राजस्थान की राजधानी जयपुर में रविवार देर रात शॉर्ट सर्किट से लगी आग ने 8 जिंदगियां लील लीं। आंकड़ा और बढ़ सकता है। ट्रोमा सेंटर के आईसीयू वार्ड में भर्ती मरीजों और उनके परिजनों के अनुसार 20 मिनट पहले बिजली के तारों से धुआं निकलना शुरू हुआ था, जिसकी जानकारी तत्काल स्टाफ को दी गई थी।
किसी ने ध्यान नहीं दिया। जब धुआं बढ़ा और आग भड़की तो वार्ड ब्वॉय भाग निकले। परिजन ही अपने मरीजों को बेड समेत सड़क पर लेकर भागे।
राजस्थान या देश में अस्पतालों में आग लगने की घटनाएं अब केवल दुर्घटनाएं नहीं रह गई हैं, बल्कि यह प्रशासनिक लापरवाही और सुरक्षा व्यवस्था की गंभीर कमी का परिणाम हैं। देश के कई बड़े सरकारी और निजी अस्पतालों में आग लगने से मरीजों की जानें जा चुकी हैं।
दुःख की बात यह है कि हर घटना के बाद जांच बैठती है। बयान दिए जाते हैं, लेकिन कुछ महीनों में सबकुछ पहले जैसा हो जाता है। आखिर क्यों हमारे अस्पताल, जो जीवन बचाने के लिए बने हैं, वही मौत के केंद्र बन जाते हैं?
जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल में वर्ष 2021, 2022 और 2024 में अलग-अलग वार्डों में आग लगी। कई जगह शॉर्ट सर्किट या ऑक्सीजन पाइपलाइन के पास चिंगारी को कारण बताया गया। बीकानेर और जोधपुर के अस्पतालों में भी ऐसी घटनाएं दर्ज हुईं।
राजस्थान सरकार ने हर बार जांच के आदेश दिए। फायर सेफ्टी ऑडिट की बात कही, लेकिन वास्तविक सुधार की रफ्तार बहुत धीमी रही। यह स्पष्ट संकेत है कि अस्पतालों में सुरक्षा मानकों को लेकर न तो पर्याप्त सजगता है और न ही जिम्मेदारी तय करने की ठोस व्यवस्था।
दरअसल, अस्पतालों में आग लगने के मुख्य कारण लगभग हर जगह एक जैसे हैं। सामान्यतः देखा गया है कि बिजली की पुरानी वायरिंग व ओवरलोडिंग, ऑक्सीजन पाइपलाइन एवं इलेक्ट्रिकल यूनिट का पास-पास होने, फायर फाइटिंग उपकरणों का निष्क्रिय या पुराने होने, आपातकालीन निकास का अवरुद्ध रहने, कर्मचारियों में अग्निशमन की ट्रेनिंग के अभाव और फायर सेफ्टी एनओसी का समय पर न होने के कारण ऐसी घटनाएं होती हैं।
अक्सर देखा गया है कि अस्पताल भवनों के नक्शे स्वीकृत होने के बाद वर्षों तक फायर ऑडिट नहीं कराया जाता। कुछ जगह तो अस्पताल बिना फायर एनओसी के ही चल रहे हैं। यह केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि जान के साथ खिलवाड़ है।
हालांकि, राजस्थान सरकार ने हाल के वर्षों में कुछ महत्वपूर्ण कदम जरूर उठाए हैं। जैसे, सभी सरकारी अस्पतालों में फायर सेफ्टी ऑडिट अनिवार्य किया गया। स्मोक डिटेक्टर, फायर अलार्म और स्प्रिंकलर सिस्टम लगाने के आदेश दिए गए। बिजली सिस्टम और ऑक्सीजन पाइपलाइन की अलग-अलग लाइनों का प्रावधान किया गया। फायर डिपार्टमेंट को निर्देश दिए गए कि हर छह महीने में निरीक्षण रिपोर्ट तैयार करें।
