बदलाव का पहला कदम यह स्वीकार करना है कि हमारे भीतर भी कुछ ऐसा है, जिसे बदलने की जरूरत है
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हम सभी अपने जीवन में कुछ न कुछ बदलना चाहते हैं। कोई अपनी आदतें सुधारना चाहता है, कोई अपने रिश्तों को बेहतर बनाना चाहता है और कोई अपने डर से उबरकर आगे बढ़ना चाहता है। कई बार हम यह भी समझते हैं कि हमारे जीवन में क्या गलत हो रहा है और उसे ठीक करने के लिए हमें क्या करना चाहिए। इसके बावजूद हम वही पुराने ढर्रे पर चलते रहते हैं। हम बदलाव के बारे में सोचते हैं, उसके फायदे भी जानते हैं, पर जब उसे अपने जीवन में उतारने की बारी आती है, तो किसी न किसी बहाने से पीछे हट जाते हैं। बदलाव के प्रति विरोध कई बार हमारी अपनी सोच और उन मान्यताओं से पैदा होता है, जिन्हें हमने लंबे समय से अपने भीतर जगह दे रखी है। हम अक्सर मान लेते हैं कि अब कुछ नहीं बदला जा सकता। धीरे-धीरे ये विचार हमारे व्यवहार का हिस्सा बन जाते हैं और हम अपनी ही बनाई सीमाओं में सिमटकर रह जाते हैं।
यह विरोध हमेशा सीधे दिखाई नहीं देता। कई बार इसके संकेत हमारी रोजमर्रा की आदतों में छिपे होते हैं। जरूरी काम को बार-बार टालना या काम शुरू करने के बजाय दूसरे कामों में उलझे रहना भी बदलाव से बचने के तरीके हो सकते हैं। हम अपने व्यवहार को सही ठहराने के लिए तरह-तरह के तर्क गढ़ते हैं। और अपने परिवार, दोस्तों, परिस्थितियों या समाज को जिम्मेदार ठहराते हैं। इस तरह बदलाव की जिम्मेदारी अपने हाथ में लेने के बजाय हम उसके लिए बाहर कोई कारण खोजने लगते हैं। बदलाव के रास्ते की सबसे बड़ी बाधाओं में से एक अज्ञात का भय है।
हमें इस बात का डर सताता रहता है कि पुरानी आदतें छोड़ने पर भविष्य में क्या होगा और लोग क्या कहेंगे। यही अनिश्चितता का भय हमें ऐसी जानी-पहचानी परिस्थितियों में ही उलझाए रखता है, जो हमारे लिए हितकर न होने पर भी एक झूठी सुरक्षा का एहसास कराती हैं। हमारी बार-बार दोहराई जाने वाली आदतें और परेशानियां भी हमारे भीतर मौजूद कुछ अधूरी जरूरतों या मान्यताओं की ओर इशारा करती हैं। इसलिए केवल किसी आदत को जबर्दस्ती छोड़ देना पर्याप्त नहीं है। उसके पीछे छिपे कारण को समझना भी जरूरी है।
बदलाव का पहला कदम यह स्वीकार करना है कि हमारे भीतर भी कुछ ऐसा है, जिसे बदलने की जरूरत है। इसके लिए स्वयं को दोषी ठहराने की नहीं, बल्कि ईमानदारी से अपने विचारों को परखना जरूरी है। जब हम पुराने डर और मान्यताओं को पहचानकर उनसे आगे बढ़ने की इच्छा रखते हैं, तभी नए रास्तों की संभावना बनती है। जीवन में आगे बढ़ने के लिए कभी-कभी सबसे जरूरी काम यही होता है कि हम उस चीज को छोड़ने के लिए तैयार हों, जिसे अब तक कसकर पकड़े हुए हैं।
(यू कैन हील योर लाइफ के अनूदित अंश)
सूत्र- छोटे कदम उठाएं
अक्सर हमें आगे बढ़ने से परिस्थितियां नहीं, बल्कि हमारे अपने डर और पुरानी मान्यताएं रोकती हैं। जब तक हम उन्हें सच मानकर पकड़े रहेंगे, नए रास्ते हमारे सामने नहीं खुलेंगे। इसलिए बीते हुए अनुभवों और असफलताओं को अपनी सीमाएं न बनने दें। अपनी सोच को बदलने की इच्छा जगाएं, छोटे कदम उठाएं और खुद को एक नया अवसर दें।