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वामपंथियों के लाल रंग में मोदी सरकार का बहीखाता

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वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण - फोटो : ANI
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वर्तमान सरकार परंपरा से चल रहे नामों में परिवर्तन कर कुछ न कुछ नया संदेश जरूर देती है। इस बार वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट का नाम बदल दिया। अब यह बहीखाता कहलाएगा। यही नहीं निर्मला सीतारमण वामपंथियों के पसंद वाले लाल रंग के कपड़े में ही बजट दस्तावेज लेकर संसद में पहुंची। सीतारमण ने परंपरागत तरीके से ही मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का पहला बजट पेश कर दिया। बजट में क्या नया होगा, क्या ढर्रे के हिसाब से होगा इसका अंदाजा लोगों को पहले से ही था। लेकिन लोगों को कुछ न कुछ नया तो मिला। कम से कम बहीखाते के माध्यम से  सरकार परंपरा और संस्कृति का सम्मान करती दिखी। क्योंकि बजट शब्द वैसे भी गुलामी का प्रतीक है। हालांकि, नाम बदलने और लाल रंग के कपड़े में  बजट दस्तावेज लाने से देश की जनता के हालातों में कितना परिवर्तन आएगा यह समय ही बताएगा।   

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वैश्विक आर्थिक मंदी और ट्रेड वार के बीच बजट
वैश्विक आर्थिक मंदी और चीन-अमेरिका के बीच चल रहे ट्रेड वार के बीच निर्मला सीतारमण ने बजट पेश किया है। कहीं न कहीं भारत भी आर्थिक मंदी से प्रभावित है। जीएसटी का कलेक्शन घटा है। बजट पेश होने से ठीक पहले रिजर्व बैंक के पूर्व गर्वनर उर्जित पटेल ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की खराब सेहत को लेकर खुलासे किए थे। हालांकि, इसके लिए उन्होंने मनमोहन सिंह सरकार की भी खिंचाई की। वहीं, नरेंद्र मोदी सरकार के ही पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने भारत के जीडीपी ग्रोथ रेट के दावे को लेकर सवाल उठाए थे। उनका दावा था कि  भारत सरकार अपने वास्तविक जीडीपी ग्रोथ रेट से 2.5 प्रतिशत बता रही है।

निश्चित तौर पर जनता को इन खुलासों से पता चल गया था कि जो वित्तीय हालात के आंकड़े सरकार पेश कर रही है, वो सारा कुछ सच नहीं है। राजस्व संग्रहण में कमी का दबाव वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण दवारा पेश  बजट में साफ दिखता है। बजट में मध्य वर्ग और आम जनता पर भार डाला गया है। पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज डयूटी और इन्फ्रास्ट्रक्चर सेस के रुप में 1-1 रुपये लगाए जाने का सीधा असर आम जनता पर पड़ेगा। इससे किसान औऱ मध्य वर्ग ही प्रभावित होगा। किसान डीजल का इस्तेमाल करता है। डीजल पहले ही खासा महंगा है। वहीं, पेट्रोल का खासा इस्तेमाल देश का मध्य वर्ग करता है।
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हालांकि सरकार की अपनी मजबूरी है। सरकार आंकड़ों में खेल कर रही है। लेकिन जमीनी हकीकत तो कुछ और है। जिस तरह से जीएसटी कलेक्शन में कमी आयी है, उससे सरकार की चिंता बढ़ी है। सरकार ने 2019-20 में 13.71 लाख करोड़ रुपये जीएसटी कलेक्शन का लक्ष्य रखा है। पर जून 2019 में जीएसटी संग्रहण में अप्रैल के मुकाबले कमी आयी। जून में जीएसटी कलेक्शन 1 लाख करोड़ रुपये के नीचे आ गया। अप्रैल 2019 में जीएसटी कलेक्शन एक लाख करोड़ से थोडा उपर था। फरवरी 2019 में भी जीएसटी कलेक्शन 97 हजार करोड़ रुपये था। कही न कहीं सरकार को आशंका है कि जीएसटी कलेक्शन में कमी आ सकती। इसकी भरपाई पेट्रोल औऱ डीजल पर सेस लगाकर की गई है।

 

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निर्मला सीतारमण - फोटो : PTI
कहां से आएंगे इतने पैसे?
वित्त मंत्री ने कई बड़ी घोषणाएं की है। सरकार ने बुनियादी सेवाओं में अगले पांच साल में 100 लाख करोड़ रुपये निवेश का लक्ष्य रखा है। रेलवे में भी 50 लाख करोड़ रुपए निवेश की जरूरत पड़ेगी। यह जानकारी वित्त मंत्री ने दी। लेकिन पैसे कहां से आएगा इसकी जानकारी नहीं दी। रेलवे में पैसे जुटाने का आसान तरीका वित्त मंत्री ने बताया। उन्होंने कहा कि रेलवे के विकास के लिए पीपीपी मॉडल लागू किया जाएगा। इसका मतलब है कि रेलवे का निजीकरण होगा। निजीकरण का भार जनता उठाएगी। निजी क्षेत्र का निवेश मुनाफे के सिदांत पर आधारित होता है। जिन रेलवे स्टेशनों के रखरखाव का काम निजी क्षेत्र को दिया गया है, वहां का हाल देखा जा सकता है। इन सुविधाओं के बदले पैसे देने की स्थिति में देश का आमजन नहीं है। जबकि भारत में रेलवे आज भी आम जन की सवारी है।

