उत्तरप्रदेश, बिहार, मप्र, छत्तीसगढ़, उड़ीसा या पूर्वोत्तर के राज्यों में आधारभूत विकास से लेकर सामाजिक रूप से निवेश की आवश्यकता आज भी अत्यधिक है लेकिन तथ्य यह है कि 22 करोड़ की आबादी वाले उत्तर प्रदेश में गुजरात की तुलना में आधा यानी 3288 करोड़ का फंड ही मिल सका। इसी तरह बिहार में तो यह आंकड़ा मात्र 691 करोड़ ही हो पाया है। कमोबेश मप्र 1149, छत्तीसगढ़ में 1385, बंगाल में 2487, झारखंड में यह आंकड़ा 873 करोड़ ही है।
जाहिर है बड़े औद्योगिक घराने या सेवा क्षेत्र की कम्पनियां पहले से विकसित राज्यों में पहले तो अपनी इकाइयों की स्थापना के साथ स्थानीय रोजगार की उपलब्धता बढ़ाती फिर सीएसआर की बड़ी राशि भी स्थानीय स्तर पर खर्च करती हैं। दूसरी तरफ यूपी, बिहार, मप्र जैसे राज्य लाख प्रयासों के बाद राज्य के लिए औद्योगिक निवेश नहीं ला पाते हैं, ऐसे में सीएसआर के लिए इन राज्यों को इस कोटे के अखिल भारतीय आवंटन पर निर्भर रहना पड़ता है जो बहुत ही कम होता है।
रिसर्च और डेवलपमेंट भी शामिल
सरकार ने कुछ संशोधन कर सीएसआर मद से रिसर्च और डेवलपमेंट को भी जोड़ा है लेकिन अभी इस दिशा में कोई ठोस काम दिखाई नहीं दे रहा है। एक और विसंगति यह है कि बड़े औद्योगिक घरानों ने अपने प्रभाव वाले एनजीओ एवं ट्रस्ट खड़े कर लिए हैं जिनमें यूनिवर्सिटीज अस्पताल और कौशल विकास केंद्र भी संचालित किए जा रहे हैं। यह एक तरह से केवल धन का डायवर्जन भर है।
बेहतर होगा सरकार सीएसआर के लिए कुछ बड़े बुनियादी बदलाव सुनिश्चित करे। मसलन कुल धन का 75 फीसदी तो अभी तक शिक्षा ,स्वास्थ्य और गरीबी पर खर्च हुआ है इन तीनों क्षेत्रों में सभी सरकारें भी पिछले 75 साल से पानी की तरह पैसा खर्च कर रही है। सीएसआर की राशि का इन क्षेत्रों में व्यय किया जाना असल में दोहराव भर लगता है।
अच्छा होगा कि एक नियामक निकाय सीएसआर के लिए खड़ा किया जाए और देशभर की सीएसआर राशि एक स्थान पर संकलित हो। इस राशि के खर्च हेतु एक विशेषज्ञ पैनल जनप्रतिनिधियों, सिविल सोसायटी,अफसरों को मिलाकर बनाया जाए। यह नियामक तंत्र धन के समान वितरण के अलावा सीएसआर से ऐसी आधारभूत संरचनाओं का निर्माण सुनिश्चित करे जो वैशिष्ट्य प्रमाणित करते हों।
यानी एक अम्ब्रेला बनाकर स्थायी प्रकृति की परिणामोन्मुखी गतिविधि सीएसआर से खड़ी की जा सकती है, बनिस्बत शिक्षा,स्वास्थ्य ,गरीबी पर पहले से चली आ रही योजनाओं में शामिल होकर सरकारी ढर्रे का हिस्सा बना जाए।
इसी तर्ज पर फूड प्रोसेसिंग,ऑटोमोबाइल जैसे प्रयोग अमल में लाए जा सकते हैं। यह प्रयोग जनभागीदारी से भी चलाए जा सकते है और नीतिगत स्तर पर देश के हर जिले को इस कानून के दायरे में लाकर विकास और सामाजिक कल्याण दोनों के लक्ष्यों को चरणबद्ध तरीके से साधा जा सकता है। शोध और विकास के लिए मेडिकल, इंजीनियरिंग एवं प्रौद्योगिकी संस्थानों के अलावा विश्वविद्यालय स्तर पर इकाई बनाकर काम किया जा सकता है।
केंद्रीय स्तर पर बनाए गए नियामक तंत्र को ही इस फंड के वितरण एवं इसके प्रभाव, मूल्यांकन तथा निगरानी का जिम्मा दिया जाना चाहिए। अगर सरकार इस दिशा में आगे बढ़ती है तो निसंदेह जिस उद्देश्य से सीएसआर कानून बनाया गया है उसके ठोस नतीजे देश के लिए हितकारी साबित होंगे। वरन मौजूदा अनुभव बड़ी मात्रा में इस फंड के दुरुपयोग, चालक विनियोजन एवं बदनाम एनजीओज के हितपूर्ति को प्रमाणित कर रहे हैं।
कॉरपोरेट मंत्रालय के एक डेटा के मुताबिक कुल सीएसआर फंड का 60 फीसदी हिस्सा कार्यकरण एजेंसियों यानी एनजीओज के माध्यम से खर्च किया गया है। सीएसआर रजिस्ट्री के पास फिलहाल 38199 कार्यकरण एजेंसियों के रजिस्ट्रेशन हैं। गौर करने वाली बात यह है कि केंद्र सरकार के पास कार्यकरण एजेंसियों के राज्य/संघ स्तर पर कोई डेटा संधारित्र नहीं किया जाता है, यानी इस भारी भरकम राशि को किन एनजीओज द्वारा खर्च किया जा रहा है इसका भी प्रमाणिक लेखा-जोखा कॉरपोरेट मामले के मंत्रालय के पास नहीं है।
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