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पश्चिम बंगाल चुनाव 2021: धर्म आधारित राजनीति की प्रयोगशाला बनता नंदीग्राम

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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2021, नंदीग्राम सीट नाक का सवाल बन गई है। - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में इस बार धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण की कोशिश जोर पकड़ रही है। हालांकि इसका प्रभाव पूरे राज्य में देखा जा सकता है लेकिन पूर्व मेदिनीपुर जिले का अब प्रसिद्द हो चुका कस्बा नंदीग्राम इस समय खासा केंद्र में है। राज्य की सबसे हाई प्रोफाइल सीट बनी नंदीग्राम सत्ता के दोनों दावेदारों टीएमसी और बीजेपी के लिए नाक और साख का सवाल बन गई है। यह कहना ज्यादा सही होगा कि इस सीट का नतीजा दोनों दलों के साथ ही राज्य का भविष्य भी तय करेगा। 

नंदीग्राम में मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी का मुकाबला हाल तक अपने करीबी रहे और बीजेपी उम्मीदवार सुवेंदु अधिकारी से ही नहीं है बल्कि यहां उनका मुकाबला बीजेपी के हिंदुत्व के साथ भी है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक, बीजेपी के तमाम नेता इलाके में आ रहे हैं। जंग के बीच में अब सॉफ्ट हिंदू और हार्ड हिंदुत्व की अवधारणा खड़ी होती दिखाई दे रही है। 

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अपने पहले दौरे में मंच से खुद को ब्राह्मण की बेटी बताना और चंडी पाठ करना इसका प्रमाण है। हालांकि बीते 10 मार्च को इलाके में हुए हमले या हादसे में लगी चोट के बाद उनके पक्ष में सहानुभूति लहर उमड़ने के अंदेशे से भगवा खेमा परेशान है। इसी वजह से केंद्रीय नेतृत्व ने अपने तमाम नेताओं से इलाके में अपने भाषण में ममता की चोट का जिक्र करने से बचने को कहा है।

इसी के अनुरूप इलाके में पहुंचे योगी आदित्यनाथ ने भी सिर्फ हिंदुत्व,पूजा-पाठ और ममता के चंडी पाठ का ही जिक्र किया, उनको लगी चोट का नहीं।ठीक चौदह साल पहले जिस नंदीग्राम में हुए जमीन-अधिग्रहण विरोधी आंदोलन और पुलिस फायरिंग में इलाके के 14 लोगों की मौत ने ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के सत्ता में पहुंचने की जमीन तैयार की थी अब उसकी इस विरासत पर कब्जे के लिए तृणमूल के साथ ही बीजेपी ने भी अपने तमाम संसाधनों और नेताओं को झोंक दिया है।
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नंदीग्राम में अपना नामांकन भरते हुए सुवेंदु अधिकारी - फोटो : ANI

बीजेपी ने इस सीट पर कब्जे के लिए उन सुवेंदु अधिकारी पर ही दांव लगाया है जो हाल तक ममता का दाहिना हाथ थे। दरअसल, नंदीग्राम में जो आंदोलन शुरू हुआ था उसे संगठित करने में शुभेंदु ने अहम भूमिका निभाई थी। शायद इसलिए पार्टी को लगता है कि अपनी उस भूमिका और अधिकारी परिवार के रसूख का लाभ सुवेंदु व बीजेपी को मिलेगा।

ममता बनर्जी ने नामांकन पत्र दाखिल करने के दौरान नंदीग्राम इलाके में 12 मंदिरों और एक मजार के दर्शन किए थे। मंदिरों के दौरे और मंच से चंडीपाठ करने के साथ ही खुद को ब्राह्मण की बेटी बताने को बीजेपी के के खिलाफ ममता की रणनीति माना जा रहा है, साथ ही वे अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के बीजेपी के आरोपों को भी हलका करना चाहती हैं।

