कर्नाटक विधानसभा चुनाव अब अपने आखिरी चरण में है, सभी पार्टियों की तैयारियां जोरों पर है। बीजेपी सत्ता में वापसी करना चाहती है लेकिन कर्नाटक की जनता ने हाल के वर्षों में सत्ताधारी दल को दोबारा सत्ता सौंपी नहीं है। दक्षिण भारत में इकलौता दुर्ग होने की वजह से पार्टी इसे किसी भी कीमत पर नहीं खोना चाहती है। यही नहीं, बीजेपी के लिए दक्षिण में पैर पसारने के लिहाज से यह शानदार मौका भी है। पार्टी ने इसके लिए कोई कसर भी नहीं छोड़ी है। पब्लिक रैली हो या वर्चुअल रैली, वीडियो मैसेज हो या पदयात्रा, सभी माध्यमों का इस्तेमाल कर खुद को मतदाताओं से जोड़ने का काम किया जा रहा है।
बीजेपी ने अपने घोषणापत्र के जरिए भी सभी वर्ग के मतदाताओं को लुभाने की कोशिश की है, जोकि स्वाभाविक है। जहां एक तरफ हर बीपीएल परिवार को रोज आधा किलो नंदिनी दूध देने, लोगों को सस्ता अनाज मुहैया कराने और उगादी, गणेश चतुर्थी तथा दीपावली पर तीन गैस सिलिंडर मुफ्त देने जैसे आश्वासन देकर कमजोर तबकों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश की है। वहीं, समान नागरिक संहिता और एनआरसी लागू करने का वादा करके पार्टी ने राष्ट्रीय मुद्दों को भी हवा दे दी है। पार्टी ने शहरी इलाकों में 5 लाख और ग्रामीण इलाकों में 10 लाख घर बनाने का प्रस्ताव भी रखा है।
कर्नाटक में मुसलमानों के लिए आरक्षण को खत्म करने और इसे लिंगायत और वोकालिंगा में बांटने का बीजेपी सरकार का फैसला इस चुनाव का सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक है। पार्टी का तर्क है कि भारतीय संविधान में धर्म आधारित आरक्षण का प्रावधान नहीं है। दरअसल, राज्य में यह मांग लंबे समय लंबित थी। वहीं, विपक्ष का आरोप है कि पार्टी ने दोनों ताकतवर समुदायों को लुभाने के लिए इस कोटा को दोनों समुदायों में बांट दिया है।
पार्टी ने भ्रष्टाचार को लेकर भी कांग्रेस के खिलाफ आक्रामक रुख अख्तियार किया है। चाहे बीजेपी की चुनावी रैली हो या कार्यकर्ता सम्मेलन, 'कांग्रेस मतलब भ्रष्टाचार की गारंटी' का नारा लगता दिख जाएगा। इसके लिए पार्टी सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली पिछली कांग्रेस सरकार पर निशाना साध रही है और कांग्रेस पर भ्रष्टाचार खत्म करने में दिलचस्पी नहीं लेने का आरोप लगा रही है।
प्रधानमंत्री मोदी की अगुवाई में पार्टी ने चुनावी फोकस में विकास के एजेंडे को प्राथमिकता दी है और कमान युवा नेताओं के हाथ में दिया है। इसके अलावा, पार्टी ने राज्य के विकास के लिए 'डबल इंजन सरकार' की ज़रूरत को भी दोहराया है।
इन सबके अलावा, बीएस येदियुरप्पा और बसवराज बोम्मई, ऐसे फैक्टर हैं जिनके जिक्र के बिना कर्नाटक चुनाव अधूरा है। येदियुरप्पा कर्नाटक में एक बड़ा फैक्टर हैं क्योंकि कर्नाटक में पार्टी को खड़ा करने में उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। पार्टी को खड़ा करने से लेकर सत्ता तक लाने में येदियुरप्पा की भूमिका को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। साथ ही, लिंगायत समुदाय के बीच येदियुरप्पा का काफी दबदबा माना जाता है और पार्टी इस बात को पूरी तरह से समझती है।
दरअसल, राज्य में करीब 17 प्रतिशत मतदाता लिंगायत समुदाय से आते हैं। राज्य के किसानों के बीच भी उनकी लोकप्रियता काफी है। वहीं, बसवराज बोम्मई भले ही कर्नाटक में बहुत ज़्यादा लोकप्रिय न हों, लेकिन तथ्य यह है कि वे लिंगायत हैं और उन्हें पार्टी नेतृत्व का पूरा समर्थन हासिल है। हालांकि, कर्नाटक चुनाव जीतने के बाद वे फिर से मुख्यमंत्री पद का चेहरा होंगे या नहीं इस बात की आधिकारिक घोषणा तो फिलहाल नहीं की गई है लेकिन उन्हें बदलने का भी कोई ठोस कारण नज़र नहीं आ रहा है।
224 सीटों वाली कर्नाटक विधानसभा में बहुमत हासिल करने के लिए 113 सीटें चाहिए। 2018 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 36.3% वोट शेयर के साथ सबसे ज़्यादा 104 सीटें मिली थी जबकि 38.1% वोट शेयर और 80 सीटों के साथ कांग्रेस दूसरे नंबर पर थी। वहीं, 18.3% वोट शेयर और 37 सीटों के साथ जेडीएस त्रिशंकु विधानसभा में किंगमेकर की भूमिका में थी।
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