3) वास्तव में कश्मीर राजनीतिक समस्या से बढ़कर एक मनोवैज्ञानिक रूढ़ी बन चुका है।
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3) वास्तव में कश्मीर राजनीतिक समस्या से बढ़कर एक मनोवैज्ञानिक रूढ़ी बन चुका है। उसके मूल में अलगाव की आकांक्षा रही है। ये कहा जाता है कि सन् सैंतालीस में भारत विभाजन के तर्कों के आधार पर कश्मीर को भारत से अलग हो जाना चाहिए था। जबकि कहा यह जाना चाहिए कि धार्मिक आधार पर किसी राष्ट्र का विभाजन सामूहिक अवचेतन में जिस अविश्वास और वैमनस्य की विषबेल को रोप देता है, उसके दूरगामी परिणाम होते हैं और जिस घृणा की राजनीति का हवाला अक्सर उदारवादियों के द्वारा दिया जाता है, उसका मूल 1992 में नहीं, 1947 की घटनाओं में है। इसे निःशंक स्वीकार करने के बाद ही विमर्श के बिंदु निश्चित हो सकेंगे।
4) तकनीकी रूप से कहा जाता है कि कश्मीर में जनमत संग्रह कराया जाना था, जैसे जूनागढ़ में हुआ था। जनमत संग्रह की मांग के पीछे जनसांख्यिकी का आत्मविश्वास था कि वैसी स्थिति में कश्मीर भारतीय मुख्यधारा का हिस्सा नहीं बनने का ही निर्णय लेगा।
तिस पर यह निवेदन करूं कि अगर जनसांख्यिकी के बल पर रेफ़रेंडम से ही फ़ैसले लिए जाने लगे तो यह बहुसंख्यकवाद के उस कुत्सित मूल्य की प्रतिष्ठा होगी, जिसका प्रबल प्रतिकार उदारवादी बौद्धिकता करती है, और अगर यह परिपाटी क़ायम हो गई, तो पहले ही उग्र और अधीर हो रहे भारतीय बहुसंख्यकों को संख्याबल की आज़माइश करने से रोका नहीं जा सकेगा, यह स्पष्ट है। किस क़दम से कौन सी नज़ीर क़ायम होती है, इसका विचार करना भी प्रबुद्ध और सजग बौद्धिकता का दायित्व है।
अनुच्छेद 370 भारतीय संविधान का हिस्सा "थी", और उसमें आस्था रखने का अर्थ भारतीय सम्प्रभुता को स्वीकार करना भी है/था
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5) अनुच्छेद 370 भारतीय संविधान का हिस्सा "था", और उसमें आस्था रखने का अर्थ भारतीय सम्प्रभुता को स्वीकार करना भी है/था। सामुदायिक हितों को दृष्टिगत् रखते हुए इस पर दोहरे मानदंड नहीं हो सकते। आपातकाल के दौरान भारतीय संविधान की प्रस्तावना में पंथनिरपेक्षता के मूल्य की प्रतिष्ठा की गई थी, जिसका नामजप करते बौद्धिक थकते नहीं, तब लोकतांत्रिक बहुमत प्राप्त एक निर्वाचित सरकार सदन में क़ानून निर्माण और सार्वजनिक बहस की प्रविधि से एक अंतरिम प्रावधान को समाप्त भी कर सकती है, यह भी उतना ही विधिसंगत है, यह स्मरण रहे।
6) कम्युनल एक्सक्लूसिविज़्म और सेप्रेटिज़्म के दिन अब लद गए हैं। संरक्षणवाद, अलगाववाद और पृथकतावाद की प्रवृत्ति का त्यागकर भारतीय समाज की मुख्यधारा में सम्मिलित हों और मिली-जुली संस्कृति की भावना को पुष्ट करें, यही अनुरोध राष्ट्रीय चेतना के द्वारा इस निर्णय के माध्यम से किया गया है और लोकभावना की सम्मति इसका प्रमाण है।
एक सम्प्रभु गणराज्य के रूप में भारत राष्ट्र को शुभकामनाएं। व्यापक नेशनल नैरेटिव का हिस्सा बनने और अब जाकर सूचना का अधिकार क़ानून का लाभ उठा सकने के लिए कश्मीर को भी मुबारकबाद!
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