लखनऊ घराना
लखनऊ घराने के प्रथम गुरु ईश्वरी प्रसाद जी कहे जाते हैं। कहा जाता है कि ईश्वरी प्रसाद जी को कृष्ण ने जन्म दर्शन दिए थे और कहा था कि भागवत पर नृत्य बनाओ। तब उन्होंने कथक नृत्य को जाना। इसको नटवरी नृत्य भी इसीलिए कहा जाता है। प्राचीन गुरुओं में ईश्वरी प्रसाद जी और गोखरू, तुलाराम एवं अन्य गुरुजनों द्वारा लखनऊ घराने के प्रयोग से कथक कृष्णामय हो गया।
कथक नृत्य के इस घराने को ईश्वर के आशीर्वाद स्वरूप महाराज बिंदादीन, अच्छन महाराज, शंभू महाराज, पंडित बिरजू महाराज का आशीर्वाद मिला। वर्तमान समय में पंडित बिरजू महाराज का परिवार इस घराने की विरासत को संभाल रहे हैं।
जयपुर घराना
करीब डेढ़ सौ वर्ष पूर्व जयपुर घराने का उदय हुआ जो कि भानु जी द्वारा हुआ। वह भक्ति और संतो में भी रुझान रखते थे। उन्होंने एक संत से शिव तांडव की शिक्षा ली थी। फिर भानु जी वृंदावन आए और कृष्ण भक्तों के रूप में उन्होंने लास्य पर भी अधिकार कर लिया। जयपुर के गुरुजनों में भानुजी, चुन्नी लाल, दुर्गा प्रसाद इत्यादि रहे। वर्तमान समय में गुरु राजेंद्र गंगानी, गुरु गीतांजली इस की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
बनारस घराना
कथक के बनारस घराने का उद्भव केंद्र राजस्थान ही था पर पूर्ण विकास बनारस में ही हुआ। जानकी प्रसाद जी द्वारा यह घराना पल्लवित हुआ। गोपीकृष्ण जी, सितारा देवी जैसे कलाकारों ने इस घराने का परचम लहराया। सितारा देवी 'क्वीन ऑफ कथक' के नाम से प्रसिद्ध हुई। वर्तमान में प्रमुख बनारस के कलाकार और सितारा देवी की पुत्री इस कला को पल्लवित कर रही हैं।
रायगढ़ घराना
रायगढ़ घराना जोकि सभी घरानों को देखते हुए नया है और इसका उगम राजा चक्रधर ने किया था उन्होंने कथक को बोलो से जोड़कर परण, टुकड़ों से कथक के सौंदर्य को बल दिया था इस घराने के शिष्य देश-विदेश में नाम कमा रहे हैं।
मेरी कथक शिक्षा मात्र तीन वर्ष की आयु में ही शुरू हो गई थी। नृत्य के द्वारा मैंने अपने आप को महसूस किया और मेरे नृत्य प्रदर्शन में महत्वपूर्ण होता है कि मैं उन सामाजिक दुर्दशा को देखकर अपने नृत्य में अपने दर्शकों तक एक संदेश पहुंचाने की कोशिश करती हूं। जिससे वह सिर्फ कला और मनोरंजन का ही साधन ना रहे अपितु वह उन भावों को समझकर समाज में कुछ काम करने में सहायता कर सके। एक जागरूकता आ सके।
कथक को जन-जन तक पहुंचाना निरंतर एक मुहिम के साथ चल रहा है। युवा कलाकारों और दिव्यांगों की समस्या को देखते हुए मैंने एक संस्था का भी गठन किया। 10 साल से यह अंजना वेलफेयर सोसाइटी के नाम से गुरुजनों के सानिध्य में युवाओं को कला में पारंगत करने की कोशिश साथ ही साथ दिव्यांग युवा कलाकारों को एक सुंदर मंच देने के प्रयास में रहती है। कला व संस्कृति मंत्रालय और यूनेस्को जैसी संस्थाओं के सहयोग से इसे संबल मिलता रहता है।
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