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International yoga day 2019: योगः कर्मसु कौशलम्': पूरे विश्व को योग दिवस की शुभकामनाएं

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जीवन के विविध क्षेत्रों में योग एक वरदान है, जो पूर्णतया प्राकृतिक एवं वैज्ञानिक है। - फोटो : yoga
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जीवन के विविध क्षेत्रों में योग एक वरदान है, जो पूर्णतया प्राकृतिक एवं वैज्ञानिक है। योग किसी भी जाति,पंथ, सम्प्रदाय,भाषा-भाषी क्षेत्रीयता आदि की सीमाओं के बंधनों से मुक्त है। यह जीवन की समस्त दैविक, दैहिक,भौतिक सभी प्रकार की व्याधियों एवं कष्टों से मुक्त करने की पद्ध्ति का सार रूप ही है।

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देश के यशस्वी प्रधानमंत्री मोदी जी के अनुकरणीय प्रयास द्वारा 21 जून विश्व योग दिवस के रूप में दुनियाभर के लगभग 200 देश योग के माध्यम से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से भारत के साथ जुड़ने के साथ जब योग को अंगीकार कर रहे होते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे विश्वगुरू आर्यावर्त् की परिकल्पना फिर से सजीव रूप ले रही हो। 

पूरी दुनिया को एक करता है योग 
योग समस्त संसार में मानवतावादी दृष्टिकोण को प्रबलतम बनाता है। प्राचीनकाल से चली आ रही महर्षि पतंजलि की थाती को वर्तमान काल में विश्वभर में गौरव और सम्मान दिलाने वाले कर्मयोगियों, महेश योगी जी, आचार्य धीरेंद्र ब्रह्मचारी जी, योगऋषि बी.के.एस. अयंगर से होती हुई योग और स्वदेशी के क्रांतिकारी व अंतरराष्ट्रीय दूत योगऋषि स्वामी रामदेव जी योग की गंगा को घर-घर जन-जन तक पहुंचाने का भागीरथ कार्य प्रभावी रूप से करते रहे हैं।
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खास बात यह है कि इस कार्य को सर्वस्वीकार बनाकर नई दिशा और ऊंचाइयों पर ले जाने का अभूतपूर्व कार्य माननीय नरेन्द्र मोदी जी ने संयुक्त राष्ट्रसंघ के माध्यम से योग दिवस के रूप में किया है।

यह योगदर्शन भारतीय मनीषियों,ऋषियों द्वारा दी गई अनुपम जीवन शैली है जिसके अभ्यास का प्रभाव मानव के सम्पूर्ण व्यक्तित्व पर पड़ता है। 'सत्यम शिवम् सुंदरम' को यथार्थ रूप में धारण करने या साकार करने का सर्वोत्तम साधन ही योग है। इसे महाविज्ञान कहें या भारतीय मनीषियों द्वारा लोककल्याण के निमित्त वरदान। 

अगर मैं अपनी बात करूं तो  बाल्यकाल से ही योग, धर्म, संस्कृति,प्रकृति, अध्यात्म आदि के अध्ययन में अभिरुचि रही किन्तु जब 11वीं कक्षा लगभग 16 वर्ष की आयु में, खेलकूद (क्रिकेट एवं एथेलेटिक्स) में गहरी रुचि थी। पतला-दुबला किन्तु छरहरा शरीर, विविध कलाओं में प्रदर्शन पुरस्कार आदि। उसी समय योगाभ्यास दिनचर्या का भाग बना जिसका प्रभाव शारीरिक, मानसिक, आत्मिक विकास का आधार बना।

बचपन में ध्रुव , प्रह्लाद की कहानियां पढ़-सुनकर, महान योगियों के बारे में जानकर योग के प्रति आकर्षण बना हुआ था जो किशोरावस्था तक आते-आते स्वास्थ्य के लिए प्रेरणा बन गया। जीवन की दिशा बदल गई। लगभग 40 वर्षों के योग जीवन में शारीरिक मानसिक चेतना को निरंतर नूतन नवल आयाम मिलते रहे हैं।  सृजनशीलता  को आधार मिलता रहा है।
 

