सिनेमा ऑफ जर्मनी: मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि फ़्रांस में सिनेमा का जन्म हुआ और लुमियर भाइयों ने इसे जन्म दिया।
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फ्रांस से शुरू हुई एक यात्रा
मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि फ़्रांस में सिनेमा का जन्म हुआ और लुमियर भाइयों ने इसे जन्म दिया। उन्होंने फ़ैक्टरी से निकलते मजदूरों को फ़िल्माया और इसे 22 मार्च 1895 को पेरिस में लोगों को दिखाया। उन्हें सिनेमा का जनक कहने का यह भी एक मजबूत कारण है। बाद में उन्होंने एक मिनट लंबी कई और फ़िल्में बनाईं।
एक फ़िल्म में अगस्ट लुमियर और उसकी पत्नी अपने बच्चे को खाना खिला रहे हैं, एक अन्य में माली बागीचे में पाइप से पानी पटा रहा है, तभी एक बच्चा पाइप दबा देता है और माली पूरी तरह भींग जाता है, वह दौड़ कर बच्चे को पकड़ता है और चपत लगाता है। इसे हम प्रथम कॉमेडी फ़िल्म कह सकते हैं। सिनेमा अन्य कलाओं से भिन्न है। अधिकाँश अन्य कलाएँ द्विआयामी होती हैं, मगर सिनेमा हमें त्रिआयामी आभास देता है।
जल्द बहुत सारे देश सिनेमा बनाने और दिखाने लगे। आज जिसे हम विश्व सिनेमा कहते हैं वह असल में किसी एक तरह का सिनेमा नहीं है। यहां तक कि जिन्हें हम यूरोपियन सिनेमा, अमेरिकन सिनेमा, एशियाई सिनेमा, अफ़्रीकन सिनेमा, ऑस्ट्रेलियन सिनेमा. लातीनी सिनेमा कहते हैं, इनमें से प्रत्येक के भीतर तमाम तरह की भिन्नता है। जैसे जब हम यूरोपियन सिनेमा कहते हैं तो यह किसी एक प्रकार का या एक तरह की विशेषता लिए हुए सिनेमा नहीं है।
यूरोप विभिन्न देशों का पुंज है और हर देश का सिनेमा अलग होता है। यहां तक कि एक देश में भी कई तरह का सिनेमा बनता है। यूरोपियन सिनेमा में भी ब्रिटेन का सिनेमा फ़्रांस के सिनेमा से बिल्कुल अलग है, फ़्रांस का सिनेमा जर्मन सिनेमा जैसा नहीं है, इटली से आने वाला सिनेमा फ़्रांस और ब्रिटेन सिनेमा या जर्मन सिनेमा से बहुत अलग होता है। जर्मनी में तरह-तरह का सिनेमा बनता है। स्पेनश और रोमानिया यूरोप में हैं मगर इनका सिनेमा बिल्कुल भिन्न है। और पुर्तगाली सिनेमा। देखेंगे तो अंतर पता चलेगा।
भले ही अमेरिकन सिनेमा को ‘फ़र्स्ट सिनेमा’ या ‘फ़र्स्ट वल्ड सिनेमा’ कहा जाता है पर अमेरिकन सिनेमा कई प्रकार का है। एकमात्र हॉलीवुड अमेरिकन सिनेमा नहीं है अमेरिका में हॉलीवुड के अलावा इंडिपेंडेंट सिनेमा बनता है, स्टूडियो सिस्टम है, अब वहाँ एक नई लहर ‘न्यू वेव’ के नाम से आई है। इसी तरह जिसे ‘थर्ड सिनेमा’ या ‘थर्ड वल्ड सिनेमा’ कहते हैं उसमें भारत, जापान, चीन, श्रीलंका, इरान, अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान और कई अन्य देश आते हैं और इनमें से प्रत्येक देश के सिनेमा की अपनी खासियत है।
जाहिर है इसमें भारत को ही ले लें। खासकर भारत के बाहर के लोग समझते हैं कि मुंबई या बॉलीवुड सिनेमा ही भारतीय सिनेमा है। हम जानते हैं पंजाब का सिनेमा मराठी सिनेमा से कोई साम्य नहीं रखता है और मराठी सिनेमा तमिल या तेलगू सिनेमा नहीं है। मणिपुरी सिनेमा और असमी सिनेमा एक-दूसरे से बहुत भिन्न है जबकि अक्सर उन्हें नॉर्थ-ईस्ट के खाते में एक साथ डाल दिया जाता है।
शुरुआती सिनेमा कई मंजिलें पार कर चुका है, मूक फ़िल्म सवाक हुई और तकनीकि के विकास के साथ इसके तकनीकि पक्ष में अनेकानेक परिवर्तन हुए हैं। इस विकास से, भिन्न देशों में सिनेमा किन स्थितियों से गुजर कर आज कहां पहुँचा है, यही सब हम आगे देखने वाले हैं।
विश्व सिनेमा की सैर जारी रहेगी-अगली कड़ी-क्रमश:
डॉ. विजय शर्मा, PHD समालोचक, सिनेमा विशेषज्ञ और विश्व सिनेमा की गहरी अध्येता हैं. विश्व सिनेमा/साहित्य और अनुवाद को केंद्र में रखकर उन्होंने तकरीबन 26 पुस्तकें लिखी हैं. पिछले 11 वर्षों से वे साहित्य, सिनेमा की कला संस्था ‘सृजन संवाद’ का संचालन कर रही हैं. वे 5वें चलचित्रम् नेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल जूरी और न्यूयॉर्क इंडियन फिल्म फेस्टिवल की जूरी में शामिल रही हैं.
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