यही वजह है कि यहां कोई हैलो डॉक्टर, या फिर हैलो टीचर नहीं बोलता। बल्कि सभी को नाम से पुकारते हैं। यहाँ तक की देश के प्रधानमंत्री तक से बातें करने में भी नाम से पुकारना ज्यादा उपयुक्त माना जाता है। केवल यहां के राजा को किंग बोलकर और संसद के अंदर स्पीकर को विशेषण से संबोधित करते हैं। ऐसा नहीं है कि यहां लोगों को सम्मान नहीं दिया जाता या फिर सम्मान करना संस्कृति में नहीं है। लेकिन सम्मान के लिए विशेष शब्दों का चयन यहां नहीं किया गया है। माना जाता है कि सम्मान देने के लिए विनम्रता से पेश आएं और कर्म से अपने सम्मान को दर्शाएं।
ठीक इसी तरह अगर आप नौकरी के लिए आवेदन कर रहे है तो डियर सर या मैडम से आवेदन पत्र की शुरूआत की तो मतलब नौकरी मिलने की संभावना आधी। ऐसे आवेदन को कोई स्वीकार भी नहीं करेगा। इसकी जगह आप नाम से संबोधित करें ताकि यह पता हो कि आप किसे नौकरी के लिए आवेदन कर रहे हैं। नाम में सर या मैडम शब्द का इस्तेमाल निरर्थक माना जाता है।हां, अगर आप नाम नहीं जानते तो हैलो लिखकर काम चला लिजिए। यह डियर सर का बेहतर विकल्प है।
कमोबेश यूके में भी यही चलन है। वे बिना वजह किसी को सर या मैडम की पदवी नहीं देते। अगर आप देंगे तो संभव है कि कोई पूछ भी दे कि क्या मैंने कोई बड़ा काम कर दिया है जो मेरे नाम के आगे सर लगा रहे हैं। आपको अजीब तो तब लगेगा जबकि स्वीडन में बच्चे अपने शिक्षक को भी नाम से पुकारते मिले। लेकिन यहां के लिए यही सही है। क्योंकि शिक्षक कहते हैं कि उनका एक नाम है जिससे उन्हें कोई पुकारे तो बुरा नहीं लगेगा।
शिक्षा देना उनका पेशा है। इसलिए ज़रूरी नहीं कि उन्हें उनके पेशे से पुकारा जाए। रही बात सम्मान की तो वह बच्चे और शिक्षक दोनों अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हुए एक- दूसरे को दे रहे हैं। और एक दूसरे को समझते-सिखाते हुए वे दोस्त भी बन रहे हैं।उनके इस किरदार में जी, सर या मैडम ज्यादा फिट नहीं बैठता। इसलिए नाम से ही पुकारा जाना चाहिए।
मैं स्वीडिश सीखने के लिए जिस संस्थान में जाती हूं वहां मैंने जब अपने टीचर से पूछा कि क्या उन्हें सर कहकर पुकार सकती हूं तो उन्होंने तुरंत मना कर दिया। कहने लगे कि यह मेरा काम है न की नाम। फिर उन्होंने पूछा कि सर क्यों कहना चाहती हो तो मैंने भारत के सम्मानजनक संबोधनों के बारे में उन्हें बताया। वे बोले कि यहां ऐसा कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं क्योंकि स्वीडन में सम्मान के लिए ख़ास संबोधन की ज़रूरत नहीं बल्कि कर्म ऐसे करो जिससे सामने वाला सम्मानित महसूस करे। मसलन कोई छात्र अपने शिक्षक की बातें माने, उन्हें सुने और पढ़ाई निष्ठा से पूरी करने की कोशिश करे तो इसी में शिक्षक का सम्मान है। न की सर बोलकर भी उनकी अवहेलना या अनदेखी करने से।
यही बात दफ़्तर में भी लागू होती है। हम अपने बॉस को सर या मैडम कह कर सम्मान देते हैं या फिर उनके नाम में जी लगाना हमारे संस्कार में हैं। ऐसी बातों को यहाँ पूरी तरह से दरकिनार किया जाता है।सभी को अपने नाम पसंद हैं जिनसे पुकारा जाना उन्हें अच्छा लगता है।माना जाता है कि काम कोई छोटा या बड़ा नहीं होता। सभी अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी निभा रहे हैं। इसलिए उच्च पदों पर बैठे लोगों के लिए सर या मैडम बोलने की कैसी ज़रूरत। वे भी तो अपना काम ही कर रहे हैं।और जब सब साथ में मिलकर काम कर रहे हैं तो उसमें विशेषण लगाकर बातें क्यों करना। सर, मैडम, मिस्टर, मिस या मिसेज़ एेसा केवल व्यंग्य करते समय कहा जाना चाहिए। जी, बोलना यहाँ की परंपरा में नहीं। यहाँ सम्मान के लिए उपसर्ग या प्रत्यय लगाना चाटुकारिता ज्यादा सम्मान कम लगता है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।