आज प्रश्न यह है कि भारत को जम्मू-कश्मीर के बारे में क्या कदम उठना चाहिए, जिसे 1947 में वहां के महाराजा ने ब्रिटिश संसद के बनाए हुए कानून के तहत भारत के साथ जोड़ दिया था। यह भी बात साफ है कि संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव जो जम्मू-कश्मीर जनमत संग्रह कराने के हित में था, उसे पाकिस्तान ने खुद खत्म कर दिया है।जम्मू-कश्मीर के भारतीय नागरिकों की रक्षा करने और भारत को उग्रवाद से बचाने का एक ही रास्ता है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 में कम से कम संशोधन करने का संसद को अधिकार मिले। अनुच्छेद 370के तहत संसद को तीन विषयों रक्षा, विदेशी मामले, संचार और संबद्ध मामले पर भी कानून बनाने का अधिकार प्राप्त नहीं है, जो तीन विषय 26 अक्तूबर, 1947 को जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन महाराजा हरि सिंह ने विलयपत्र पर हस्ताक्षर करके भारत को सौंपे थे। ये अधिकार भारतीय संसद के हैं, जो तुरंत संसद को सौंपने होंगे। भारत के राष्ट्रपति को अनुच्छेद 370 में जो आज तक अस्थायी है, संशोधन या कोई भी संशोधन करने का सांविधानिक अधिकार है। यही एक रास्ता है, जिससे भारत का तिरंगा कन्याकुमारी से कश्मीर तक बिना किसी रुकावट के फहराया जा सकता है। 70 सालों से अनुच्छेद 370 अस्थायी प्रावधान है और इसमें कोई भी संशोधन करने से भारतीय संसद अपने पर स्वयं रोक लगाती है।
यह खेद की बात है कि जम्मू-कश्मीर के भारतीय नागरिक, जिसमें लेखक भी शामिल है, उन्हें आज तक मौलिक अधिकार प्राप्त नहीं हो सके हैं। जम्मू-कश्मीर में भारतीय दंड संहिता भी लागू नहीं है, वहां पर रनवीर पीनल कोड लागू होता है। जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकारों के नियंत्रण के लिए जन सुरक्षा कानून बनाया हुआ है, जिस कानून के तहत किसी भी व्यक्ति को दो वर्ष तक बिना मुकदमा चलाए जेल में रखा जा सकता है। यह लेखक1977 में कांग्रेस का विधायक होने के बावजूद जम्मू-कश्मीर के जनसुरक्षा कानून के तहत तीन साल तक जेलों में रहा है और बिना मुकदमा चलाए आठ साल से ज्यादा जम्मू-कश्मीर की जेलों का मजा चखा है। भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने लगभग 25 बार इस लेखक को जम्मू-कश्मीर की जेलों से रिहा करने के आदेश दिए।
कश्मीर में आज भी दो हजार छात्र, युवा और मासूम लोग जेलों में बंद हैं। जिसका कारण सिर्फ यह है कि भारत के संविधान में दिए गए मानवाधिकार जम्मू-कश्मीर में लागू नहीं हैं। जब तक भारतीय संविधान जम्मू-कश्मीर में पूरी तरह लागू नहीं होगा, भारत का झंडा कन्याकुमारी से कश्मीर तक नहीं लहराएगा और हर व्यक्ति को न्याय-अधिकार नहीं मिलेगा, तब तक जम्मू-कश्मीर में शांति असंभव है।
लेखक, पैंथर्स पार्टी के अध्यक्ष हैं
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