फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

जीवन धारा: जो हममें है, वही हिमालय में है; खुद को लहर नहीं, सागर समझें

Mon, 28 Apr 2025 06:11 AM IST
दीपक कुमार शर्मा फ्रित्जॉफ काप्रा

सार

हम दुनिया के किसी पदार्थ का अवलोकन करें, तो इससे हमें पूरी दुनिया की बुनियादी जानकारी मिल सकती है। पूरी दुनिया एक-दूसरे से गुंथी दिखती है। हर पदार्थ समग्र दुनिया के भाग के रूप में दिखता है।
विज्ञापन
सांकेतिक - फोटो : अमर उजाला प्रिंट
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

हिंदू पौराणिक परिदृश्य में ईश्वर दुनिया से अलग नहीं है। ईश्वर दुनिया का निर्माण करता है और इस नाते दुनिया के कण-कण में ईश्वर की ही व्याप्ति है। ईश्वर द्वारा दुनिया के निर्माण की यह रचनात्मक प्रक्रिया लीला कहलाती है। इसके अनुसार, ब्रह्म एक महान जादूगर है, जो खुद को दुनिया में बदल लेता है और फिर अपनी जादुई रचनात्मक शक्ति के साथ यह करतब करता है, जो ऋगवेद में माया का मूल अर्थ है।

विज्ञापन


यह पूरी दुनिया, हम सब सागर की लहरों के समान हैं और जब तक हम यह समझते रहते हैं कि लहरों के रूप में हमारा स्वतंत्र अस्तित्व है, तब तक हम माया के चंगुल में फंसे रहते हैं। जब हम समझ लेते हैं कि हम अलग-अलग लहरें न होकर एक सागर ही हैं, तब बेचैनी खत्म हो जाती है। गहन ध्यान की स्थिति में होने वाले आध्यात्मिक अनुभव ही हमें महसूस कराते हैं कि हम एक ही हैं। इस ब्रह्मांड में सबकुछ जुड़ा हुआ है। सबकुछ एक ही है। भौतिक विज्ञान का क्वांटम सिद्धांत भी कुछ इसी तरह की बात करता है। क्वांटम सिद्धांत ब्रह्मांड में एक बुनियादी एकता को प्रकट करता है। यह दर्शाता है कि हम दुनिया को स्वतंत्र छोटी इकाईयों में विभाजित नहीं कर सकते। हिमालय के एक टुकड़े में जो विशेषताएं पाई जाती हैं, वही समग्र हिमालय में पाई जाती हैं। उसी तरह, अगर हम दुनिया के किसी एक पदार्थ का अवलोकन करें, तो इससे हमें पूरी दुनिया की बुनियादी जानकारी मिल सकती है।

पूरी दुनिया एक-दूसरे से गुंथी दिखती है। हर पदार्थ समग्र दुनिया के एक भाग के रूप में दिखता है। ये संबंध दृष्टा से अलग नहीं होते। दृष्टा किसी भी प्रयोग की अंतिम व सबसे महत्वपूर्ण कड़ी होता है। इन आध्यात्मिक अनुभवों और विज्ञान को अमूमन बिल्कुल विपरीत क्षेत्र माना जाता है। हालांकि, वैज्ञानिक प्रयोगों और आध्यात्मिक अनुभवों की प्रकृति बिल्कुल अलग होने के बावजूद दोनों में समानता हैरत में डालती है। भौतिक विज्ञानी एक विस्तृत टीम और अत्यधिक परिष्कृत तकनीक से जुड़े प्रयोग करते हैं, जबकि रहस्यवादी बगैर किसी मशीनरी के, ध्यान की गोपनीयता में, आत्मनिरीक्षण के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करते हैं।
विज्ञापन


इसके अतिरिक्त, वैज्ञानिक प्रयोग किसी भी समय और किसी के द्वारा भी दोहराए जा सकते हैं, बशर्ते सही प्रक्रिया का पालन हो। आध्यात्मिक अनुभव कुछ खास व्यक्तियों को कुछ खास अवसरों पर ही हो पाते हैं। अगर इन दोनों का नजदीकी परीक्षण करें, तो पाएंगे कि दोनों प्रकार के अवलोकनों के बीच फर्क दृष्टिकोण में है, न कि उनकी विश्वसनीयता या जटिलता में। आधुनिक भौतिकी में जो कोई भी प्रयोग को दोहराना चाहता है, उसे कई वर्षों का प्रशिक्षण लेना पड़ता है। तभी वह अपने प्रयोग के जरिये प्रकृति से कोई खास सवाल पूछ सकेगा और उसका जवाब भी समझ सकेगा। इसी तरह, एक गहन रहस्यमय अनुभव के लिए एक अनुभवी गुरु के अधीन कई वर्षों तक प्रशिक्षण लेना पड़ता है। वैज्ञानिक प्रशिक्षण की तरह गुरु के अधीन वर्षों का प्रशिक्षण ही अकेले सफलता की गारंटी नहीं होता। जाहिर है कि भौतिकी के प्रयोग और आध्यात्मिक अनुभव में ज्यादा फर्क नहीं होता।  (फ्रित्जॉफ काप्रा की किताब ‘ताओ ऑफ फिजिक्स’ से अनूदित)

खुद को लहर नहीं, सागर समझें
आम तौर पर लोग अध्यात्म और भौतिक विज्ञान को अलग-अलग समझते हैं। इस ब्रह्मांड में सबकुछ एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है-इसे विज्ञान और अध्यात्म दोनों मानते हैं। हम सभी इस दुनिया रूपी सागर का हिस्सा हैं, अलग-अलग लहरें नहीं। जब तक हम खुद को लहर समझते हैं, माया में फंसे रहते हैं। इसलिए खुद को लहर नहीं, सागर समझें।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें