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कश्मीर में कैसे रुकेगी हिंसा? यही है घाटी की समस्या का असली हल?

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कश्मीर में बढ़ती हिंसा चिंताजनक है। - फोटो : PTI
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कश्मीर में बढ़ती आतंकी हिंसा चिंताजनक है। कश्मीर देश का अटूट हिस्सा है, लेकिन क्या यह सच्चाई नहीं है कि हम नैतिक और भावनात्मक रूप से कश्मीर को खोते जा रहे हैं?  हमारी सेना के जवान वहां लगातार शहीद हो रहे हैं जबकि कई बेगुनाह भी मारे जा रहे हैं। ऐसे में क्या घाटी को इस हालत में पहुंचाने की ज़िम्मेदारी देश और प्रदेश की अदूरदर्शी राजनीति की ही रही है।

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क्या कश्मीर को जोड़ने की कोशिश हुई? 
दरअसल, भारत में कश्मीर के विलय के बाद हमने कश्मीरियों को देश की मुख्यधारा, संवेदनाओं और आकांक्षाओं से जोड़ने के प्रयास तो किए, लेकिन वैसी सफलता किसी भी सरकार को मिल नहीं पाई। संवादहीनता बनी रही और भारत से कश्मीर की इस संवादहीनता का लाभ पाकिस्तान और उसके टुकड़ों पर पल रहे आतंकियों ने उठाया और पूरी घाटी को आतंकिस्तान में तब्दील कर दिया। आज कश्मीरी युवा हाथों में बंदूक और पत्थर लेकर देश के खिलाफ लड़ रहे हैं। कश्मीरी युवा अगर यह सोचते हैं कि वे पाक की मदद से घाटी को एक स्वतंत्र इस्लामी देश बना लेंगे तो यह उनकी मृगतृष्णा है।

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भारत कश्मीर को किसी कीमत पर नहीं खोएगा। - फोटो : अमर उजाला
भ्रम में हैं पत्थरबाज युवा 
दरअसल, भारत कश्मीर को किसी कीमत पर नहीं खोएगा। कुछ हजार या लाख लोग जो पत्थरबाज बनकर सामने आए हैं और सोचते हैं कि पाक की मदद से भारत की विराट सेना का मुकाबला कर लेंगे तो वे भ्रम में हैं। वे ऐसा नहीं कर सकते। दूसरी तरफ सरकारों को भी सोचना होगा कि हिंसा से किसी समस्या का हल नहीं निकला है। 

कश्मीर में बीते कुछ समय में ऐसा देखने में आया है कि देश की सेना को विवादास्पद बनाने की कोशिशें भी हो रही हैं। बीते कुछ सालों में देश में नेतृत्व की ओर से कश्मीरी अलगाववादियों को एक बार फिर वार्ता के टेबल पर लाने के प्रयास भी नहीं दिखाई दिए हैं। यही नहीं दूसरी ओर अलगाववादियों ने भी युवाओं से हिंसा का रास्ता छोड़कर शांतिपूर्ण तरीके से अधिकारों के लिए लड़ने की अपील नहीं की। 

दरअसल, घाटी में लगातार होती हिंसा कई मायनों में अस्थिरता पैदा करती है। किसी भी समस्या का सही समाधान आखिरी में बातचीत और अहिंसा से ही निकलेगा। 

लेखक इंडियन पुलिस सर्विस के रिटायर्ड अधिकारी हैं। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.
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