टेलीवुड और बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड तक इरफान ने दुनिया में अपने अभिनय की छाप छोड़ी है
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आंखों से अभिनय करने वाला, गहरी बातें कहने वाला ऐसा कलाकार शायद ही कोई दूसरा हो। चाणक्य और चंद्रकांता जैसे धारावाहिक हो, प्रथा और 'एक डॉक्टर की मौत' जैसी समानांतर फिल्में हों, क्रेजी-4 और दिल कबड्डी जैसी फिल्मों में कॉमिक रोल हो, मकबूल और मदारी जैसी फिल्मों में केंद्रीय भूमिका हो, रुमानियत से भर देनेवाली लंचबॉक्स और करीब-करीब सिंगल जैसी फिल्में हो या फिर इंडियन समर और लाइफ ऑफ पाई जैसी अंतरराष्ट्रीय फिल्में हों, टेलीवुड और बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड तक उन्होंने दुनिया में अपने अभिनय की छाप छोड़ी है।
साल 2005 में आई उनकी फिल्म रोग बहुत चर्चा में नहीं रही, लेकिन उस फिल्म में उनका परिचय दृश्य और उनकी अदायगी आजीवन याद रह जाने वाली है। इरफान के डायलॉग से फिल्म शुरू होती है। सामने मनोचिकित्सक और इरफान बोलना शुरू करते हैं-
पिछले गुरुवार को फिर मैंने अपनी जान लेने की कोशिश की। कोई खास वजह नहीं है, कोई तनाव भी नहीं है। मन ऊब गया है। वही शोर, आवाजें। घर-थाना, थाना-घर, घर-थाना। #$@#@$# लाशें। ....अजीब सा एहसास है मन में...अजीब। जैसे रोज नया दिन निकलता है, मैं वही पुराना हूं, दुनिया वही पुरानी है, वैसे ही चली जा रही है। मुझे लगा भाई, ये जो जिंदगी की गाड़ी चल रही है, इसकी मैं चेन खींचता हूं और मैं उतर जाता हूं।
डॉक्टर पूछता है- तो फिर मरे क्यों नहीं? इरफान कहते हैं-
फिर वो मोमेंट चला गया, टूट गया। उसके बाद मेरा मरने का दिल नहीं किया।
काश फिल्म की ही तरह वास्तव में भी आपकी मौत का वो मोमेंट चला जाता और मरने का आपका दिल नहीं करता तो कितना अच्छा होता। लेकिन नहीं, जिंदगी की इस गाड़ी की आपने चेन खींची और उतर गए। साकिब लखनवी के शब्दों में,
बड़े शौक से सुन रहा था जमाना, तुम्हीं सो गए दास्तां कहते-कहते।
किस्मत की मार देखिए कि कलाकार तो यह दुर्लभ था ही, बीमारी भी मिली तो वह भी दुर्लभ। इरफान की तरह उनकी बीमारी भी औरों से जुदा थी। वे अलग किस्म के ब्रेन कैंसर से जूझ रहे थे। साल 2018 में न्यूरो इंडोक्राइम ट्यूमर का इलाज कराने लंदन गए इरफान की जीजिविषा ऐसी कि इलाज के बाद फिर से काम पर लौट कर उन्होंने हमें अंग्रेजी मीडियम जैसी शानदार फिल्में दी। किसे पता था कि यह उनकी आखिरी फिल्म साबित होगी। बीमारी के दौरान उनका जीवन के प्रति, प्रकृति के प्रति नजरिया बदल गया। बीमारी से जूझने के दौरान सोशल मीडिया पर उनकी ये लाइनें खूब वायरल हुई।
मुझे पता था कि टिकट कट चुका है, बस वेटिंग में हूं और नंबर कंफर्म होना बाकी है। निकल ही लेना होगा, आज नहीं तो कल…चिंता दरकिनार हुई और मेरे दिमाग से जीने-मरने का हिसाब निकल गया तो !
इलाज के दौरान उनका लिखा पत्र भी उनके जाने के बाद लोगों को भावुक कर रहा है। अगर आपने जज्बा फिल्म देखी होगी, तो अंत में सबकुछ ठीक होने के बाद का एक दृश्य जरूर याद होगा, जब एश्वर्या राय जा रही होती है और उसे रोकने के लिए साथी के टोकने पर इरफान कहते हैं,
अबे मुहब्बत थी, इसलिए तो जाने दिया, जिद होती तो बाहों में होती।
इरफान, हम प्रशंसक भी आपसे वैसी ही मुहब्बत करते हैं और हां, आप हमारी मुहब्बत थे, इसलिए तो जन्नत जाने दिया, जिद होते तो हमारी इसी दुनिया में होते।
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