प्राचीन यूनानियों ने जब से गोलाकार चंद्रमा और आकाश का अवलोकन किया है, तब से ही वैज्ञानिक जानते हैं कि पृथ्वी गोल है। हम सबने अंतरिक्ष से पृथ्वी की कुछ सुंदर तस्वीरें देखी हैं, कुछ तस्वीरें अंतरिक्ष यात्रियों ने, तो कुछ परिक्रमा करने वाले उपग्रहों ने जुटाई हैं। लेकिन जब हम किसी पार्क में खड़े होते हैं या खिड़की से बाहर देखते हैं, तो हमारी धरती चारों ओर गोल क्यों नहीं दिखती? इसका जवाब है, ‘इन्सान बहुत छोटा प्राणी है, जो वास्तव में एक बहुत बड़े क्षेत्र में रहता है।’
एक जवान मनुष्य की औसतन ऊंचाई पांच से साढ़े छह फुट तक होती है और बच्चे तो और छोटे होते हैं। कल्पना कीजिए कि आप एक सर्कस कलाबाज हैं और तीन फुट (एक मीटर) चौड़ी गेंद पर खड़े हैं। गेंद के ऊपर से आप इसे अपने पैरों से सभी दिशाओं में मुड़ते हुए देखेंगे। अब उस सर्कस की गेंद पर एक छोटी मक्खी की कल्पना करें।
वह मक्खी संभवतः सतह से एक मिलीमीटर या उससे कुछ ऊपर शायद ही देख सके। चूंकि मक्खी गेंद से बहुत छोटी होती है और उसका दृश्य सतह के करीब होता है, इसलिए वह पूरी गेंद को नहीं देख पाती है। पृथ्वी 4.20 करोड़ फुट (1.28 करोड़ मीटर) चौड़ी है, एक वयस्क सतह से सिर्फ छह फुट ऊपर है। इसलिए जब हम धरती पर खड़े होते हैं, तो गोलाकार पृथ्वी को हमारी आंखें नहीं देख पाती हैं। यहां तक कि आप भले ही समुद्र तल से 29,035 फुट ऊंची माउंट एवरेस्ट की चोटी पर चढ़ जाएं, तब भी नहीं बता पाएंगे कि पृथ्वी एक गोला है।
पृथ्वी के वक्र को देखने के लिए इसकी सतह से दस किलोमीटर से अधिक ऊपर उड़ना होगा। धरती की सतह पर खड़े होकर हमारी आंखें करीब 4.8 किलोमीटर के दायरे में देख सकती हैं। इसलिए जैसे-सर्कस की गेंद की सतह पर बैठकर मक्खी पूरी गेंद को नहीं देख सकती, ठीक उसी तरह हम भी सतह पर खड़े होकर पृथ्वी को पर्याप्त रूप से नहीं देख पाते, जहां वह आकाश से मिलती है।
अगर वाकई आप पूरी पृथ्वी को गोलाकार देखना चाहते हैं, तो आपको किसी अंतरिक्ष यात्री के साथ या फिर उपग्रह के साथ धरती से बहुत अधिक ऊंचाई पर यात्रा करनी होगी। अधिक ऊंचाई पर पहुंचकर आपको पृथ्वी का पूरा दृश्य दिख जाएगा। हो सकता है कि अंतरिक्ष से भी पृथ्वी पूरी तरह गोल न दिखे, इसका कारण उसका घूर्णन होता है, जिससे वह कुछ चपटी दिखती है।