नए अस्पताल भवनों के लिए नियम बनाया गया है कि फायर डिपार्टमेंट की मंजूरी के बिना नक्शा पास नहीं होगा। विडंबना यह है कि जमी,नी स्तर पर इन आदेशों के पालन में कमी है। कई जिलों में फायर उपकरण या तो काम नहीं करते या पुराने हैं। ऑडिट रिपोर्ट बनती तो है, लेकिन उस पर अमल नहीं होता।
वैसे, यदि कागजी बात करें तो राज्य सरकार की पहल सराहनीय हैं, लेकिन क्रियान्वयन स्तर पर यह प्रभावी नहीं दिखतीं। फायर ऑडिट केवल औपचारिकता बन गया है। अस्पताल प्रशासन रिपोर्ट जमा कर देता है, लेकिन वास्तविक सुधार नहीं करता। राज्य स्तर पर न तो फायर सेफ्टी के लिए कोई सशक्त निगरानी प्राधिकरण है और न ही जवाबदेही तय करने की सख्त व्यवस्था है।
अक्सर हादसे के बाद कहा जाता है कि आग शॉर्ट सर्किट से लगी, पर असली सवाल यह है कि शॉर्ट सर्किट हुआ क्यों? क्या वायरिंग समय पर बदली गई थी? क्या इमरजेंसी प्लान तैयार था? क्या फायर ड्रिल की गई थी? जब इन सवालों के जवाब 'नहीं' में मिलते हैं तो स्पष्ट होता है कि सुरक्षा व्यवस्था कागजों में है, जमीन पर नहीं।
आखिर क्या किया जाए, जिससे अस्पतालों में आग की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। केवल कागजों में नहीं, हकीकत में फायर सेफ्टी ऑडिट को अनिवार्य और सार्वजनिक बनाया जाए। छह महीने में अस्पताल अपनी वेबसाइट पर फायर सेफ्टी रिपोर्ट जारी करें।
बिजली और गैस पाइपलाइन की रूट मैपिंग की जाए। पैनल रूम, जनरेटर और ऑक्सीजन लाइनों के बीच सुरक्षित दूरी सुनिश्चित की जाए। फायर फाइटिंग उपकरणों की नियमित जांच हो।
प्रत्येक तीन महीने में स्मोक डिटेक्टर, स्प्रिंकलर और सिलेंडर की जांच जरूरी हो। सबसे जरूरी अस्पताल स्टाफ के लिए फायर ड्रिल अनिवार्य हो। डॉक्टर, नर्स और वार्ड ब्वॉय, सभी को हर तीन महीने में आग से निपटने की ट्रेनिंग दी जाए। साथ ही, पुराने भवनों का पुनर्निर्माण हो।
जो अस्पताल 25–30 साल पुराने हैं, उनकी वायरिंग और वेंटिलेशन सिस्टम पूरी तरह बदले जाएं। तकनीकी समाधान अपनाए जाएं। इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी) आधारित सेंसर व अलार्म सिस्टम लगाए जाएं, जो तापमान या धुआं बढ़ते ही अलर्ट भेज दें। सबसे महत्वपूर्ण, जवाबदेही तय की जाए।
अस्पतालों में आग केवल चिंगारी से नहीं लगती, वह लापरवाही से भड़कती है। अस्पतालों में आग की घटनाएं केवल तकनीकी त्रुटि भर नहीं हैं, बल्कि व्यवस्था की विफलता है। अस्पताल में मरीज इलाज की उम्मीद लेकर आते हैं, यदि वहां सुरक्षा ही नहीं है तो यह शासन और समाज, दोनों की हार है।
राजस्थान सरकार या अन्य राज्यों को चाहिए कि इन घटनाओं को केवल जांच रिपोर्ट तक सीमित न रखें, बल्कि एक ऐसी स्थायी सुरक्षा नीति बनाएं, जो हर अस्पताल के ढांचे और संचालन का हिस्सा बने। आवश्यकता हर स्तर पर पारदर्शिता, जवाबदेही और आधुनिक तकनीक के उपयोग की है।
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