फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

राजा ब्रह्मदत्त और पूजनीया चिड़िया: विश्वास टूटने पर प्रेम भी टिक नहीं पाता

सार

उस दिन राजमहल में सभी ने समझा कि विश्वास टूटने पर प्रेम भी टिक नहीं पाता, और क्रोध के एक क्षण में जीवनभर का स्नेह समाप्त हो सकता है।
विज्ञापन
ब्लॉग पोस्ट - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

राजा ब्रह्मदत्त के महल में पूजनीया नाम की एक अद्भुत चिड़िया रहती थी। उसके शरीर का अधिकांश भाग काला था, किंतु सिर लाल रंग का था। इसलिए वह दूर से ही अलग दिखाई देती थी। धीरे-धीरे उसका राजा ब्रह्मदत्त से गहरा स्नेह हो गया और वह राजमहल की सदस्य बन गई। उसने महल के भीतर अपना घोंसला भी बना लिया। प्रतिदिन वह महल से उड़कर दूर-दूर तक विचरण करती। कभी समुद्र तट पर घूमती, कभी कमलों से भरे तालाबों में उतरती। जिन सरोवरों में हंस, सारस और कारंडव पक्षियों का मधुर कलरव गूंजता रहता, वहां वह घंटों बिताती। संध्या होते ही वह महल में लौट आती और ब्रह्मदत्त को दिनभर की घटनाएं सुनाया करती। इस तरह ब्रह्मदत्त और पूजनीया मित्र बन गए। कुछ समय बाद राजा ब्रह्मदत्त के घर एक पुत्र का जन्म हुआ। उसका नाम रखा गया-सर्वसेन। 
विज्ञापन


उसी समय पूजनीया ने भी एक अंडा दिया। कुछ दिनों बाद उस अंडे में से एक छोटा-सा बच्चा निकला। धीरे-धीरे उसके पंख निकल आए और आंखें भी खुल गईं। पूजनीया अपने बच्चे और राजकुमार सर्वसेन को समान स्नेह से देखती थी। प्रतिदिन वह कहीं से दो मीठे और स्वादिष्ट फल लाती। एक अपने बच्चे को खिलाती और दूसरा राजकुमार सर्वसेन को देती। दोनों उन फलों को बड़े आनंद से खाते और साथ-साथ खेलते थे। राजमहल की धाय कभी-कभी पूजनीया के बच्चे को घोंसले में से निकाल लाती और वह राजकुमार के साथ खेलने लगता था। सर्वसेन उसे अपने हाथों में लेकर खेलता और हंसता रहता। पूजनीया यह सब देखकर बहुत प्रसन्न होती थी, क्योंकि उसे विश्वास था कि उसका बच्चा राजमहल में पूरी तरह सुरक्षित है।

एक दिन राजकुमार ने खेलते-खेलते पूजनीया के छोटे बच्चे को अपनी मुट्ठी में पकड़ लिया। बालक की पकड़ बहुत कठोर थी। धाय ने लाख प्रयत्न किया, परंतु राजकुमार ने मुट्ठी नहीं खोली। बहुत देर तक ज्यादा दबाव पड़ने से नन्हे पक्षी ने प्राण त्याग दिए। जब राजा ब्रह्मदत्त ने यह देखा, तो वे अत्यंत दुखी हो उठे। उन्होंने किसी प्रकार पक्षी के बच्चे को राजकुमार के हाथ से छुड़ाया, पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। छोटा पक्षी निर्जीव पड़ा था। राजा की आंखों में आंसू थे। उन्होंने धाय को बहुत डांटा और स्वयं भी शोक में डूब गए।
विज्ञापन


वह मूर्छित होकर गिर पड़ी। कुछ देर बाद जब उसे होश आया, तो वह करुण स्वर में विलाप करने लगी। वह राजा की ओर देखकर बोली, 'राजन! मैंने आप पर विश्वास किया था। अपने बच्चे को आपके घर में सुरक्षित समझा था, परंतु आज मेरा बच्चा आपके सामने मारा गया।' शोक और क्रोध से व्याकुल पूजनीया अचानक उड़कर राजकुमार सर्वसेन के पास गई और उसने अपने तीखे पंजों से राजकुमार की दोनों आंखें फोड़ डालीं। राजकुमार पीड़ा से चीत्कार कर उठा और अंधा हो गया। इसके बाद पूजनीया आकाश में उड़ गई। इस घटना से महल में हाहाकार मच गया। परंतु राजा ब्रह्मदत्त ने धैर्य धारण करते हुए पूजनीया से कहा, 'कल्याणी! तूने जो किया, उचित ही किया! तू अपने पुत्र के दुख से व्याकुल थी। मैं तुझ पर क्रोधित नहीं हूं। तू लौटकर आ जा और पहले की भांति यहीं रह।'

राजा की बात सुनकर पूजनीया कुछ ठिठकी। फिर उसने गंभीर स्वर में कहा, 'राजन! मैं जानती हूं कि पुत्र का दुख क्या होता है! जैसे मुझे अपने बच्चे से प्रेम था, वैसे ही आपको भी अपने पुत्र से है। मैंने आपके पुत्र को अंधा करके भयंकर अपराध किया है। अब मैं आपके घर में रहने व आपके विश्वास के योग्य नहीं रही।' यह कहकर चिड़िया उड़ गई। राजा उसे जाते हुए देखते रहे। उस दिन राजमहल में सभी ने समझा कि विश्वास टूटने पर प्रेम भी टिक नहीं पाता, और क्रोध के एक क्षण में जीवनभर का स्नेह समाप्त हो सकता है। राजा ब्रह्मदत्त देर तक मौन बैठे रहे। पूजनीया लौटकर फिर कभी राजा के महल में नहीं आई।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें