अमेरिका ईरान विवाद से दुनिया में तनाव बढ़ा है।
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तेल की कीमत बढ़ी तो भारतीय इकनॉमी होगी प्रभावित
आज भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत तेल आयात करता है। तनाव बढ़ने के कारण तेल की कीमतों पर भी प्रभाव पड़ेगा। अगर तेल की कीमतें बढ़ी तो इसका सीधा असर भारत की इकनॉमी पर पड़ेगा। भारतीय इकनॉमी इस समय खस्ता हाल है। अगर तेल की कीमत बढ़ी तो पहले से ही कर संग्रहण में परेशानी का सामना कर रही सरकार को घऱेलू मोर्चे पर और परेशानी बढ़ जाएगी।
तेल महंगा और डॉलर में ज्यादा पैसे का भुगतान करना पड़ेगा। इससे चालू बचत खाते का घाटा बढ़ेगा। भारत ने वर्ष 2018-19 मे तेल आयात पर 111 अरब डॉलर खर्च किया था। इस साल मई जून में उम्मीद थी कि तेल की कीमतें नहीं बढ़ने के कारण भारत लगभग 233 मिलियन टन तेल का आयात करेगा और इसपर 113 अरब डॉलर का खर्च आएगा। लेकिन अगर तेल की कीमतें बढ़ी तो तेल आयात खर्च 125 अरब डॉलर पार कर सकता है।
अफगानिस्तान में ईऱान की घुसपैठ और भारत
ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव का सीधा असर अफगानिस्तान मे दिखेगा। अफगानिस्तान में भारतीय हित है और अफगानिस्तान में भारत के पहुंचने का रास्ता ईरान का चाबहार बंदरगाह है, इसलिए भारत पर सीधा असर अफगानिस्तान में होने वाले परिवर्तन पर पड़ेगा। ईरान अगर अफगानिस्तान में अमेरिकी हितों पर चोट करेगा तो इसका सीधा असर तालिबान पर पड़ेगा। तालिबान मजबूत होगा और भारत के हितों के खिलाफ तालिबान हमेशा रहा है। इससे नुकसान भारत को होगा। हालांकि ईऱान अगर अफगानिस्तान में अमेरिकी हितों पर चोट करेगा तो कारण अफगानिस्तान में शांति को लेकर चल रही शांति वार्ता कमजोर पड़ सकती है। अफगानिस्तान मे मौजूद अमेरिकी सैन्य बेसों पर भी हमला हो सकता है। भारतीय हितों पर भी तालिबान चोट कर सकता है। इसके कारण मौजूद है।
भारत को अपनी अर्थव्यवस्था पर नजर बनाए रखनी होगी।
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कासिम सुलेमानी के नजदीक रहे है तालिबान कमांडर
ईरानी सैन्य कमांडर कासिम सुलेमानी की तालिबान कमांडरों खासे नजदीक रहे हैं। 2006 के बाद लगातार तालिबान कमांडरों की नजदीकी सुलेमानी से बढ़ी। 2014 के बाद यह नजदीकी और मजबूत हुई। इसका एक कारण इस्लामिक स्टेट था। इस्लामिक स्टेट के बढ़ते प्रभाव से रूस भी परेशान था और ईरान भी परेशान था, क्योंकि इस्लामिक स्टेट कटटर सुन्नी संगठन था। इससे ईरान को खतरा था। वहीं रूसी प्रभाव वाले मध्य एशिया के देशों में भी इस्लामिक स्टेट घुसपैठ की कोशिश कर रहा था। इस्लामिक स्टेट के बढ़ते प्रभाव से इराक की शिया आबादी और और सीरिया में बशर अल असद की सरकार को भी खतरा था।
इधर, इस्लामिक स्टेट खालिस सुन्नी स्टेट की अवधारणा लेकर अफगानिस्तान में भी घुसपैठ कर रहा था। इस्लामिक स्टेट की अफगानिस्तान में बढ़ते प्रभाव से अफगान तालिबान परेशान था। अफगान तालिबान के कई नीचले कमांडर पैसे के लोभ में इस्लामिक स्टेट से मिल गए थे। वैसे में तालिबान कमांडरों ने ईऱानी सैन्य कमांडर कासिम सुलेमानी की मदद ली।
