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दूसरा पहलू: समुद्री बर्फ और बलगम सरीखे पैराशूट, शोधकर्ताओं को मिला नया दृष्टिकोण

Wed, 20 Nov 2024 08:03 AM IST
ज्योति भास्कर वेरोनिक ग्रीनवुड

सार

एक नए प्रकार के माइक्रोस्कोप के साथ शोधकर्ताओं को समुद्री बर्फ के निचली सतह पर गिरने का नया दृष्टिकोण मिला। समुद्र की गहराई में जहां सूरज की किरणें नहीं पहुंच पातीं, अन्य समुद्री जीव भोजन के लिए समुद्री बर्फ पर निर्भर रहते हैं।
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वेरोनिक ग्रीनवुड: शोधकर्ताओं को समुद्री बर्फ के निचली सतह पर गिरने का नया दृष्टिकोण मिला - फोटो : अमर उजाला / एजेंसी
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विस्तार
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समुद्र ऐसे सूक्ष्म जीवों से भरा है, जो सूर्य की रोशनी में पनपते हैं। ये बैक्टीरिया और प्लवक समय-समय पर मछली के अपशिष्ट की तरह मलबे के साथ जमा हो जाते हैं। फिर धीरे-धीरे नीचे की ओर बहते हैं, जिसे वैज्ञानिक समुद्री बर्फ कहते हैं। समुद्र की स्याह गहराई में, जहां सूरज की किरणें नहीं पहुंच पातीं, अन्य समुद्री जीव भोजन के लिए इस बर्फ के लगातार गिरने पर निर्भर रहते हैं। जमीन पर रहने वाले लोग भी इस पर निर्भर हैं। समुद्री बर्फ पृथ्वी के वायुमंडल को गर्म करने के बजाय समुद्र में भारी मात्रा में कार्बन जमा कर धरती के तापमान को संतुलित करती है। एक बार जब समुद्री बर्फ के कण समुद्र तल पर पहुंच जाते हैं, तो उनका कार्बन कई युगों तक वहीं पड़ा रहता है।
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चिपचिपे पारदर्शी पैराशूट के कारण बर्फ के नीचे आने की प्रक्रिया धीमी
माना जाता था कि समुद्री बर्फ सामान्य तरह से गिरती है, लेकिन हाल ही में वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि कई कण बलगम सरीखे पैराशूट की तरह गिरते हैं। शोधकर्ताओं ने जब इस घटना को देखा, तो वे खुले समुद्र में बर्फ को गिरते हुए देखने के लिए आधुनिकतम माइक्रोस्कोप लेकर पहुंचे। उन्होंने पाया कि चिपचिपा पारदर्शी पैराशूट बर्फ के नीचे आने की प्रक्रिया को धीमा कर देता है, जिससे पता चलता है कि समुद्री बर्फबारी बैक्टीरिया और प्लवक द्वारा नियंत्रित एक नाजुक प्रक्रिया है। ये निष्कर्ष हाल ही में साइंस जर्नल में प्रकाशित हुए हैं। इस शोध कार्य में शामिल स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के जैव इंजीनियर मनु प्रकाश ने बताया कि समुद्री बर्फबारी का प्रयोगशाला में अध्ययन करना मुश्किल है।

डॉ. प्रकाश ने बताया कि पहले के शोध में माना गया था कि बैक्टीरिया और प्लवक द्वारा निर्मित बलगम समुद्री बर्फ का एक घटक था, लेकिन हमने पाया कि बलगम मुख्यतः कणों को जोड़ने वाला गोंद था।

वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे
डॉ. प्रकाश के अनुसार, ये कण नाजुक होते हैं, इसलिए हमने एक उपकरण विकसित किया, जिसे ‘द ग्रैविटी मशीन’ कहते हैं, जिसका समुद्री पानी से भरा पहिया लगातार घूमता रहता है। पहिये में पानी की जांच के लिए माइक्रोस्कोप का उपयोग कर टीम ने कणों को चलते हुए ट्रैक किया, जिससे समुद्री बर्फ के हिलन-लुढ़कने का अध्ययन करने में सहूलियत हुई। वैज्ञानिकों ने आश्चर्यजनक घटना देखी, जिसमें बर्फ के टुकड़ों से पैराशूट बन रहे थे। इससे वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि बलगम का कण जितना बड़ा होगा, उसका गिरना उतना ही धीमा होता जाएगा। पहले के शोध में माना गया था कि बैक्टीरिया और प्लवक द्वारा निर्मित बलगम समुद्री बर्फ का एक घटक था, लेकिन हमने पाया कि बलगम मुख्यतः कणों को जोड़ने वाला गोंद था। फ्रेंच नेशनल सेंटर ऑफ साइंटिफिक रिसर्च के लियोनेल गाइडी और इंग्लैंड में नेशनल ओशिनग्राफी सेंटर के बीबी केल ने भी डॉ. प्रकाश और उनकी टीम के शोध का समर्थन किया है।
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