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पंछियों का संसार और हम: सवाना के शाही पक्षी, हुकना की कहानी 

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मादा हुकना और उसका चूज़ा - फोटो : देवेश गढवी, दी कॉर्बेट फाउंडेशन
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भारत शानदार परिदृश्यों और निवास का देश है। उनमें से एक है सवाना घास का मैदान जो राजस्थान, गुजरात, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक के शुष्क क्षेत्रों में वितरित है। हालांकि घास के मैदानों को बड़े पैमाने पर अन्य भूमि उपयोग प्रकारों में बदल दिया गया है, एक बड़ा भाग अभी भी राजस्थान के जैसलमेर, कच्छ के छोटे रण और दक्कन प्रायद्वीप के कुछ हिस्सों में है। जाहिर है ऐसे घास के मैदान यहां पाए जा सकते हैं।

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इन क्षेत्रों की यात्रा पर, भाग्य अच्छा होने पर, एक शाही पक्षी जिसे अंग्रेजी में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड कहते हैं, को देखने का मौका प्राप्त हो सकता है। यह एक बड़े आकार का, भारी एवं छोटी उड़ान भरने वाला, बस्टर्ड प्रजाति का पक्षी है, जो विश्वभर में, केवल भारतीय उपमहाद्वीप पर पाया जाता है। इसकी हूंक जैसी पुकार के वजह से इसे हिंदी में हुकना नाम से जाना जाता है।   

पक्षी एक नाम अलग 
अपनी धीमी चाल की वजह से, राजस्थान में इसे गोडावण नाम दिया गया है।  गुजरात में इसे घोरड़ तथा महाराष्ट्र में मालढोक के नामों से जाना जाता है। हुकना का वजन 15-18 किलोग्राम के बीच होता है, तथा ऊंचाई 1 मीटर। इसका शरीर भूरे रंग का होता है, शीश एवं गर्दन सफेद, तथा सिर पर एक सुंदर काला मुकुट और कलगी होती है।

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सवाना के सघन घास के बीच में इसकी धीमी गति की चाल अति मनमोहक होती है, तथा राजस्थान के महाराजाओं के राजसी गौरव का एक सहज अनुस्मारक है। भारतीय उपमहाद्वीप पर उड़ान भर पाने वाला यह सबसे भरी पक्षी है। मादा हुकना को रिझाने के लिए, नर हुकना के गर्दन पर स्थित गूलर की थैली सावन के महीने में अति लंंबी और फूल जाती है। सामान्यतः, हुकना साल में केवल एक अंडा देता है, जिसे वह मैदानों में भूमि पर ही घोसंलों  में रखता है। 

पाया गया है कि आमतौर पर 40-50% बार ही उसके अंडे में से नवजात, सफलता से निकलते हैं। यह प्राकृतिक विशेषता हुकना की आबादी को तेज़ी से बढ़ने नहीं देती। मुग़ल और अंंग्रेज हुकना का शिकार करना तथा उसका मास भक्षण करना अत्यधिक पसंद करते थे। हालांकि अब हुकना को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (1972) के तहत कानूनी संरक्षण प्राप्त है। 

कम होने लगी संख्या तो मिला संरक्षण
ऐतिहासिक काल में हुकना आमतौर पर पश्चिमी और डेक्कन प्रायद्वीपीय के सूखे घास के मैदानों में पाया जाता था, और ‘80 के दशक तक इसकी आबादी 1500-2000 तक बताई जाती थी। हुकना की घटती आबादी का अनुमान तब लगा जब 2008 में देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिकों के अनुसंधान में पाया की हुकना की आबादी देशभर में 150 से कम हो चुकी है।  फलस्वरुप, भारतीय सरकार के पर्यावरण मंत्रालय तथा वन विभाग ने हुकना के संरक्षण हेतु कई अनुसंधान परियोजनाओं एवं सामाजिक जागरूकता योजनाओं को बढ़ावा दिया।

हुकना के ऐतिहासिक आवास क्षेत्रों में प्रमुख रूप से भारतीय वन्यजीव संस्थान, बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी, दी कॉर्बेट फाउंडेशन तथा कई गैर सरकारी संगठन मेंं कार्यरत हैं। सभी संस्थानों के अनुसन्धान से यह साफ़ है कि हुकना की घटती आबादी के मुख्य कारणों में, प्रमुखतः सवाना मैदानों का रूपांतरण और क्षेत्रीय कमी है।
 

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कच्छ के आखिरी नर हुकना की छवि  - फोटो : देवेश गढवी, दी कॉर्बेट फाउंडेशन

सवाना घास स्थल को अक्सर खेती या विकास योजनाओं के लिए रूपांतरित किया जाता है। इन मैदानी क्षेत्रों में अक्सर वायु ऊर्जा के उत्पादन के लिए वायु चक्कियों का तंत्र बिछाया जाता है, जिनमें नीची उड़ान भरने वाले हुकना पक्षी अक्सर फंसकर प्राणघात क्षति पाते हैं। जंगली कुत्ते और रेगिस्तानी लोमड़ी इसके अंडों के लिए भी एक खतरा है। 

सरकार नेे की पहल 
हुकना की आबादी को बढ़ाने के लिए पर्यावरण मंत्रालय तथा राजस्थान वन विभाग के सहयोग से, भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिकों ने राजस्थान के सम इलाके में हुकना के वैज्ञानिक प्रजनन केंद्र की स्थापना की और 2019 में अंडा प्रजनन के रूप में बड़ी सफलता हासिल की।

वायु चक्कियों के तारों पर पीले रंग के चिन्ह भी लगाए गए, जिससे हुकना को उड़ान में बाधा ठीक तरह से दिखाई दे और वह दिशा बदल सके। वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, सरकारी योजनाओं तथा  गैर सरकारी संस्थाओं के सहयोग से हुकना की आबादी तथा घास के मैदानों की सुरक्षा की आशा की जा सकती है।  

हुकना की महिमा से साक्षात्कार होने के लिए आप राजस्थान के डेजर्ट नेशनल पार्क, गुजरात के कच्छ बस्टर्ड सैंक्चुअरी या आंध्र प्रदेश के रोल्लापाडु वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी जा सकते हैं। 
 

लेखक: प्रियम्वदा बगरिया भू-स्थानिक विश्लेषण में विशेषज्ञता वाला एक भूवैज्ञानिक पारिस्थितिकी विद् है। वह भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून से वन्यजीव विज्ञान में डॉक्टरेट हैं। पक्षियों में उनकी रुचि अपने अनुसंधान के दौरान देहरादून के वन अनुसंधान संस्थान में शुरू हुई, जहां उन्होंने एफआरआई परिसर में पक्षियों का अध्ययन किया। वह भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून में हुकना के लिए प्रजाति पुनर्प्राप्ति कार्यक्रम से जुड़ी थीं। 
 

यह श्रंखला 'नेचर कन्ज़र्वेशन फाउंडेशन (NCF)' द्वारा चालित 'नेचर कम्युनिकेशन्स' कार्यक्रम की एक पहल है। इस का उद्देश्य भारतीय भाषाओं में प्रकृति से सम्बंधित लेखन को प्रोत्साहित करना है। यदि आप प्रकृति या पक्षियों के बारे में लिखने में रुचि रखते हैं तो ncf-india से संपर्क करें। 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।


 

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