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कोरोना काल और प्रदूषण, आखिर कोविड-19 के संक्रमण से कितना खतरनाक है वायु प्रदूषण?

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पिछले साल दिल्ली के प्रदूषण ने पूरे देश की नींद उड़ा दी थी। - फोटो : अमर उजाला
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साल 2020 की सांझ गुजर रही है। यह साल कोरोना की भयावह छाया में गुजरा है। विस्थापन, अपघाती मौतें, बीमारी का भय और बदतर आर्थिक हालात ने पूरी दुनिया को रोक दिया है। कोरोना से डर और दहशत का माहौल थमा नहीं है। मार्च से लॉकडाउन की पटरी पर चल रहा भारत अब धीरे-धीरे सामान्य तो हो रहा है लेकिन बीते महीनों की तुलना में कोरोना संक्रमण का रफ्तार लाखों से पहुंचकर करोड़ की रेखा में प्रवेश कर रही है। सबकुछ डराने वाला है।

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इसी बीच देश की राजधानी के आसमान पर प्रदूषण की जहरीली धुंध एक बार फिर से छा रही है। कोरोना सांसों में प्रवेश कर रहा है तो वहीं दूसरी ओर हवा में प्रदूषण की मात्रा के आंकड़े डराने वाले हैं। याद कीजिए बीता साल जब दिल्ली में सांसों का लेना मुश्किल हो गया था, स्कूल बंद हो गए थे और शहर की रफ्तार थम सी गई थी।

ऐसे में सवाल यह उठता है कि कोरोना काल में प्रदूषण की ये आहट ज्यादा किसे भयावह बनाती है? कोरोना को या फिर जहर भरी उस हवा को जिसे हम प्रदूषण कहते हैं और जिसे बीते 5 साल से सरकारें, न्यायपालिका रोकने के लिए हाथ-पैर मार रही हैं। 
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दरअसल, पहले भी कई रिपोर्ट्स में कहा जा चुका है कि विश्व की नब्बे फीसदी आबादी असुरक्षित हवा में सांस ले रही है और वायु प्रदूषण मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक है। बीते साल जारी 2019 विश्व वायु गुणवत्ता रिपोर्ट और आईआक्यू एयर द्वारा संकलित नवीनतम आंकड़ों के आधार पर सबसे प्रदूषित शहरों की रैंकिंग से 2019 के दौरान दुनिया भर में कण प्रदूषण (PM2.5) की बदलती स्थिति का पता चला था।

यह डाटासेट जलवायु परिवर्तन की घटनाओं जैसे कि सैंडस्टॉर्म और वाइल्डफायर, और दक्षिण पूर्व एशिया के क्षेत्रों में शहरों के तेजी से शहरीकरण से प्रदूषण, के परिणामस्वरूप वायु प्रदूषण के स्तर में वृद्धि को दर्शाता है।

आईआक्यू एयर एक वैश्विक वायु गुणवत्ता सूचना मंच है, जो सरकारों, निजी व्यक्तियों और गैर-सरकारी संगठनों से वायु गुणवत्ता डेटा को एकत्र करता है। आईआक्यू एयर के सीईओ फ्रैंक हैम्स के मुताबिक, नए कोरोना वायरस अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में छाया हुआ है, जबकि वायु प्रदूषण एक मूक हत्यारा है जिसके कारण एक वर्ष में लगभग 7 मिलियन से अधिक मौतें हो रही हैं।

उनका दावा है कि हजारों वायु गुणवत्ता निगरानी स्टेशनों से डेटा को संकलित करने और उसका अध्ययन करने से विश्व वायु गुणवत्ता रिपोर्ट 2019 दुनिया के प्रमुख पर्यावरणीय स्वास्थ्य खतरे को नया संदर्भ देती है। वायु गुणवत्ता डेटा 2019  स्पष्ट संकेत देता है कि जलवायु परिवर्तन जंगल की आग और सैंडस्टॉर्म की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता के माध्यम से सीधे वायु प्रदूषण के जोखिम को बढ़ा सकता है।

दुनिया में सबसे गंभीर वायु प्रदूषण है, जो बड़ी आबादी को जोखिम में डालता है। - फोटो : अमर उजाला
इसी तरह, कई क्षेत्रों में परिवेशी PM2.5 प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन का सीधा संबंध ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से है, और ऐसा कोयला जैसे जीवाश्म ईंधन के जलने से है। रिपोर्ट परिवेशी PM2.5 प्रदूषण पर ध्यान क्यों केंद्रित करती है, इसका कारण भी रिपोर्ट में बताया गया है। क्योंकि दुनिया भर में परिवेशी वायु प्रदूषण :

