जीवन के कुछ निर्णय ऐसे होते हैं, जिन पर न कोई सलाह काम करती है, न कोई बाहरी सहारा। कोई तुम्हें यह नहीं बता सकता कि तुम्हें क्या बनना है, क्या करना है और किस दिशा में चलना है। तुम्हारे लिए केवल एक ही मार्ग है, अपने भीतर उतरना और उस गहरे स्रोत तक पहुंचना, जहां से तुम्हारी सच्ची आकांक्षाएं जन्म लेती हैं। उस कारण को खोजो, जो तुम्हें लिखने के लिए प्रेरित करता है। खुद से ईमानदारी से पूछो कि क्या इसकी जड़ें तुम्हारे हृदय में गहराई तक फैली हैं? क्या तुम यह स्वीकार कर सकते हो कि यदि तुम्हें लिखने से रोक दिया जाए, तो तुम्हारा अस्तित्व अधूरा रह जाएगा? रात की सबसे शांत घड़ी में, जब संसार का शोर थम जाए और केवल तुम्हारी धड़कनें तुम्हारा साथ दें, तब स्वयं से पूछो, ‘क्या मुझे लिखना ही है?’ यदि भीतर से स्पष्ट, अटल और शांत स्वर उठे, ‘हां, मुझे लिखना ही है,’ तो अपने जीवन को उसी पर आधारित कर दो। फिर लेखन तुम्हारा शौक नहीं रहेगा, वह तुम्हारा धर्म बन जाएगा। अपने जीवन के सबसे साधारण क्षणों को भी इस आंतरिक पुकार का प्रमाण बना दो।
आकाश को ऐसे देखो, जैसे पहली बार देख रहे हो। हवा को ऐसे महसूस करो, जैसे उसका स्पर्श अभी-अभी खोजा हो। स्वयं को ऐसा मानो, जैसे तुम इस धरती पर पहले मनुष्य हो। जो देखो, जो अनुभव करो, जो प्रेम करो और जो खो दो, उसी को लिखो। और लिखो ऐसे, जैसे पहले लिखा ही न गया हो। बड़े विषयों की चमक में अपनी सच्चाई को खोने मत दो। अपने दैनिक जीवन की छोटी-छोटी बातों को अपनाओ। अपने दुखों, अपनी इच्छाओं, अपने क्षणिक विचारों, अपने विश्वासों और अपने संदेहों को शांत, गहन और विनम्र स्वर दो।
यदि कभी तुम्हें अपना जीवन साधारण और नीरस लगे, तो जीवन को दोष मत दो। स्वयं से कहो कि तुम अभी उतने सजग नहीं बने कि उसकी छिपी हुई संपदा को पहचान सको। हर अनुभव, हर स्मृति, हर पीड़ा और हर प्रसन्नता उसके लिए रचना का बीज होती है। यदि तुम एकांत में भी हो, यदि चारों ओर सन्नाटा हो, तब भी तुम्हारे भीतर स्मृतियों का एक विस्तृत संसार है। तुम्हारा बचपन, तुम्हारे सपने, तुम्हारे पुराने घाव, यही तुम्हारा खजाना है। उसी में उतर जाओ। धीरे-धीरे तुम्हारा एकांत तुम्हारा आश्रय बन जाएगा, और तुम उसमें शांति पाओगे। यदि इस गहन आत्म-अवलोकन से कविता जन्म ले, तो उसकी गुणवत्ता पर प्रश्न मत उठाओ। बस उसे लिखो। सच्ची कला वही है, जो अनिवार्यता से उत्पन्न होती है। सृजनकर्ता को अपना संपूर्ण संसार अपने भीतर ही खोजना होता है। यदि भीतर से उत्तर मिले कि तुम्हें लिखना है, तो उस पुकार को स्वीकार करो, उसके भार और उसके गौरव, दोनों को। और यदि उत्तर यह हो कि तुम बिना लिखे भी जी सकते हो, तब भी यह यात्रा व्यर्थ नहीं जाएगी। भीतर की यह खोज तुम्हें तुम्हारे जीवन का सच्चा, शांत और गहन मार्ग दिखा देगी।
-लेटर्स टू ए यंग पोएट के अनूदित अंश
सूत्र: लक्ष्य के प्रति अडिग रहें
जब आप बाहर की आवाजों को शांत कर अपने भीतर उतरते हैं, तभी वह सच्चा उत्तर मिलता है, जो जीवन की दिशा तय करता है और अपने लक्ष्य के प्रति अडिग बना देता है। यदि हृदय की गहराई से यह स्वर उठे कि लिखना ही है, तो उसे ही अपना धर्म मानकर जीवन के हर साधारण क्षण को अर्थपूर्ण और उज्ज्वल बना दो।