ट्रंप से मुलाकात के दौरान किम मिसाइल परीक्षण रोकने पर सहमत हुए थे
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परमाणु हथियारों पर नियंत्रण के लिहाज से ट्रंप की नीति सिर्फ ईरान मामले में ही फेल नहीं रही। बल्कि ऐसा ही उत्तर कोरिया के मामले में हुआ। हाल में अपनी पार्टी के महाधिवेशन में उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन ने उन परमाणु हथियारों और मिसाइलों की लिस्ट गिनाई, जिन्हें उनका देश तैयार कर रहा है। जबकि इन्हीं हथियारों पर नियंत्रण के लिए ट्रंप ने अमेरिकी की लंबे समय से चली आ रही नीति को छोड़ कर किम से मुलाकात की थी। इसे उत्तर कोरिया की कूटनीतिक जीत माना गया, क्योंकि इसके पहले सभी अमेरिकी राष्ट्रपति उत्तर कोरियाई नेता से मिलने से इनकार करते रहे थे।
ट्रंप से मुलाकात के दौरान किम मिसाइल परीक्षण रोकने पर सहमत हुए थे। लेकिन आगे चल कर जब वार्ता टूट गई, तो उत्तर कोरिया ने अपने परमाणु हथियारों के भंडार को बढ़ाना शुरू कर दिया। परमाणु हथियारों पर नजर रखने वाली संस्था स्टॉकहोम पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) के मुताबिक उत्तर कोरिया के पास 2016 में 10 परमाणु हथियार थे। आज इनकी संख्या 30 से 40 के बीच है। जानकारों का मानना है कि ट्रंप की नीतियों की कारण आज अमेरिका के दो सहयोगी देशों- दक्षिण कोरिया और जापान के लिए उत्तर कोरियाई से खतरा काफी बढ़ चुका है।
ट्रंप ने रूस के साथ मौजूद परमाणु हथियार नियंत्रण संधियों को भी बेअसर कर दिया है। शीत युद्ध के दिनों में हुई ये संधियां अभी हाल तक लागू थीं। लेकिन ट्रंप प्रशासन ने इंटरमीडिएट रेंज न्यूक्लीयर फोर्सेज ट्रीटी से अमेरिका को हटा लिया। इस संधि के तहत 500 से 5500 किलोमीटर तक मार करने वाली बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों के परीक्षण पर रोक थी। लेकिन अमेरिका के संधि से हटने के बाद रूस ने एक ऐसी मिसाइल का परीक्षण किया, जो ढाई हजार किलोमीटर तक निशाना साध सकती है।
ट्रंप प्रशासन ने पिछले नवंबर में ओपन स्काई संधि से भी अमेरिका को निकाल लिया। 1992 में हुई इस संधि में 34 देश शामिल हैं। इसके तहत इन देशों को एक दूसरे के ऊपर निगरानी उड़ान भरने की इजाजत मिली हुई थी। पिछले हफ्ते रूस ने भी इस संधि से खुद हटाने की घोषणा की।
विश्लेषकों में आम राय है कि ट्रंप एक ऐसी दुनिया बाइडन को सौंप कर गए हैं, जिसमें गलत सूचनाओं का प्रचार और साइबर हमले का खतरा बढ़ा हुआ है। साथ ही अमेरिका की क्षमताओं को लेकर शक गहराया हुआ है। बाइडन प्रशासन के लिए इन स्थितियों से निपटना आसान नहीं होगा। लेकिन अगर वह ऐसा करने में नाकाम रहा, तो बतौर महाशक्ति अमेरिका के अस्तित्व पर सवाल उठ जाएंगे।
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