सना मरीन के नेतृत्व में फिनलैंड लगातार पांचवीं बार दुनिया का सबसे खुशहाल देश चुना गया है।
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क्या प्रधानमंत्री की नहीं होती कोई व्यक्तिगत आजादी?
मानव और रोबोट में यही फर्क है कि इंसान खुद को व्यक्त कर सकता है, अपने इमोशन, खुशी को बयां कर सकता है और सना मरीन ने भी यही किया है। देश का संचालन कोई सामान्य कार्य नहीं है, बेहद बोझ वाले इस काम को समझना भी जरूरी है। ऐसे में इस ‘बोझ’ को लगातार उठाए रखने के लिए, उसे शारीरिक और मानसिक रूप दोनों से स्वस्थ होना ज़रूरी है।
अपनों का साथ, उनके बीच बिताए पल, नाच-गाना स्वास्थ्य के लिए बेहद ज़रूरी हैं और यदि सना ने इसके लिए कुछ समय निकाल लिया, तो इसमें बवाल किस बात का? वो भी तब जब एक प्रधानमंत्री के रूप में वह अपनी सभी जिम्मेदारियों को बखूबी निभा रही हैं।
सना मरीन 2019 से फ़िनलैंड की प्रधानमंत्री हैं और उनके कार्यकाल में फिनलैंड लगातार पांचवीं बार दुनिया का सबसे खुशहाल देश चुना गया है। रूस-यूक्रेन युद्ध के मुद्दे पर उन्होंने जो रुख अख्तियार किया, उसकी पूरी दुनिया कायल है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के सामने बोलने में दुनिया के ताकतवर देशों के नेता भी सहम जाते हैं, लेकिन सना ने उन्हें दो टूक शब्दों में कह दिया था कि फ़िनलैंड को भी नाटो में शामिल होने का अधिकार है। उन्होंने यह महज कहने के लिए नहीं कहा, बल्कि उनकी सरकार इस दिशा में आगे भी बढ़ी।
बतौर प्रधानमंत्री सना देश में समानता के लिए काम कर रही हैं, महिलाओं के अधिकार उनकी पहली प्राथमिकता हैं। 2020 में उन्हें BBC की विश्व की 100 सबसे ज्यादा प्रभावशाली महिलाओं की लिस्ट में शामिल किया था। फोर्ब्स पत्रिका ने भी सना मेरिन को प्रभावशाली महिलाओं की सूची में जगह दी है। वह टाइम मैग्जीन के कवर पेज पर भी आ चुकी हैं।
इस आलोचना को तब सही कहा जा सकता था, जब सना की परफार्मेंस ठीक नहीं होती, लोग उनकी काम करने की कार्यशैली के खिलाफ जोर-शोर से प्रदर्शन कर रहे होते। हमें ये समझना ही होगा कि लिबरल सोसाइटी में प्रधानमंत्री को एक इंसान समझना चाहिए, कोई देवदूत नहीं। सना मरीन प्रधानमंत्री हैं, साथ ही वह एक इनसान भी हैं, लिहाजा उन्हें भी इनसान के तौर पर अपनी भावनाएं, प्रतिक्रियाएं और खुशी व्यक्त करने का अधिकार होना चाहिए।
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