे के रूप में याद किया जाता है।
सवाल यह है कि 2019 के चुनावों में विपक्ष का वह चेहरा कहां है? और यदि नहीं है तो लोकतांत्रिक प्रणाली में जनता की बात सरकार तक संसद में पहुंचाएगा कौन? कौन उन फैसलों पर नजर रखेगा जिनमें केवल चमकदार कंगुरे भर हों जबकि जनहित की नींवे नदारत हो?
बिखरे और भटके हुए विपक्ष अक्सर लोकतंत्र को कमजोर करते हैं। उम्मीद है देश की सबसे पुरानी पार्टी में हमें एक कमजोर नहीं बल्कि मजबूत विपक्ष का चेहरा देखने को मिलेगा। राहुल गांधी और तमाम विपक्षी दल संसद से सड़क तक एक्टिव रहेंगे।
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