ईऱान ने तालिबान कै पैसे और हथियार दोनों दिए। कासिम सुलेमानी की मौत के बाद आशंका जताई जा रही है कि ईरान के दबाव में तालिबान अमेरिका के साथ चल रहे शांति वार्ता से पीछे हट सकता है। यही नहीं अफगानिस्तान के अल्पसंख्यक शिया हजारा जनजाति के लगभग बीस हजार लोगों की मिलिशिया भी कासिम सुलेमानी ने तैयार की थी। ये हजारों मिलिशिया गुट ईराक, अफगानिस्तान और सीरिया में ईरान के इशारे पर लड़ रहे थे।
दरअसल ईऱान अमेरिका से बढ़ते तनाव के बीच भारत के रूख को देख रहा है। अगर भारतीय रुख अमेरिका के संतुलित रहा तो ईऱान भारत को अफगानिस्तान में नुकसान नहीं करेगा। अगर संतुलित नहीं रहा तो ईरान के इशारे पर अफगानिस्तान में भारतीय हितों पर चोट हो सकती है। वैसे भी अगर ज्यादा तनाव बढ़ा तो भारत को ईऱान के चाबहार बंदरगाह पर भी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा।
बासमती चावल उद्योग भी प्रभावित होगा
भारत बड़े पैमाने पर बासमती चावल खाड़ी देशों को निर्यात करता है। 2018-19 में अकेले ईरान ने भारत से लगभग 11 हजार करोड़ रुपये की बासमती की खरीद की। भारत ने 2018-19 में लगभग 33 हजार करोड़ रुपये की बामसती निर्यात की थी। अमेरिकी हमले के बाद भारतीय बासमती निर्यातक परेशान है। क्योंकि उनका ईरान में पैसे का भुगतान रुका हुआ है। ईरान पर लगे अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों के कारण भुगतान की समस्या पहले से ही भारतीय बासमती निर्यातक झेल रहे हैं। लेकिन इस हमले के बाद हालात और खराब हो सकते हैं, इसलिए अमेरिकी हमले में कासिम सुलेमानी की मौत से भारतीय बासमती निर्यातकों में खासी चिंता है।
भारतीय निर्यातकों के लगभग एक हजार करोड़ रुपये इस साल जून तक ईऱान में बासमती चावल के भुगतान में मिलने वाले फंसे हुए थे। इस हमले के बाद परेशानी और बढ़ेगी। क्योंकि भारत और ईऱान के बीच पैसों का भुगतान अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों के कारण विशेष मैकेनिज्म के तहत होता है। भारतीय चीनी और सोयाबीन उधोग को भी तनाव से नुकसान होगा। क्योंकि ईरान इस समय भारत से इन दोनों वस्तुओं का बड़ा खरीदार बन रहा है।
खाड़ी देशों में काम करने वाले 75 लाख भारतीयों पर सीधा असर होगा
लगभग 75 लाख भारतीय अरब देशों में रोजगार प्राप्त है। ये अरबो डॉलर भारत में कमा कर भेजते हैं। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को भारी मदद मिलती है। इस समय भारत को सलाना 80 अऱब डॉलर की आय विदेशी में काम करने वाले भारतीयों के कारण हो रही है। इसमें से लगभग 40 अरब डॉलर भारत को खाड़ी के देशों से आता है। भारत को सबसे ज्यादा रकम संयुक्त अरब अमीरात से मिल रहा है। यहां लगभग 35 लाख भारतीय कामकाजी है। जबकि सऊदी अरब में 30 लाख भारतीय कामकाजी है। कुवैत में भी लगभग 11 लाख भारतीय कामकाजी हैं।
अगर ईऱान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ा तो इसका सीधा असर सऊदी अरब, कुवैत, कतर, संयुक्त अरब अमीरात औऱ ओमान पर पड़ेगा। इन मुल्कों की अर्थव्यवस्था ईऱान के कारण पहले भी प्रभावित होती रही है। सऊदी अरब पहले ही ईऱान के हमलों से परेशान है। अगर इन मुल्कों की तेल इकनॉमी प्रभावित हुई तो भारतीय कामगारों की छंटनी शुरू हो जाएगी। भारतीयों को अपने मुल्क में वापसी करनी पड़ सकती है। इसका सीधा नुकसान भारत को होगा।
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