नेताओं की दल-बदलने की नीयत से लोकतंत्र को नुकसान भी हुआ है।
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दल बदलने की राजनीति
1970 के दशक में तब संविद सरकारों के सफल होते ही लोकतंत्र में आयाराम-गयाराम की नई राजनीति हुई। विधायकों के खरीद-फरोख्त का जो खेल चला वह थमना तो दूर उल्टा संसद से लेकर विधान सभाओं तक में नासूर बनता गया। इसकी रोकथाम के लिए रिकॉर्ड बहुमत के साथ 1985 में राजीव गांधी की सरकार ने तमाम कोशिशें की। दसवीं अनुसूची में संशोधन करके दलबदल विरोधी कानून बनावाया।
विधायकों और सांसदों के पार्टी से इस्तीफा देने या व्हिप उल्लंघन पर सदस्यता खात्मे तक का नया कानून बना। लेकिन दलबदलुओं ने यहां भी रास्ता निकाल लिया, जो बदले तौर तरीकों से बदस्तूर जारी है। कहीं दो तिहाई विधायकों को तोड़ने या मिलाना, तो कभी मसल या मनी पॉवर या फिर हवाई जहाजों से अपनी-अपनी राज्य सरकारों की निगरानी में सैर सपाटे के नाम पर फाइव स्टार होटलों, रिजार्ट्स में नजरबंदी का खेल भी देश खूब देख रहा है। यकीनन दलबदल कानून कितना भी प्रभावी बनाया गया, राजनीति की बिसात के आगे पूरी तरह से निष्प्रभावी और निरीह दिखने लगा।
भारत में बदलती राजनीति और राजनतिज्ञों की मंशा
चुनाव और राजनीतिक सुधारों की हिमायती संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स यानी एडीआर की एक ताजा रिपोर्ट बताती है कि सन् 2016 से 2020 के बीच हुए चुनावों के दौरान कांग्रेस, बीजेपी समेत कई दलों के नेता दूसरे में शामिल हुए।
433 सांसदों और विधायकों के शपथ पत्रों के विश्लेषण के आधार पर तैयार रिपोर्ट बताती है कि कांग्रेस के 170 यानी 42 फीसदी विधायक दूसरे राजनीतिक दलों में चले गए तो भाजपा के भी 18 यानी 4.4 फीसदी विधायकों ने पार्टी बदली।
चुनाव लड़ने की नीयत से इस 4 साल के दौरान 405 विधायकों में से 182 यानी 44.9 फीसदी भाजपा में, 38 यानी 9.4 फीसदी विधायक कांग्रेस और 25 यानी 6.2 फीसदी विधायकों ने तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) का दामन थामा।
इसी तरह 2019 लोकसभा चुनाव के दौरान 12 सांसदों ने दल-बदल किया, जिसमें 5 यानी 41.7 फीसदी ने भाजपा छोड़ी, जबकि 7 यानी 43.8 फीसदी ने राज्यसभा चुनाव खातिर कांग्रेस छोड़ी। वहीं 2016 से 2020 के बीच हुए राज्य सभा चुनावों के दौरान 16 में 10 यानी 62.5 फीसदी दल-बदल कर भाजपा में शामिल हुए।
दल-बदल या इसके लिए हुए इस्तीफों के चलते मध्यप्रदेश, मणिपुर, गोवा, अरुणाचल प्रदेश और कर्नाटक की सरकारें गिरी। जहां उपचुनाव हुए, वहां वही चेहरे दूसरों दलों के नुमाइंदे बने और जीते भी।
चुनाव व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वकांक्षाओं या हित साधने के लिए निष्ठा बदले जाने का दूसरा नाम बनता जा रहा है?
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राजनीति में आना करियर बन गया
लगता नहीं कि चुनाव व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वकांक्षाओं या हित साधने के लिए निष्ठा बदले जाने का दूसरा नाम बनता जा रहा है? एकदम नया उदाहरण पश्चिम बंगाल और बिहार का है, जहां तृणमूल कांग्रेस से बगावत कर भाजपा से विधायक बने मुकुल रॉय ने तुरंत घर वापसी कर भारतीय राजनीति में जबरदस्त सनसनी फैला दी। अब जबकि भाजपा उनकी अयोग्यता संबंधी दस्तावेज तैयार कर रही है, तो मुकुल रॉय दो दर्जन से ज्यादा विधायकों की घर वापसी कराने के कयासों से सुर्खियों में हैं।
वहीं बिहार में लोजपा में दो फाड़ के 6 में से 5 सांसदों ने नया गुट बना लिया, जिसे लोकसभा अध्यक्ष ने मान्यता भी दे दी। निश्चित रूप से यहां भी राजनीतिक शह-मात, आयाराम-गयाराम और घर वापसी का खेला भी चलेगा। अब देश भर की निगाहें आगामी 5 राज्यों उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर पर है, जहां पंजाब में कांग्रेस बांकी जगह भाजपा की सरकारें हैं।
ठीक इसी वक्त भाजपा नेता राज्यवर्धन सिंह राठौड़ का बयान आया कि उनकी पार्टी के दरवाजे देश को प्राथमिकता देने वालों के लिए खुले हैं। इसके बहुत गहरे मायने हैं, क्योंकि राजस्थान की कांग्रेस सरकार में कलह, तो उत्तर प्रदेश में बुआ-बबुआ यानी बसपा और सपा के बीच विधायक तोड़ने की जंग छिड़ी है। ऐसे में यह न्यौता दल-बदल को प्रोत्साहन ही है।
दल-बदल के कई दिलचस्प उदाहरण हरियाणा में दिखे। उनमें एक है जब 1977 में देवीलाल की जनता पार्टी सरकार बनी। 1979 में भजनाल 3 मंत्रियों को रिझा, इस्तीफा दिलाकर सरकार गिरवा खुद मुख्यमंत्री बन गए। 1980 में इंदिरा गांधी की वापसी के बाद लगा कि कहीं उनकी सरकार भी न गिरा दी जाए? उन्होंने बिना देरी किए अपने पाले के 37 विधायकों को कांग्रेस में शामिल करा भारत के इतिहास में पहली बार रातों-रात जनता पार्टी की सरकार को सुबह होते-होते कांग्रेसी बना दी।
सवाल जहां का तहां दल-बदल उस मतदाता और लोकतंत्र की कसौटी पर कितना खरा? मतदाता चुनता किसी को है, वहीं सदन में पहुंच किसी और का हो जाता है।
जाहिर है अप्रत्यक्ष ही सही किसी दल का मत दूसरे को ट्रांसफर हो जाता है। ऐसे में निर्दलीयों के भाव भी बेकाबू हो जाते हैं। इसके कानूनी पहलू कुछ भी हों, तिकड़म और तकनीकी रूप से खामियां तो भरपूर हैं, जिससे बहुमत का जुगाड़ हो जाता है। ऐसे में दल-बदल कैसे रुक पाएगा? दलबदल रोकने से ही सजीव लोकतंत्र की सुगंध बरकरार रह आगे बढ़ेगी, वरना धीरे-धीरे इसमें भी कहीं दुर्गंध न आने लग जाए?
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