जल संरक्षण की प्रेरणा देता मध्य प्रदेश का ‘खूनी भंडारा’
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हम जब जल संकट व ग्लोबल वार्मिंग जैसी चुनौतियों की बात करते हैं, तो हमारे जेहन में आधुनिक समाधान आते हैं। लेकिन भारत में सदियों पुरानी तकनीकें और जल संरक्षण की ऐतिहासिक संरचनाएं आज भी चौंकाती हैं। मध्य प्रदेश के निमाड़ क्षेत्र के बुरहानपुर जिले में स्थित ‘खूनी भंडारा’ ऐसी ही एक अद्भुत मिसाल है, जो न सिर्फ अपनी निर्माण शैली के लिए जानी जाती है, बल्कि इसके पीछे छिपी कहानियां भी इसे रहस्यमय बना देती हैं। दरअसल, खूनी भंडारा एक पारंपरिक जल संग्रहण प्रणाली है, जिसे स्थानीय भाषा में कुंडी भी कहा जाता है।
निमाड़ का यह प्राचीन जलाशय तकनीकी दृष्टि से बेहद अनूठा है। इसे जमीन के भीतर करीब 400 साल पहले बनाया गया था। इसकी खासियत यह है कि बारिश का पानी भूमिगत नालियों के माध्यम से इसमें इकट्ठा हो जाता है, और फिर स्वच्छ रूप में लोगों तक पहुंचता है। यह प्रणाली इतनी कारगर है कि आज भी इसमें मीठा पानी उपलब्ध है। इतिहासकारों के अनुसार, खूनी भंडारा कभी 108 स्रोतों से पानी जमा करता था और आज भी इसके कुछ स्रोत सक्रिय हैं। निमाड़ की कठोर जलवायु में यह संरचना स्थानीय जीवनरेखा बनी हुई है।
सवाल उठता है कि इसे ‘खूनी भंडारा’ क्यों कहा जाता है? इसके पीछे एक दिलचस्प किंवदंती है। कहा जाता है कि जब यह भंडारा बन रहा था, तब कुछ लुटेरों ने स्थानीय निवासियों पर हमला कर दिया। हिंसा में कई लोग मारे गए और उनके शव इस संरचना में गिरा दिए गए। रक्त से रंगे पानी के कारण इसे ‘खूनी भंडारा’ कहा जाने लगा। हालांकि, यह सिर्फ लोककथा है, लेकिन इसने इस जल संरचना को रहस्यमय पहचान जरूर दी है।
कुछ लोग इसे ‘भयंकर भंडारा’ भी कहते हैं, जिससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि समय के साथ इसमें कितनी कहानियां जुड़ गई हैं। निर्माण तकनीक की बात करें, तो इसकी प्रणाली आज की आधुनिक ‘रेनवाटर हार्वेस्टिंग’ से मिलती-जुलती है। वर्षाजल भूमि के नीचे बने जलाशय में संग्रहीत होता है, जहां मिट्टी और पत्थरों की प्राकृतिक परतें इसे छानने का काम करती हैं। यही वजह है कि इसमें संग्रहीत पानी वर्षों तक स्वच्छ और उपयोग योग्य बना रहता है। ‘खूनी भंडारा’ हमें यह याद दिलाता है कि जल संरक्षण केवल आधुनिक विज्ञान पर निर्भर नहीं है, बल्कि हमारी परंपराएं और पुरखों की दूरदर्शिता भी इसमें गहरी भूमिका निभाती है। यह धरोहर आज भी लोगों के जीवन में जल आपूर्ति का अहम स्रोत बनी हुई है। अगर हम ऐसी पारंपरिक जल संरचनाओं को संरक्षित करें और उनसे सीखें, तो भविष्य में जल संकट से निपटना आसान हो सकता है।