टीएमसी के वरिष्ठ नेताओं की दलील है कि ममता का मंदिर के दौरे का चुनाव से कोई संबंध नहीं हैं। वे पहले भी अपने दौरों में धार्मिक स्थानों पर जाती रही हैं। टीएमसी सांसद सौगत राय कहते हैं - ‘हम बीजेपी की तरह सांप्रदायिक राजनीति में भरोसा नहीं करते। शुभेंदु एक विश्वासघाती हैं। वे अपने तमाम आदर्शों को भुला चुके हैं। यही वजह है कि वे नंदीग्राम की लड़ाई को हिंदू बनाम मुस्लिम बनाने का प्रयास कर रहे हैं। हमारी पार्टी का कोई धार्मिक एजेंडा नहीं है।‘लेकिन बीजेपी का दावा है कि इलाके की हिंदू आबादी को लुभाने के लिए ही ममता यह सब कर रही हैं। उनको समझ में आ गया है कि नंदीग्राम में महज अल्पसंख्यक वोट बैंक के सहारे जीत सुनिश्चित करना मुश्किल है।
 

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नंदीग्राम में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी - फोटो : ANI

सुवेंदुु अधिकारी सवाल करते हैं कि आखिर ममता को इतने मंदिरों में जाने की क्या जरूरत पड़ गई? वह कहते हैं, ममता ने 30 फीसदी अल्पसंख्यक वोटों के सहारे ही यहां से चुनाव लड़ने का फैसला किया था। ममता के साथ घूमने वाले लोगों को देख कर इसे आसानी से समझा जा सकता है। तृणमूल कांग्रेस ही धर्म के आधार पर लोगों को बांटने का प्रयास कर रही है, लेकिन अपने पहले नंदीग्राम दौरे में जहां ममता ने बीजेपी के इस आरोप का जवाब दिया वहीं उसके हिंदुत्व की विचारधारा पर भी सवाल खड़े किए।

उन्होंने अपने भाषण में इमोशन का तड़का भी लगाया। ममता का कहना था, “अगर आप लोग नहीं चाहते तो मैं यहां से नामांकन दाखिल नहीं करूंगी।” नंदीग्राम में उन्होंने अपना परिचय घरेर मेये  यानी घर की लड़की के तौर पर देते हुए बीजेपी को हिंदू कार्ड खेलने से बाज आने की चेतावनी दी उन्होंने कहा, “धर्म से ना खेलें। खेल होगा। मैं अपना नाम भूल सकती हूं लेकिन नंदीग्राम को नहीं।” 

ममता ने बीजेपी का नाम लिए बिना कहा, “जो लोग हिंदू-मुस्लिम कार्ड खेल रहे हैं, उनको साफ बताना चाहती हूं कि मैं भी एक हिंदू ब्राह्मण परिवार की लड़की हूं और रोज सुबह चंडीपाठ करती हूं। मेरे साथ हिंदू कार्ड ना खेलें।

“हिंदू-विरोधी होने के बीजेपी के आरोपों को खारिज करते हुए उनका कहना था कि वे हिंदू धर्म और इसकी परंपराओं के बारे में भगवा पार्टी के नेताओं से कहीं ज्यादा जानती हैं। ममता ने चुनौती दी कि अगर किसी को मेरे धर्म के बारे में शक है तो मैं उससे बहस करने और हिंदू श्लोकों के पाठ में प्रतिस्पर्धा करने के लिए तैयार हूं।

दरअसल, नंदीग्राम का जातीय गणित बताता है कि यहां हिंदुत्व कार्ड इतना अहम क्यों है। इस विधानसभा क्षेत्र में 30 फीसदी अल्पसंख्यक हैं और 70 फीसदी हिंदू। बीजेपी को इन हिंदू वोटरों पर भरोसा है तो ममता को अल्पसंख्यक वोटरों पर। 

नंदीग्राम में दलित वोटरों की तादाद करीब 40 फीसदी है। बीजेपी को इन वोटरों के समर्थन का भी भरोसा है। दोनों पार्टियां एक-दूसरे के वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए तरह-तरह की रणनीति अपना रही हैं। इसी के तहत बीजेपी कहीं ममता को बाहरी बता रही है तो कहीं उन पर तुष्टिकरण के आरोप लगाए जा रहे हैं।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 

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