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सनातन काल से ही आर्यावर्त में योगियों की एक लंबी श्रृंखला रही है। - फोटो : pixabay
योग ने जीवन बदल दिया 
योग साधना में आसन प्राणायाम एवं ध्यान का अभ्यास वर्षों से करता रहा हूं। जहां तक लाभ का प्रश्न है उसकी कोई व्याख्या शब्दों में नहीं कि जा सकती। लौकिक- पारलौकिक, ज्ञान- विज्ञान,पराविज्ञान सभी कुछ योगाभ्यास से प्राप्त हो सकता है। सच कहूं तो मानव को महामानव बनाने का उपक्रम ही योग है।

वैसे समग्र रूप में योग को देखें तो यह एक महाविज्ञान है जिसके अनेक रूप हैं। समय- समय पर अनेक योगियों ने अपने शोध एवं अनुभवों के आधार पर योग के भिन्न -भिन्न रूपों की व्याख्या की है, जिसे सरलीकृत कर मानव-कल्याण हेतु प्रस्तुत भी किया गया। ऐसा कहा जा सकता है कि योग के आदि गुरु भगवान महादेव हैं। योग की उच्चता का यदि दर्शन करना है तो योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण के श्रेष्ठ और दूसरा उदाहरण क्या हो सकता है। 

भारत में योग की अनादि परंपरा 
सनातन काल से ही आर्यावर्त में योगियों की एक लंबी श्रृंखला रही है, जिनमें से महर्षि पतंजलि योगी मत्येन्द्रनाथ, गुरु गोरक्षनाथ,घेरण्ड ऋषि जैसे अनेकों श्रेष्ठ मनीषियों ने योग के प्रभाव से जान-सामान्य को चमत्कृत व लाभान्वित किया है।

ऋषियों, मुनियों, योगियों की परंपरा में हठयोग का प्रचलन हजारों वर्षों से रहा है, जो अष्टांगयोग, क्रियात्मक योग के रूप में समाज में प्रचलित है। यम-नियम, आसन- प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान , समाधि ये आठ अंग हैं ! किन्तु सामान्य रूप से जनसाधारण में आसन , प्राणायाम एवं ध्यान का अभ्यास साधक करते हैं। इनके निरंतर अभ्यास से शेष अंगों से होने वाले लाभ भी प्राप्त होने लगते हैं।

पांच तत्वों से बनी हमारी देह आत्मिक चेतना को आधार देती है। योग ऋषियों ने हमारे स्थूल-सूक्ष्म एवं कारण शरीर को पांच कोषों में बांटा है। अन्नमय कोष, प्राणमय कोष, मनोमय कोष, विज्ञानमय कोष आनन्दमय कोष। योगाभ्यास के माध्यम से इन सभी कोषों के मध्य संतुलन तथा शरीर और मन में चेतना का प्रवाह बना रहता है। 

योगाभ्यास से लाभ के लिए शरीर शुद्ध, पेट साफ और मन शांत होना चाहिए। आसपास का वातावरण प्राणवायु से ओतप्रोत और शुद्ध हो। पहले सूक्ष्म व्यायाम के द्वारा शरीर को योगाभ्यास के लिए तैयार करें जिससे शरीर के अंग प्रत्यंगों में रक्त का प्रवाह सुचारू रूप से होने लगे, जिससे ऊतक और मांसपेशियां नर्म और गर्म हो जाएं। उसके पश्चात् आसनों का अभ्यास और फिर प्राणायाम-ध्यान का अभ्यास करें। इससे हम प्रकृति के साथ सूक्ष्म रूप से जुड़ते चले जाएंगे, और शरीर-मन स्वस्थ और निर्मल होता चला जाएगा। योगाभ्यास के साथ-साथ समुचित एवं संतुलित आहार विहार भी आवश्यक है।  

संक्षेप में कहा जाए तो योग वर्तमान में मानव समाज को स्वस्थ एवं निरोग रखने की बहुत बड़ी आवश्यकता है। 

योग को जीवन चर्या का अंग बनाएँ और स्वस्थ जीवन जियें। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।


 
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