स्कूल-कॉलेज स्तर पर मेंटल हेल्थ एजुकेशन अनिवार्य हो।
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अब सवाल यह है कि क्या हम इस त्रासदी से कुछ सीखेंगे? क्या हम मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक स्वास्थ्य की तरह देखना शुरू करेंगे? जवाब हां होना चाहिए। हमें एक मजबूत ‘साइकोलॉजिकल इकोसिस्टम’ की जरूरत है, ठीक वैसे ही जैसे सामान्य अस्पतालों का नेटवर्क है। इसके लिए हमें कुछ कड़े कदम उठाने होंगे।
सरकार को चाहिए कि हर जिले में कम से कम एक फुल-टाइम मेंटल हेल्थ सेंटर बनाना चाहिए, जहां साइकिएट्रिस्ट, साइकोलॉजिस्ट, काउंसलर और सोशल वर्कर उपलब्ध हों। ओपीडी फ्री या बहुत सस्ती हो। टेली-मेंटल हेल्थ सर्विस को और मजबूत करें, ताकि ग्रामीण इलाकों तक पहुंच हो। मानसिक स्वास्थ्य बीमा को आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं में अनिवार्य शामिल करें।
इसके साथ ही कॉर्पोरेट जगत को भी पहल करनी होगी। आईटी कंपनियां, जहां छंटनी सबसे ज्यादा होती है, वहां कर्मचारी सहायता कार्यक्रम (ईएपी) अनिवार्य करें। हर कर्मचारी को साल में कम से कम चार काउंसलिंग सेशन मुफ्त मिलें। लेआउफ के समय ‘आउटप्लेसमेंट सपोर्ट’ के साथ मानसिक सहायता भी दी जाए। एआई छंटनी को देखते हुए स्किल री-ट्रेनिंग के साथ मेंटल रेजिलिएंस ट्रेनिंग भी जरूरी की जाए।
स्कूल-कॉलेज स्तर पर मेंटल हेल्थ एजुकेशन अनिवार्य हो। “डिप्रेशन है तो डॉक्टर के पास जाओ” यह बात बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक समझ आए। मीडिया को भी जिम्मेदारी निभानी होगी। आत्महत्या की खबरें संवेदनशील तरीके से दें, बढ़ा-चढ़ा कर नहीं। परिवारों में खुलकर बात करने का माहौल बने।
हमें यह समझना होगा कि मानसिक बीमारी कोई ‘पाप’ या ‘कमजोरी’ नहीं है। डायबिटीज है तो इंसुलिन लेते हैं, हार्ट अटैक है तो स्टेंट लगवाते हैं। तो एंग्जायटी या डिप्रेशन होने पर इलाज क्यों नहीं करवाते? जब हम यह मान लेंगे कि मानसिक बीमारी भी अन्य बीमारियों की तरह ही है, तभी लोग बिना संकोच के विशेषज्ञों की मदद मांगेंगे। भानुचंद्र की तरह चुपचाप चिंता में डूबने की बजाय वे समय रहते मदद ले पाएंगे। शाजिया की तरह अचानक पति की मौत का सदमा अकेले नहीं झेलना पड़ेगा।
यह बदलाव आसान नहीं है। इसमें सरकार, निजी क्षेत्र, एनजीओ और आम नागरिक सभी को साथ आना होगा। लेकिन अगर हम आज नहीं बदले तो कल और कई भानुचंद्र-शाजिया हमें छोड़कर चले जाएंगे। बेंगलुरु की यह घटना सिर्फ एक चेतावनी नहीं, बल्कि एक पुकार है।
हमारे युवा देश की ताकत हैं। वे आईटी, स्टार्टअप, इंजीनियरिंग में आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन अगर उनके मन की सेहत की अनदेखी की गई तो यह ताकत कमजोर पड़ जाएगी। मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना अब कोई ‘विलासिता’ नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जरूरत है।
जब हम अस्पतालों की तरह ‘मानसिक स्वास्थ्य केंद्रों’ का जाल बिछाएंगे, जब हर गांव-शहर में काउंसलर उपलब्ध होंगे, जब इस पर लगा स्टिग्मा मिटेगा, तभी ऐसी त्रासदियां कम होंगी। भानुचंद्र और शाजिया की याद में हम यह बदलाव शुरू करें। क्योंकि वे सिर्फ एक जोड़ी नहीं थे। वे हजारों उन युवाओं का प्रतिनिधित्व थे, जो आज भी चुपचाप चिंता में जूझ रहे हैं। समय आ गया है कि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को एक ही सिक्के के दो पहलू मानें। तभी हम एक स्वस्थ, सशक्त भारत बना पाएंगे।
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