फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

6 कारण, इसलिए कश्मीर से हटना था अनुच्छेद 370 और 35 ए

विज्ञापन
कश्मीर को लेकर किया गया ये फैसला ऐतिहासिक फैसला है। - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

एक आधुनिक राष्ट्र-राज्य, जो कि भारत है, के रूप में एक सम्प्रभु गणराज्य की जो परिभाषा है, जिसकी सुनिर्धारित सीमारेखाएं होती हैं और जिसके अधिकार-क्षेत्र में उसकी संसद द्वारा मान्य और एकरूप क़ानून लागू होते हैं, उसमें कोई भी राष्ट्र यह बर्दाश्त नहीं कर सकता कि उसका एक हिस्सा इस तारतम्य से पृथक और निर्लिप्त रहे और स्वयं के भिन्न विधान, निशान और प्रधान की प्रस्तावना करे। इस आलोक में जम्मू-कश्मीर पर आज का निर्णय अत्यंत स्वाभाविक और समुचित है, और आश्चर्य तो यह है कि यह पहले क्यों न हुआ। 

विज्ञापन

 

1) संविधान का अनुच्छेद-25, जो कहता है कि भारत के नागरिकों को अपने धर्म के अनुपालन और प्रचार की स्वतंत्रता है, उसमें यह भी कहा गया है कि यह स्वतंत्रता निर्बाध नहीं है, यह सार्वजनिक नैतिकता और व्यवस्था के अनुरूप होनी चाहिए। फिर इसी अनुच्छेद के दूसरे क्लॉज़ में यह भी साफ़ शब्दों में लिखा गया है कि इस अनुच्छेद का कोई भी प्रावधान राज्यसत्ता द्वारा क़ानून-निर्माण की प्रक्रिया में बाधा नहीं बनना चाहिए। इस आलोक में अब समान नागरिक संहिता सम्बंधी संवैधानिक प्रावधानों की सुस्पष्ट और सतर्क व्याख्या करने और उसमें आवश्यक सुधार करने का भी यही उचित समय है। 
 

2) यदि सीरियाई विस्थापितों को यूरोप में जगह मिलना चाहिए, यदि रोहिंग्याओं को भारत में बसना चाहिए, यदि अवैध घुसपैठिए बांग्लादेशियों की नागरिकता को असम में यथावत् रखा जाना चाहिए, क्योंकि यह मनुष्यता के मानकों और सांस्कृतिक बहुलता के तर्क के अनुरूप है, तब इसी संगति में कश्मीर में भारतवासियों के बसने, सम्पत्तियां ख़रीदने और उसके भारतीय मुख्यधारा का हिस्सा बनने का पथ प्रशस्त हो, यह भी उतना ही उचित है, और अगर नहीं है तो इसे सांस्कृतिक संश्लेष और समावेश के स्थान पर सामुदायिक संरक्षणवाद के प्रतिक्रियावादी मूल्य की अभ्यर्थना माना जाना चाहिए। 

विज्ञापन

3) वास्तव में कश्मीर राजनीतिक समस्या से बढ़कर एक मनोवैज्ञानिक रूढ़ी बन चुका है। - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

3) वास्तव में कश्मीर राजनीतिक समस्या से बढ़कर एक मनोवैज्ञानिक रूढ़ी बन चुका है। उसके मूल में अलगाव की आकांक्षा रही है। ये कहा जाता है कि सन् सैंतालीस में भारत विभाजन के तर्कों के आधार पर कश्मीर को भारत से अलग हो जाना चाहिए था। जबकि कहा यह जाना चाहिए कि धार्मिक आधार पर किसी राष्ट्र का विभाजन सामूहिक अवचेतन में जिस अविश्वास और वैमनस्य की विषबेल को रोप देता है, उसके दूरगामी परिणाम होते हैं और जिस घृणा की राजनीति का हवाला अक्सर उदारवादियों के द्वारा दिया जाता है, उसका मूल 1992 में नहीं, 1947 की घटनाओं में है। इसे निःशंक स्वीकार करने के बाद ही विमर्श के बिंदु निश्चित हो सकेंगे। 
 

4) तकनीकी रूप से कहा जाता है कि कश्मीर में जनमत संग्रह कराया जाना था, जैसे जूनागढ़ में हुआ था। जनमत संग्रह की मांग के पीछे जनसांख्यिकी का आत्मविश्वास था कि वैसी स्थिति में कश्मीर भारतीय मुख्यधारा का हिस्सा नहीं बनने का ही निर्णय लेगा।


तिस पर यह निवेदन करूं कि अगर जनसांख्यिकी के बल पर रेफ़रेंडम से ही फ़ैसले लिए जाने लगे तो यह बहुसंख्यकवाद के उस कुत्सित मूल्य की प्रतिष्ठा होगी, जिसका प्रबल प्रतिकार उदारवादी बौद्धिकता करती है, और अगर यह परिपाटी क़ायम हो गई, तो पहले ही उग्र और अधीर हो रहे भारतीय बहुसंख्यकों को संख्याबल की आज़माइश करने से रोका नहीं जा सकेगा, यह स्पष्ट है। किस क़दम से कौन सी नज़ीर क़ायम होती है, इसका विचार करना भी प्रबुद्ध और सजग बौद्धिकता का दायित्व है।

विज्ञापन

अनुच्छेद 370 भारतीय संविधान का हिस्सा "थी", और उसमें आस्था रखने का अर्थ भारतीय सम्प्रभुता को स्वीकार करना भी है/था - फोटो : अमर उजाला

5) अनुच्छेद 370 भारतीय संविधान का हिस्सा "था", और उसमें आस्था रखने का अर्थ भारतीय सम्प्रभुता को स्वीकार करना भी है/था। सामुदायिक हितों को दृष्टिगत् रखते हुए इस पर दोहरे मानदंड नहीं हो सकते। आपातकाल के दौरान भारतीय संविधान की प्रस्तावना में पंथनिरपेक्षता के मूल्य की प्रतिष्ठा की गई थी, जिसका नामजप करते बौद्धिक थकते नहीं, तब लोकतांत्रिक बहुमत प्राप्त एक निर्वाचित सरकार सदन में क़ानून निर्माण और सार्वजनिक बहस की प्रविधि से एक अंतरिम प्रावधान को समाप्त भी कर सकती है, यह भी उतना ही विधिसंगत है, यह स्मरण रहे। 
 

6) कम्युनल एक्सक्लूसिविज़्म और सेप्रेटिज़्म के दिन अब लद गए हैं। संरक्षणवाद, अलगाववाद और पृथकतावाद की प्रवृत्ति का त्यागकर भारतीय समाज की मुख्यधारा में सम्मिलित हों और मिली-जुली संस्कृति की भावना को पुष्ट करें, यही अनुरोध राष्ट्रीय चेतना के द्वारा इस निर्णय के माध्यम से किया गया है और लोकभावना की सम्मति इसका प्रमाण है।


एक सम्प्रभु गणराज्य के रूप में भारत राष्ट्र को शुभकामनाएं। व्यापक नेशनल नैरेटिव का हिस्सा बनने और अब जाकर सूचना का अधिकार क़ानून का लाभ उठा सकने के लिए कश्मीर को भी मुबारकबाद!


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।            

और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें