कच्छ के आखिरी नर हुकना की छवि
- फोटो : देवेश गढवी, दी कॉर्बेट फाउंडेशन
सवाना घास स्थल को अक्सर खेती या विकास योजनाओं के लिए रूपांतरित किया जाता है। इन मैदानी क्षेत्रों में अक्सर वायु ऊर्जा के उत्पादन के लिए वायु चक्कियों का तंत्र बिछाया जाता है, जिनमें नीची उड़ान भरने वाले हुकना पक्षी अक्सर फंसकर प्राणघात क्षति पाते हैं। जंगली कुत्ते और रेगिस्तानी लोमड़ी इसके अंडों के लिए भी एक खतरा है।
सरकार नेे की पहल
हुकना की आबादी को बढ़ाने के लिए पर्यावरण मंत्रालय तथा राजस्थान वन विभाग के सहयोग से, भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिकों ने राजस्थान के सम इलाके में हुकना के वैज्ञानिक प्रजनन केंद्र की स्थापना की और 2019 में अंडा प्रजनन के रूप में बड़ी सफलता हासिल की।
वायु चक्कियों के तारों पर पीले रंग के चिन्ह भी लगाए गए, जिससे हुकना को उड़ान में बाधा ठीक तरह से दिखाई दे और वह दिशा बदल सके। वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, सरकारी योजनाओं तथा गैर सरकारी संस्थाओं के सहयोग से हुकना की आबादी तथा घास के मैदानों की सुरक्षा की आशा की जा सकती है।
हुकना की महिमा से साक्षात्कार होने के लिए आप राजस्थान के डेजर्ट नेशनल पार्क, गुजरात के कच्छ बस्टर्ड सैंक्चुअरी या आंध्र प्रदेश के रोल्लापाडु वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी जा सकते हैं।
लेखक: प्रियम्वदा बगरिया भू-स्थानिक विश्लेषण में विशेषज्ञता वाला एक भूवैज्ञानिक पारिस्थितिकी विद् है। वह भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून से वन्यजीव विज्ञान में डॉक्टरेट हैं। पक्षियों में उनकी रुचि अपने अनुसंधान के दौरान देहरादून के वन अनुसंधान संस्थान में शुरू हुई, जहां उन्होंने एफआरआई परिसर में पक्षियों का अध्ययन किया। वह भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून में हुकना के लिए प्रजाति पुनर्प्राप्ति कार्यक्रम से जुड़ी थीं।
यह श्रंखला 'नेचर कन्ज़र्वेशन फाउंडेशन (NCF)' द्वारा चालित 'नेचर कम्युनिकेशन्स' कार्यक्रम की एक पहल है। इस का उद्देश्य भारतीय भाषाओं में प्रकृति से सम्बंधित लेखन को प्रोत्साहित करना है। यदि आप प्रकृति या पक्षियों के बारे में लिखने में रुचि रखते हैं तो ncf-india से संपर्क करें।
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