योग ने जीवन बदल दिया
योग साधना में आसन प्राणायाम एवं ध्यान का अभ्यास वर्षों से करता रहा हूं। जहां तक लाभ का प्रश्न है उसकी कोई व्याख्या शब्दों में नहीं कि जा सकती। लौकिक- पारलौकिक, ज्ञान- विज्ञान,पराविज्ञान सभी कुछ योगाभ्यास से प्राप्त हो सकता है। सच कहूं तो मानव को महामानव बनाने का उपक्रम ही योग है।
वैसे समग्र रूप में योग को देखें तो यह एक महाविज्ञान है जिसके अनेक रूप हैं। समय- समय पर अनेक योगियों ने अपने शोध एवं अनुभवों के आधार पर योग के भिन्न -भिन्न रूपों की व्याख्या की है, जिसे सरलीकृत कर मानव-कल्याण हेतु प्रस्तुत भी किया गया। ऐसा कहा जा सकता है कि योग के आदि गुरु भगवान महादेव हैं। योग की उच्चता का यदि दर्शन करना है तो योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण के श्रेष्ठ और दूसरा उदाहरण क्या हो सकता है।
भारत में योग की अनादि परंपरा
सनातन काल से ही आर्यावर्त में योगियों की एक लंबी श्रृंखला रही है, जिनमें से महर्षि पतंजलि योगी मत्येन्द्रनाथ, गुरु गोरक्षनाथ,घेरण्ड ऋषि जैसे अनेकों श्रेष्ठ मनीषियों ने योग के प्रभाव से जान-सामान्य को चमत्कृत व लाभान्वित किया है।
ऋषियों, मुनियों, योगियों की परंपरा में हठयोग का प्रचलन हजारों वर्षों से रहा है, जो अष्टांगयोग, क्रियात्मक योग के रूप में समाज में प्रचलित है। यम-नियम, आसन- प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान , समाधि ये आठ अंग हैं ! किन्तु सामान्य रूप से जनसाधारण में आसन , प्राणायाम एवं ध्यान का अभ्यास साधक करते हैं। इनके निरंतर अभ्यास से शेष अंगों से होने वाले लाभ भी प्राप्त होने लगते हैं।
पांच तत्वों से बनी हमारी देह आत्मिक चेतना को आधार देती है। योग ऋषियों ने हमारे स्थूल-सूक्ष्म एवं कारण शरीर को पांच कोषों में बांटा है। अन्नमय कोष, प्राणमय कोष, मनोमय कोष, विज्ञानमय कोष आनन्दमय कोष। योगाभ्यास के माध्यम से इन सभी कोषों के मध्य संतुलन तथा शरीर और मन में चेतना का प्रवाह बना रहता है।
योगाभ्यास से लाभ के लिए शरीर शुद्ध, पेट साफ और मन शांत होना चाहिए। आसपास का वातावरण प्राणवायु से ओतप्रोत और शुद्ध हो। पहले सूक्ष्म व्यायाम के द्वारा शरीर को योगाभ्यास के लिए तैयार करें जिससे शरीर के अंग प्रत्यंगों में रक्त का प्रवाह सुचारू रूप से होने लगे, जिससे ऊतक और मांसपेशियां नर्म और गर्म हो जाएं। उसके पश्चात् आसनों का अभ्यास और फिर प्राणायाम-ध्यान का अभ्यास करें। इससे हम प्रकृति के साथ सूक्ष्म रूप से जुड़ते चले जाएंगे, और शरीर-मन स्वस्थ और निर्मल होता चला जाएगा। योगाभ्यास के साथ-साथ समुचित एवं संतुलित आहार विहार भी आवश्यक है।
संक्षेप में कहा जाए तो योग वर्तमान में मानव समाज को स्वस्थ एवं निरोग रखने की बहुत बड़ी आवश्यकता है।
योग को जीवन चर्या का अंग बनाएँ और स्वस्थ जीवन जियें।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।