क्या विराट कोहली एक कप्तान के रूप में सफल हैं?
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क्या धोनी के बिना कोहली अधूरे हैं?
दरअसल, महेंद्र सिंह धोनी ने जब एकदिवसीय और टी ट्वेंटी फार्मेट वाले क्रिकेट से संन्यास लिया तो उसकी जिम्मेदारी विराट को दी गई। विराट के बेहतरीन खेल और उनकी आक्रामकता को देखते हुए ही ये जिम्मेदारी उन्हें मिली थी। क्रिकेट प्रेमियों को विराट से न केवल धोनी की पूर्ति बल्कि अपनी टीम को लगातार जितवाने जैसी अपेक्षाएं बंध गई थी। मगर ऐसा होता नहीं दिखा।
टेस्ट मैचों में विराट जीत रहे थे क्योंकि उनके पास धोनी एक खिलाड़ी के रूप में थे जो उन्हें लगातार बीच मैचों में सलाह देते हुए दिखते रहे, कभी तो ये लगने लगा और ये सच भी है कि धोनी की सलाह विराट की जीतो का कारण बन रही है।
इधर वनडे या टी 20 में विराट धोनी के बगैर अधूरे जान पड़े। हालिया ऑस्ट्रेलिया दौरे की सीरीज के आखिरी तीन मैच भारत ने धोनी के बिना खेले थे जिसमें कंगारू जीत गए थे। उसके बाद वो आईपीएल में आरसीबी की कप्तानी लेकर मैदान में उतरे और लगातार 6 मैचों में जीत का खाता तक नहीं खोल सके। तो ये बात उठाना लाजिमी है कि क्या धोनी के बिना कोहली अधूरे हैं? ऐसे में उनकी आलोचना करने वालों को पंख लगना स्वभाविक ही था और ये कोई गलत आलोचना भी प्रतीत नहीं होती।
क्या कोहली को लेकर गौतम गंभीर की भविष्याणी?
बाएं हाथ के ओपनर और कोलकाता नाइट राइडर्स को वर्ष 2012 और 2014 में दो बार कप जिताने वाले कप्तान गौतम गंभीर ने स्पष्ट कहा कि कोहली भाग्यशाली हैं कि कप्तान के तौर पर पिछले आठ साल से टीम को खिताब नहीं दिला पाने के बावजूद वे रॉयल चैलेंजर बेंगलोर के साथ बने हुए हैं। गंभीर ही नहीं बल्कि पूर्व अंग्रेज खिलाड़ी माइकल वॉन ने तो कोहली को आराम की सलाह तक दे डाली।
कोहली को लेकर इंडियन टी20 लीग कमेंट्री बॉक्स में बैठे सुनील गावस्कर हों या आकाश चोपड़ा या कोई भी समीक्षक एक तरह से सबके मन में कोहली की नेतृत्व अक्षमता का ख्याल ही आता है। हालांकि इन समीक्षकों ने सीधे तौर पर उनकी आलोचना नहीं की है किन्तु सवाल तो उठाए ही हैं कि ऐसा क्या हो गया कोहली को ?
गंभीर और माइकल वान के तब अधिक विचारणीय हो जाते हैं जब हम इतिहास में झांकते हैं तो वहां कोहली से बड़े खिलाड़ी भी खराब कप्तानी के कारण हटे हैं। जैसे सौरव गांगुली, राहुल द्रविड़, सचिन तेंदुलकर। किन्तु क्या कोहली इनसे भी महान हैं, जो अब तक फ्रेंचाइजी की कप्तानी कर रहे हैं? प्रश्न खड़ा हो उठता है। कोहली को आरसीबी की कप्तानी क्यों दी जा रही है।
दरअसल, ये बाज़ार का मामला है। इस समय कोहली एक संसेशन हैं, बाज़ार में उनका मोल सबसे ज्यादा है। उनके रहते आरसीबी को भी ज्यादा लाभ है इसलिए उन्हें हटाने से पूर्व फ्रेंचाइजी को दस बार सोचना होगा।
क्या धोनी के बिना असफल हैं कोहली?
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क्या कोहली की सफलता के लिए जरूरी हैं धोनी?