- सभी मौतों और फेफड़ों के कैंसर से होने वाली बीमारी का 29%,
- सभी मौतें और तीव्र श्वसन संक्रमण से होने वाली बीमारी का 17%,
स्ट्रोक से सभी मौतों का 24%,
सभी मौतें और इस्केमिक हृदय रोग से 25% रोग,
सभी मौतों और पुरानी अवरोधक फुफ्फुसीय रोगों से बीमारी का 43% के लिए जिम्मेदार है।

रिपोर्ट सार्वजनिक स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी प्रणालियों की सुरक्षा के लिए इन ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन स्रोतों से निपटने के लिए तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता पर बल देती है। फ्रैंक हैम्स कहते हैं कि जब पूरी दुनिया में वायु गुणवत्ता निगरानी बढ़ रही है, तब दुनिया के बड़े हिस्सों में वायु गुणवत्ता डेटा की कमी एक गंभीर समस्या बन गई है, क्योंकि जो मापा नहीं जाता है उसे प्रबंधित भी नहीं किया जा सकता है। जिन क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता की जानकारी का अभाव है, उनमें अनुमान है कि दुनिया में सबसे गंभीर वायु प्रदूषण है, जो बड़ी आबादी को जोखिम में डालता है।
 
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अफ्रीका और मध्य पूर्व के भीतर अभी भी वास्तविक समय के वायु प्रदूषण डेटा तक पहुंच की कमी है। - फोटो : अमर उजाला
रिपोर्ट कहती है कि दुनिया भर में विशाल आबादी विशेष रूप से अफ्रीका और मध्य पूर्व के भीतर अभी भी वास्तविक समय के वायु प्रदूषण डेटा तक पहुंच की कमी है। दुनिया में जहां भी सचेत नागरिक और गैर-सरकारी संगठनों की बड़ी संख्या इस डेटा गैप को कम करने के लिए अपने प्रयासों से कम लागत वाले वायु गुणवत्ता सेंसर तैनात कर रहे हैं। इन प्रयासों के कारण, निरंतर सार्वजनिक वायु गुणवत्ता डेटा अब पहली बार अंगोला, बहामास, कंबोडिया, डीआर कांगो, मिस्र, घाना, लातविया, नाइजीरिया और सीरिया के लिए उपलब्ध है।

रिपोर्ट के मुताबिक मध्य पूर्व और पश्चिम चीन में खराब हवा की गुणवत्ता में मरुस्थलीकरण और सैंडस्टॉर्म एक बड़ी भूमिका निभाते हैं। रिपोर्ट कहती है कि सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, ब्राजील, कुआलालंपुर, बैंकाक, चियांग माई और लॉस एंजेलिस सहित कई अन्य देशों में, वाइल्डफायर और खुली जलती कृषि प्रथाओं का दुनिया भर के शहरों और देशों की वायु गुणवत्ता पर व्यापक प्रभाव पड़ा। दक्षिण पूर्व एशिया में तेजी से हो रहे औद्योगिकीकरण के चलते एक ऐतिहासिक परिवर्तन देखने को मिला कि दुनिया के सबसे PM2.5 प्रदूषित राजधानी शहरों के बीच, शहरी हब जकार्ता और हनोई ने पहली बार बीजिंग को पछाड़ दिया।

भारत के संदर्भ में
दक्षिण एशिया में वर्ष 2019 में PM2.5 के लिए दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में भारतीय और पाकिस्तानी शहर फिर से हावी हैं और दुनिया के तीस सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में से इक्कीस भारत में और पांंच पाकिस्तान में हैं।

पर्यावरण के लिए वरदान साबित हुई भारत में चल रही आर्थिक मंदी ?
सामान्यतः भारत के शहरों में, औसतन, वार्षिक PM2.5 स्तर डब्ल्यूएचओ द्वारा निर्धारित लक्ष्य से 500% से अधिक है, लेकिन 2018 से 2019 तक राष्ट्रीय वायु प्रदूषण 20% कम हो गया, 98% शहरों में सुधार का अनुभव हुआ। 

 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें  blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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