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जंगलों में आग: जीवन, जमीन और जल पर बढ़ता संकट

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जंगल की आग - फोटो : रामविक
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गर्मियों की दस्तक के साथ ही भारत सहित दुनिया भर में, जंगलों में लगने वाली आग (वाइल्डफायर) एक गंभीर समस्या बन कर उभरने लगी है l जंगल की आग पहले केवल मौसमी आपदा मानी जाती थी, लेकिन अब जलवायु परिवर्तन के कारण यह अधिक तीव्र और विनाशकारी होती जा रही है। इस आग को प्राकृतिक और मानवजनित कारणों में वर्गीकृत किया जाता है, और इन कारणों को समझना रोकथाम के लिए बेहद जरूरी है। सूखे पर्णपाती, चौड़े पत्तों वाले वन विशेष रूप से आग की चपेट में आते हैं, खासकर प्री-मानसून के शुष्क मौसम में।

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MODIS डेटा के अनुसार, मध्य और पूर्व-मध्य भारत में जंगल की आग की घटनाएं अधिक पाई गई हैं, जबकि हिमालय के चिर पाइन वन भी इस खतरे के प्रति अत्याधिक संवेदनशील हैं।

जहां एक ओर आग की लपटें पेड़ों और वन्यजीवों को निगल जाती हैं, वहीं दूसरी ओर इसका असर उन लोगों पर भी होता है जो जंगलों से आजीविका पाते हैं या उसके पास रहते हैं। आग की राख और विषैले तत्व जलस्रोतों को दूषित कर देते हैं, जिससे जलजीवों और लाखों लोगों की पेयजल आपूर्ति पर भी असर पड़ता है।

मानव गतिविधियों से फैलती आग

सरकारी आंकड़ों और शोध के अनुसार, भारत में लगने वाली लगभग 95% जंगल की आग मानव गतिविधियों के कारण होती है। खेतों की सफाई के लिए आग लगाना, जानबूझकर या लापरवाही से जलती बीड़ी या माचिस फेंकना, या कभी-कभी अवैध रूप से लकड़ी और जंगल उत्पादों को निकालने के लिए आग लगा देना ये सभी इसके प्रमुख कारण हैं।

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2019 में भारत में 30,000 से अधिक जंगल की आग की घटनाएं दर्ज की गईं। ओडिशा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के हिस्से हर साल इस संकट का सामना करते हैं, खासकर वहां जहां सूखे पर्णपाती (ड्राई डेसिडुअस) जंगल अधिक हैं।

ग्लोबल फॉरेस्ट वॉच के आंकड़ों के अनुसार, भारत ने वर्ष 2001 से 2023 के बीच जंगल की आग के कारण लगभग 16.5 लाख हेक्टेयर वनक्षेत्र खो दिया। वैश्विक स्तर पर भारत, 215 देशों में 45वें स्थान पर है जहां वनों की क्षति जंगल की आग के कारण सबसे अधिक हुई है।

जमीन और पर्यावरण पर असर

जंगलों में आग लगने से सबसे पहले प्रभावित होती है मिट्टी। जलने से मिट्टी की उर्वरता कम हो जाती है, और उसमें मौजूद सूक्ष्म जीव मर जाते हैं। इसके अलावा, बार-बार लगने वाली आग से मिट्टी की ऊपरी परत (टॉपसॉइल) हट जाती है, जिससे जमीन बंजर हो जाती है। इसके साथ ही आग से निकलने वाला धुआं वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ाता है, जिससे जलवायु परिवर्तन की समस्या और गंभीर हो जाती है। कई वैज्ञानिक मानते हैं कि वाइल्डफायर, जलवायु परिवर्तन का कारण भी है और परिणाम भी है l

स्प्रिंगर नेचर की एक रिसर्च बताती है, आग, वन की कार्य-प्रणाली को कई तरीकों से प्रभावित करती है, जैसे कि उसके पोषक तत्वों का चक्र (nutrient turnover), मिट्टी की जल प्रतिकर्षकता (hydrophobicity), प्रजातियों की संरचना और पुनरुत्पादन (species composition and regeneration), और पारिस्थितिक विविधता (ecological biodiversity)l

जंगल की आग अधिकतर मानवजनित गतिविधियों का परिणाम होती है, जबकि प्राकृतिक रूप से लगने वाली आग वैश्विक स्तर पर कुल घटनाओं का, केवल एक छोटा हिस्सा होती है। जंगल की आग, मिट्टी के क्षरण और पोषक तत्वों की हानि का एक प्रमुख कारण है l