वित्त मंत्री के अनुसार कुछ वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था 5 लाख करोड़ डॉलर की हो जाएगी। वहीं, यह भी दावा किया गया कि भारत की इकनॉमी में पिछले पांच सालों में 1 लाख करोड़ डालर की वृद्धि दर्ज हुई है। 55 साल बनाम 5 साल से देश की अर्थव्यवस्था की तुलना की गई। लेकिन जमीन पर इकनॉमिक ग्रोथ का लाभ आम जन को नजर नहीं आ रहा है। ढाई लाख करोड़ डालर की अर्थव्यवस्था होने के बावजूद किसानों की आत्महत्या कम नहीं हुई। स्वास्थ्य सेवाओं में भारी गिरावट आयी। इसका उदाहरण मुजफ्फरपुर है जहां सैकड़ों बच्चों की मौत इलाज के आभाव में हो गया।

बैकों की सेहत पर विरोधाभास
बैकों की सेहत में सुधार की घोषणा वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने की है। उन्होंने कहा कि एनपीए का चार लाख करोड़ रुपये बैंकों ने वसूल कर लिया। साथ ही उन्होंने यह भी दावा किया कि बैकों की सेहत में सुधार हुआ। जबकि इसी साल फरवरी में तत्कालीन वित्त मंत्री ने राज्यसभा में एक ब्यान देते हुए कहा था कि दिसंबर 2018 तक वाणिज्यिक बैंकों का एनपीए 10 लाख करोड़ रुपये था। इसमें 8 लाख 64 हजार करोड़ रुपए का एनपीए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का था। सवाल तो यही है कि अगर बैंकों के क्रेडिट बढ़ाने के लिए सरकार ने 70 हजार करोड़ रुपये देने की घोषणा क्यों की ?

कृषि क्षेत्र के लिए कंक्रीट उपाए नहीं
किसानों और कृषि क्षेत्र के लिए सरकार खास क्या करेगी इसका स्पष्ट कुछ बजट में नहीं दिख रहा है। वित्त मंत्री के अनुसार कृषि अवसंरचना में  निवेश को बढ़ावा दिया जाएगा। 10 हजार नए किसान उत्पादक संघ बनेंगे। दिलचस्प बात है कि वित्त मंत्री ने कहा कि दालों के मामले में देश आत्मनिर्भर बन गया है। जबकि यह सच्चाई नहीं है। सालाना 40 से 60 लाख टन दलहन का आयात आज भी हो रहा है। वित्त मंत्री के अनुसार किसान को उसकी फसल का सही दाम देना सरकार का लक्ष्य है। दरअसल हर बजट में किसानों के लिए चिंता प्रकट की गई।

लेकिन किसानों की दशा कैसे सुधरेगी इस दिशा में कोई स्पष्ट कदम सरकार का नहीं दिख रहा है। पिछले कुछ समय से किसानों की आय दोगुनी करने की बात लगातार की जा रही है। इस बजट में भी किसानों के प्रति चिंता व्यक्त की गई। लेकिन किसानों की आय जमीन पर दोगुनी होती नजर नहीं आ रही है। हालात तो यह है कि  सरकार ने उन्हें जो समर्थन मूल्य देने का वादा किया है वो भी नहीं मिल रहा है। कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए जो ढांचागत परिवर्तन करना है कि उसके प्रति सरकार ने कोई स्पष्टता जाहिर नहीं की है। किसानों की ऋण माफी पर सरकार चुप है। बजट में इस पर कोई बात नहीं की गई। वहीं न्यूनतम समर्थन मूल्यों की जमीनी हकीकत क्या है यह सरकार भी जानती है और किसान भी जानते है।

देश के किसानों को सिर्फ धान और गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य जमीन पर मिलता है। कई राज्यो में तो धान और गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिलता है। किसान को बाजार में न्यूनतम समर्थन मूल्य से सस्ती कीमत पर धान और गेहूं बेचना पड़ता है। अन्य फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य कागजों में होता है, इसकी खरीद की व्यवस्था नहीं होती। मंडियों में फैसले भ्रष्टाचार से किसान परेशान है। जहां तक दलहन में आत्म निर्भरता की बात निर्मला सीतारमण ने की है, यह सच्चाई है कि अभी जून और मई महीने में बाजार में दाल की किल्लत हो गई थी। सरकार लगभग सात लाख टन अतिरिक्त दाल आयात की योजना बना रही है। आज भी भारत प्रतिवर्ष 40 से 60 लाख टन दलहन की आयात कर रहा है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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