प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विज्ञान कांग्रेस को संबोधित करते हुए।
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किसी भी राष्ट्र की प्रगति विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में शिक्षा और अनुसंधान में हुई निरंतर वृद्धि पर निर्भर करती है। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए हमारा अनुसंधान अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरुप होना चाहिए। भारतीय शिक्षा और अनुसंधान की प्रमुख कमजोरी भारतीय अनुसंधान में विश्वविद्यालयों द्वारा हिस्सेदारी का अपेक्षाकृत बहुत कम होना है।
सरकार द्वारा विश्वविद्यालयों में अनुसंधान और नवाचार को प्रोत्साहित करने के लिए कई कदम उठाए जा सकते हैं। अभी हालात यह है कि सरकार सिर्फ सरकारी संस्थाओं को प्रोत्साहित करती है और उनकी आर्थिक मदद करती है जबकि बुनियादी अनुसंधान के विकास के लिए सरकार को निजी विश्वविद्यालयों को भी अपने साथ जोड़ना होगा।
बेहतर निजी संस्थानों को आर्थिक मदत भी करनी होगी जिससे वो भी अपना योगदान दे सके। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में आज 95 प्रतिशत निजी संसथान है जबकि सिर्फ 5 प्रतिशत सरकारी संसथान है। देश में आधारभूत विज्ञान के विकास के लिए हमें सरकारी के साथ-साथ निजी क्षेत्र की भी भागीदारी बढ़ानी पड़ेगी।
विज्ञान ने आधुनिक भारत को बदलने में काफी मदद की है। जब भी विश्व ने हमारे लिए अपने दरवाजे बंद किए तो हमारे वैज्ञानिकों ने अनूठी पहल की और हमें नया रास्ता दिखाने की सफल कोशिश की। पहले प्रयास में ही मंगल ग्रह पर पहुंचना हमारी बड़ी कामयाबी है। अपनी उपलब्धियों पर हमें गर्व है लेकिन अभी कई चुनौतियों का सामना करना है।
भारत के फार्मास्यूटिकल उद्योग ने विश्व में अपनी पहचान इसलिए बनाई है क्योंकि उसने शोध के क्षेत्र में बहुत अधिक निवेश किया है। अभी कई दूसरे क्षेत्रों में भी निवेश बढ़ाने की जरूरत है जिससे वो अधिक गति से तरक्की कर सकें।
इसके लिए हमें विज्ञान एवं वैज्ञानिकों के गौरव और सम्मान को बहाल करना होगा साथ में ही विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार को राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में शीर्ष पर रखना होगा। सच्चाई यह है कि अनुसंधान करने की सहूलियत उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी कारोबार करने की सहूलियत।
आज जरूरत इस बात की भी है कि वैज्ञानिक ज्यादा उचित, प्रभावी टिकाउ एवं किफायती प्रौद्योगिकियां विकसित करने के लिए पारंपरिक स्थानीय ज्ञान का समावेश करें ताकि विकास एवं प्रगति में जबरदस्त योगदान मिल सके। जिससे विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार के हाथ निर्धनतम, दूरस्थ स्थल पर रहने वाले एवं सर्वाधिक जरुरतमंद व्यक्ति तक पहुँच जाएं ।
अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में आज भारत की गिनती अग्रणी देशों में होती है। विज्ञान के कई दूसरे क्षेत्रों में भी बहुत-सी भारतीय प्रतिभाएं सक्रिय हैं। लेकिन देश में विज्ञान की शिक्षा ,शोध और अनुसंधान की स्थिति ठीक नहीं है । समाज में वैज्ञानिक चेतना और वैज्ञानिक नजरिए की व्यापक कमी दिख रही है।
फिलहाल विज्ञान की चर्चा अक्सर बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धियों के नजदीक सिमट कर रह जाती है। मगर आज सबसे ज्यादा जरुरत इस बात की है कि देश में विज्ञान की शिक्षा की स्थिति कैसे सुधरे, और दूसरे, जन-समस्याओं के निराकरण में विज्ञान का उपयोग कैसे बढ़ाया जाए। देश में विज्ञान की शिक्षा के लिए स्कूली स्तर पर प्रयोगशालाओं की भारी कमी है।
समझने और प्रयोग करके सीखने के बजाय विद्यार्थियों को तथ्य रटना पड़ता है जो कि ठीक नहीं है। स्कूल के बाद विश्वविद्यालय स्तर पर भी विज्ञान शिक्षा के बुनियादी हालात ठीक नहीं है जिन पर तत्काल ध्यान देने की जरुरत है। आज जरूरत है विज्ञान के विषय में गंभीरता से एक राष्ट्रीय नीति बनाने की और उस पर संजीदगी से अमल करने की जिससे देश में वैज्ञानिक शोध और वैज्ञानिक चेतना का एक सकारात्मक माहौल बन सके ।
(लेखक राजस्थान के मेवाड़ यूनिवर्सिटी में डायरेक्टर और टेक्निकल टूडे पत्रिका के संपादक हैं )
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