पानी पर असर

जंगलों में आग का जल स्रोतों पर भी सीधा असर पड़ता है। जब मिट्टी की पकड़ ढीली हो जाती है, तो बारिश का पानी सीधे बह जाता है और जलस्रोतों में मिट्टी भर जाती है। इससे झीलें, नदियां और जलाशय धीरे-धीरे भरने लगते हैं और उनकी जलधारण क्षमता घट जाती है। इसके अलावा, आग से जंगल की हरियाली नष्ट हो जाने से मिट्टी की, पानी को सोखने और संग्रह करने की क्षमता भी कम हो जाती है। जिससे आसपास के इलाकों में जल संकट पैदा हो सकता है।

बार-बार लगने वाली जंगल की आग वर्षा और शुष्क दोनों ऋतुओं में बाढ़ और सूखे की परिस्थितियों को जन्म देती है। इससे भूमि की जल सोखने की क्षमता (इनफिल्ट्रेशन) कम हो जाती है, जिससे भूजल भंडारण घटता है और नदियों का सामान्य प्रवाह प्रभावित होता है। आग के कारण मिट्टी की ऊपरी परत नष्ट हो जाती है, जिससे वर्षा का जल सीधे सतह पर बहकर निकल जाता है और बहाव (रनऑफ) बढ़ जाता है।

परिणामस्वरूप, एक ओर तो वर्षा के दौरान बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है, वहीं दूसरी ओर सूखे में पानी की कमी और भूजल स्तर गिरने जैसी समस्याएं सामने आती हैं। यह स्थिति जलचक्र के संतुलन को बिगाड़ देती है और पारिस्थितिक तंत्र के लिए गंभीर खतरा बन जाती है l

जंगल की आग से न केवल पेड़-पौधे नष्ट होते हैं, बल्कि वन्यजीवों का जीवन भी संकट में पड़ जाता है। छोटे जीव-जंतु तुरंत मारे जाते हैं और बड़े जीवों को अपने बसेरे छोड़ने पड़ते हैं। यह विस्थापन उनके जीवनचक्र और प्रजनन पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। मानव जीवन पर भी इसका असर होता है। जंगलों पर आश्रित आदिवासी समुदायों की आजीविका पर खतरा मंडराने लगता है, और कई बार उन्हें भी विस्थापित होना पड़ता है।


समाधान की दिशा में कदम

इस समस्या का समाधान केवल आग बुझाने तक सीमित नहीं रह सकता। इसके लिए दीर्घकालिक योजना की आवश्यकता है। आग लगने के कारणों की पहचान कर उनसे निपटना, आग से पहले की सतर्कता प्रणाली (Early Warning System), स्थानीय समुदायों को शामिल कर उन्हें जागरूक करना, और पारंपरिक ज्ञान का इस्तेमाल कर आग से बचाव की रणनीति बनाना, ये सब ज़रूरी कदम हैं।

इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन से निपटना भी अब वक़्त की माँग है, क्योंकि बढ़ती गर्मी, सूखा और बदलते मौसम जंगलों को और अधिक संवेदनशील बना रहे हैं।

इसका सीधा प्रभाव मानव जीवन, जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ रहा है। बढ़ती आगजनी विशाल जंगलों को नष्ट कर रही हैं, वन्यजीवों को बेघर कर रही हैं, और मानव जीवन व आजीविका के लिए खतरा बन रही हैं। इसके अलावा, आग से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होती है, जिससे कृषि उत्पादकता घटती है। अमेजन से लेकर हिमालय तक भड़कती इन आग की घटनाओं से निपटने के लिए वन प्रबंधन सुधारने, अग्निशमन व्यवस्था को मजबूत करने और जन-जागरूकता बढ़ाने की सख्त जरूरत है। जंगलों में

लगने वाली आग अब सिर्फ एक मौसमी संकट नहीं रही। यह एक सतत और जटिल चुनौती बन चुकी है, जो हमारी भूमि, जल और जीवन के संतुलन को प्रभावित कर रही है।इसका समाधान केवल सरकारी स्तर पर नहीं, बल्कि सामाजिक, वैज्ञानिक और सामुदायिक स्तर पर एकजुट होकर ही संभव है।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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