किशोर कुमार की पढ़ाई इंदौर के क्रिश्चियन कॉलेज में हुई।
- फोटो : Social Media
टीम ‘डॉन’ को आइडिया पसंद आया। संगीत निर्देशक जोड़ी कल्याणजी-आनंद से बात की गई। उन्होंने कहा कि उनके पास एक गाने की धुन तैयार है। यह धुन उन्होंने देवानंद की फिल्म ‘बनारसी बाबू’ के लिए तैयार की थी, लेकिन देवानंद को ये जमी नहीं तो फिल्म में नहीं ली गई।
एक टेक में रिकॉर्ड हो गया गाना
किशोर कुमार ने इस गीत को बिना रिहर्सल किए एक टेक में रिकार्ड किया। उन्होंने पहले ही संगीतकारों से कह दिया था कि मैं दूसरा टेक नहीं करूंगा, कोई गलती नहीं होनी चाहिए। गाना एक टेक में रिकार्ड हुआ। पान खाने और थूकने को रियल इफेक्ट देने के लिए किशोर ने सचमुच में पान खाया भी और थूका भी।
गाना रिकॉर्ड तो हो गया और अमिताभ-जीनत अमान पर शूट भी हो गया। गाना फिल्म में एड करने के लिए लैब में चला भी गया। लेकिन इस बीच रिलीज़ की डेट आ गई, जिसे टाला जाना आसान नहीं था, सो बिना इस गाने के फिल्म रिलीज हो गई। बाद में एक हफ्ते बाद नए गाने वाली रील सिनेमाघरों में चली। तो ऐसा था किशोर की सरगमी आवाज का जलवा।
04 अगस्त को मध्य प्रदेश के खण्डवा शहर में जन्में किशोर ने हिंदी के अलावा बंगाली, मराठी, उर्दू, असमी, गुजराती, कन्नड़, मलयालम, उड़िया, भोजपुरी भाषाओं में भी गीत गाए। सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक की श्रेणी में उन्होंने सर्वाधिक आठ फिल्म फेयर अवॉर्ड जीतने का रिकार्ड अपने नाम किया। अभिनेता भी वो कमाल के थे।
किशोर कुमार की पढ़ाई इंदौर के क्रिश्चियन कॉलेज में हुई। वो केंटीन में उधारी बहुत करते थे। उधार लेकर खुद भी खाते और दोस्तों को भी खिलाते। किशोर पर पांच रूपए बारह आना की उधारी चढ़ गई थी। स्टुडेंट लाईफ के हिसाब से ये बड़ी उधारी थी। 10-15 रूपए की भी बड़ी हैसियत थी उन दिनों। केंटीन का मालिक उनसे उधारी चुकाने को कहता तो वो उसकी बात अनसुनी कर देते और केंटीन में ही टेबल पर गिलास और चम्मच बजाकर ‘पांच रूपैया बारह आना’ गाते और कई धुनें रचते। पूत के पांव पालने में ही दिख गए थे।
बाद में जब वो स्थापित पार्श्वगायक बना गए तो उन्होंने अपने एक गीत में ‘पांच रूपैया बारह आना’ लाइन का दिलचस्प प्रयोग भी किया। अपने फन में माहिर और आत्मविश्वासी कलाकार ही ऐसा ‘टिपिकल’ एक्सपरीमेंट करने की हिम्मत कर पाते हैं। फिल्म ‘चलती का नाम गाड़ी’ के एक रोमांटिक गीत में ये लाइन जोड़कर किशोर कुमार ने अपनी इसी काबिलियत का इजहार किया। कहां खूबसूरत मधुबाला का रोमांस भरा आग्रह और कहां पैसों का तकाजा। अद्भुत प्रयोग था। गीत यूं था ‘मैं सितारों का तराना मैं बहारों का खज़ाना... रूप का तुम हो खजाना तुम हो मेरी जां ये माना, लेकिन पहले दे दो मेरा, पांच रूपैया बारह आना।...’
फिल्म हॉफ टिकिट का एक गीत है ‘आके सीधी लगे दिल पे जैसे कटरिया, ओ संवरिया...’ इस गाने की खासियत ये है कि मेल और फीमेल दौनों आवाज़ किशोर कुमार की है।
तो ऐसे थे किशोर दा, ‘किशोर द ओनली वन’। अपनी तरह के अनूठे और बहुमुखी प्रतिभा के धनी ‘किशोर कुमार खंडवा वाला’। वो लेखक थे, निर्माता-निर्देशक थे, गायक थे, संगीतकार थे, अभिनेता थे। इतने सारे विशेषण उनके नाम के साथ यूं ही नहीं चस्पा किए जाते। एक फिल्म थी ‘दूर गगन की छांव में’ इस क्लासिक फिल्म की प्रोडक्शन कंपनी थी - किशोर फिल्म।
फिल्म के प्रोड्यूसर, डायरेक्टर, राइटर, एक्टर, म्युजि़क कम्पोज़र, गायक सभी कुछ किशोर कुमार थे। अपनी तरह की अलग, यह फिल्म बताती है कि किशोर कितने वर्सटाईल क्रिएटर थे। इस फिल्म का एक गाना आज भी लोगों के कानों में रस घोलता है – ‘आ चल के तुझे मैं लेके चलूं एक ऐसे गगन के तले, जहां गम भी न हों आंसू भी न हो, बस प्यार ही प्यार पले।’ कितनी जरूरत है इस तरह के गीत की इन दिनों, नहीं।
बता दें, इसे लिखा भी किशोर ने ही था, गाया और संगीतबद्ध तो किया ही था। पूरा गीत सुनिए एंजॉय कीजिए और खो जाईए किशोर कुमार की दिलकश आवाज के जादू में।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।