बहरहाल, ये अलग मामला है। प्रश्न तो ये कि क्या धोनी के बिना कोहली अधूरे हैं। ये एक सच बात है। कभी शेनवार्न और बिशन सिंह बेदी ने भी कहा था कि कोहली धोनी के बिना आधे कप्तान हैं तो इसी वजह से कि टीम जब भी दबाव में होती है तो विराट कोहली को धोनी की सलाह उबार लेती है। धोनी में मैदान की सूझ-बूझ के साथ साथ फील्डिंग जमाने और किस गेंदबाज को कब उतारने जैसा अद्भुत कौशल है, उनमें रिस्क लेने का दमखम भी ज्यादा है और विराट धोनी पर आश्रित रहकर निसंकोच रिस्क ले लेते हैं जो अक्सर कामयाब हो जाती है।
जब विराट को अकेले कप्तानी करनी होती है तब वे भी पूरी तरह अकेले जान पड़ते हैं। मैदान में त्वरित और दबाव में बेहतर फैसले लेने के मामले में विराट सचमुच कमजोर दिखते हैं। यही वजह है कि दिग्गज खिलाड़ियों से सजी उनकी टीम इंडियन टी20 लीग में लगातार छह मैच हार चुकी है।
तो क्या हैं कोहली की कमियां?
दूसरी तरफ गौर करें तो पाएंगे कि विराट की कप्तानी में वैरिएशन का अभाव है। लगातार हार के बाद भी वे एक ही बल्लेबाजी क्रम के साथ मैदान पर उतर रहे हैं। अन्य बल्लेबाजों के क्रम को भी साध नहीं पा रहे और गेंदबाजी तो वैसे भी टीम की लंबे समय से कमजोरी रही है। गेंदबाजी रोटेशन में एक कप्तान की खूबी साफ़ झलकती है किन्तु कोहली इसमें भी कुछ खास चालबाज साबित नहीं हुए हैं।
वहीं दूसरी टीमों के कप्तानों को यदि देखें तो वे अलग स्तर पर प्रयोग करते नजर आते हैं जैसे केकेआर के दिनेश कार्तिक गेंदबाज सुनील नरायन से ओपन करवा देते हैं। धोनी अंतिम समय पर जिस गेंदबाज से अपेक्षा न हो उसे गेंद थमा देते हैं।
विराट में क्यों नहीं है रोटेशन?
इधर, रोहित शर्मा फील्डिंग बदलते रहते हैं। कोहली में अभी तक ऐसा कोई बोल्ड निर्णय देखने में नहीं आया जो उन्होंने बीच मैच में लिया हो। अब यदि उनकी पिछली टीम के एक बड़े बल्लेबाज क्रिस जेल की बात करें तो कोहली को उनकी कमी निश्चित रूप से अखर रही होगी। गेल इस वक्त पूरे फॉर्म में हैं किन्तु वे इस बार पंजाब की तरफ से खेल रहे हैं। कोहली के दूसरे विश्वस्त खिलाड़ी एबी डीविलियर्स तो उनके पास हैं, मगर उनका वैसा प्रदर्शन देखने को नहीं मिल पाया है जैसी उनकी ख्याति है।
अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास के बाद वे थोड़े कमजोर हुए लगते हैं। पार्थिव पटेल टाइप्ड प्लेयर होकर रह गए हैं। यजुवेंद्र चहल जैसे स्पिनर भी कोहली के पास है मगर वही बात आ जाती है विकेट के पीछे से चहल को कैसे गेंदबाजी करनी है कोई दिशा नहीं दिखाई जाती जो धोनी दिखाते हैं। मोईन अली , शिमरॉन हेटमायर , ग्रैंडहोम, स्टोइनिस जैसे बल्लेबाजों को टिककर टीम को आधार देने की पट्टी शायद विराट कोहली नहीं पढ़वा पा रहे हैं। यही वजहें हैं कि जीत बिन सूने खेत को विराट अकेले न जोत पा रहे हैं न ही सिंचाई कर पा रहे हैं, ऊपर से आलोचना के शिकार बनते जा रहे हैं।
विराट में जो निराशा दिख रही है वो आसन्न विश्वकप के लिए हानिकारक साबित हो सकती है, मगर जैसा कि कहा जाता है यहां खेलना और देश की टीम के लिए खेलना दो अलग-अलग बात है, फिर विश्वकप टीम में तो उनके साथ महेंद्र सिंह धोनी भी होंगे, इसलिए उम्मीदें इंडियन टी20 लीग की इन पराजयों से तोड़ी न जाए बल्कि बनाई रखी जाए कि टीम इंडिया विश्वकप जीत सकती है।
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