भारत में जनता मत के अधिकार को लेकर अब भी गंभीर नहीं है।
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नागरिकों को समझना होगा अपने कर्तव्यों को
सच तो यह है कि देश के मतदाता की नियति उस दिन बदलेगी जिस दिन वो सच में जागरूक होगा। जिस दिन वो जाति धर्म से ऊपर उठकर सोचेगा, निजस्वार्थ से पहले देशहित की सोचेगा। वो जागरूक तब होगा जब वो मुफ्त में मिलने वाली हर उस चीज़ को ठुकराएगा जो उसे पंगु बनाए। वो जागरूक तब होगा जब वो अपनी भुजाएं हाथ फैलाने के लिए नहीं बल्कि मेहनत के लिए उठाएगा, तब वो जागरूक मतदाता किसी के हाथों की कठपुतली नहीं होगा। वो ना अली होगा ना बजरंगबली होगा केवल “जागरूक मतदाता”होगा। और फिर वो अपनी उंगली से केवल अपनी ही नहीं देश की तक़दीर बदलने का भी माद्दा रखेगा।
मतदान करने का अर्थ केवल वोट डालकर घर आने तक ही सीमित नहीं है और ना ही राजनीतिक दलों की बुराई करने तक। दरअसल, वोटिंग के बाद भी नागरिक के तौर पर हर व्यक्ति की जिम्मेदारी होती है कि वह अपने समाज, राज्य और राष्ट्र के प्रति उन दायित्वों को समझे जो उसके नैतिक और मौलिक कर्तव्य हैं। अपने घर, परिवार से निकलर अपने मोहल्ले, कॉलोनी, क्षेत्र और शहर के भीतर की सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक बुराइयों को दूर करने के लिए वैसे ही एक्टिव रहे जैसे की कोई जनप्रतिनिधि रहता है।
दरअसल, हर नागरिक स्वयं को सेवक और जागरूक नागरिक ही समझकर चले तो ही उस मताधिकार का वास्तिवक अर्थ सामने निकलकर आता है। इस लोकसभा चुनाव में यदि मतदान के अधिकार के अलावा नागरिक अधिकारों के प्रति भी जागरूकता आए तो यह राष्ट्र के लिए अच्छे संकेत होंगे।