जगजीत जब गजलगायकी की दुनिया में आए तब इसपर शुद्धतावादी सोच हावी थी
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फिर 1983 में महेश भट्ट की फिल्म ‘अर्थ’ आई। इसमें भी जंगजीत सिंह का संगीत और आवाज दोनों थे। फिल्म में कुल पांच गाने थे, जिनमें तीन मशहूर गजलकार कैफी आजमी की गजले थीं। तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो, झुकी झुकी सी नजर, कोई ये कैसे बताए – जगजीत की आवाज पाकर इन तीनों गजलों ने लोकप्रियता का अलग मुकाम हासिल किया।
गौर करें तो जगजीत जब गजलगायकी की दुनिया में आए तब इसपर शुद्धतावादी सोच हावी थी। मुश्किल उर्दू जुबान में कही जाने वाली गजलें और उसपर उतने ही मुश्किल ढंग से लंबा-लंबा व आलाप लेकर किया जाने वाला उनका गायन भारतीय आम आदमी के लिए सहज और सुग्राह्य नहीं था। जगजीत ने इन दिक्कतों को समझा और प्रयोगधर्मिता का परिचय देते हुए गजलगायन की अपनी एक नवीन और स्वतंत्र शैली विकसित की।
ऐसा नहीं कि उन्होंने अपने गायन में शास्त्रीयता की उपेक्षा की, लेकिन उसके अनावश्यक बोझ से गजल को आजाद कर उसे सामान्य लोगों के लिए सहज और आकर्षक बनाने पर जोर दिया। हारमोनियम, वायलिन जैसे संगीत के आधुनिक उपकरणों को प्रयोग में लाए। गजल में भी कोरस की प्रथा की शुरुआत की। कुल मिलाकर जगजीत ने भारतीय गजल का एक तरह से कायाकल्प ही कर दिया।
गजलों के चयन को लेकर भी वे बेहद गंभीर रहा करते थे। एक साक्षात्कार में जब इस विषय में उनसे पूछा गया तो उनका कहना था, “मेरे पास जब भी कोई गजल, कलाम आता है, तो सबसे पहले मैं उसकी जबान देखता हूं। जबान सिंपल होनी चाहिए।”
हल्की गजलें उनसे नहीं गवाई जा सकती थीं। यहां तक कि किसी गजल के यदि कुछ शेर बेहतर और कुछ हल्के होते तो वे पूरी गजल की बजाए अपने गाने के लिए बस बेहतर शेरों को ही रखते थे।
गजल की दुनिया में जो प्रभाव बेगम अख्तर, कुंदनलाल सहगल, तलत महमूद, मेहदी हसन जैसों का था, उससे हटकर जगजीत सिंह की नई शैली शुद्धतावादियों को भले रास नहीं आई, लेकिन आम आदमी ने इसको खूब-खूब पसंद किया और जगजीत लोगों की जुबान पर चढ़ गए।
जगजीत सिंह ने भी गजल की शुद्धता से खिलवाड़ की तमाम आलोचनाओं के बावजूद अपना तरीका नहीं बदला और न ही उनके चाहने वालों ने उनकी लोकप्रियता में ही कभी कोई कमी आने दी। गजल के अलावा उन्होंने भजन भी गाए। ‘हे राम’ उनका बेहद लोकप्रिय भजन-संग्रह है। साथ ही, उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी की कविता ‘क्या खोया, क्या पाया’ को गीतबद्ध करके आवाज भी दी।
यही 10 अक्टूबर की तारीख थी, जब 2011 में ब्रेन हेमरेज के कारण उनकी मृत्यु हुई और इसीवके साथ भारतीय गजल की दुनिया में जो शून्य व्याप्त हुआ, उसकी भरपाई अबतक नहीं हो सकी है।
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