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बड़ी बहस: क्या प्रधानमंत्री का कोई निजी अधिकार नहीं होता? सना मरीन को ट्रोल करना वाजिब नहीं

सार

शायद आलोचकों के लिए प्रधानमंत्री की जिंदगी में ‘निजी’ कुछ नहीं होता। उनकी नज़र में PM की कुर्सी पर बैठा शख्स संवैधानिक मर्यादाओं से इस कदर जकड़ा होना चाहिए कि उसके लिए ‘अपना’ कुछ न रह जाए। पर क्या यह वाजिब है?
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फिनलैंड की प्रधानमंत्री सना मरीन ट्रोलर्स के निशाने पर - फोटो : Twitter
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विस्तार
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जब कोई व्यक्ति किसी सार्वजनिक पद पर होता है, तो ये लाजिमी है कि वह गरिमा और मर्यादा की डोरी से बंधा होता है। पर कई बार हम लोग इस डोरी को कुछ ज्यादा ही टाइट करने लगते हैं। ताजा मामला फिनलैंड की 34 वर्षीय प्रधानमंत्री सना मरीन का है। पिछले हफ्ते से वो लगातार ट्रोलर्स के निशाने पर हैं, उनकी गलती सिर्फ इतनी है कि उन्होंने अपने कुछ करीबी मित्रों के साथ अपना अल्प निजी समय अपने तरीके से जी लिया। उन पर आज फिनलैंड के विपक्षी हायतौबा मचाए हुए हैं, विपक्षियों का काम भी यही होता है, इसलिए वो ऐसा करते हैं, तो इससे कोई गुरेज भी नहीं।

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पर मूल मुद्दा है कि उनको चुनने वाले वोटर्स को भी समझना होगा कि आपके द्वारा चुना गया व्यक्ति भी एक इंसान ही है, उसके अंदर भी भावनाएं हैं, वो भी एक स्ट्रेसफुल जॉब के बाद रिलैक्स होना चाहता है, इसलिए उसके निजी जीवन में उतनी ही तांकझांक होनी चाहिए जिसका कोई बड़ा असर राष्ट्र पर पड़ रहा हो। अन्यथा हम अच्छे और पढ़े लिखे लोगों के लिए शायद राजनीति का दरवाजा बंद करने की असमझपूर्ण गलती कर बैठेंगे।
 
आजकल भारत में भी हम इस तरह के ट्रोलर्स के बॉयकॉट अभियान को देख रहे हैं। किसी अभिनेता की पत्नी के एक निजी बयान पर किस तरह उनकी फिल्म का सार्वजनिक बॉयकॉट कर जबरदस्ती प्रभुत्व जमाने की ये क्रिया बेहद खतरनाक है।
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फिनलैंड की प्रधानमंत्री ट्रोलर्स के निशाने पर

भारत से 5974 किमी दूर फिनलैंड में प्रधानमंत्री सना मरीन की जमकर आलोचना हो रही है. उनके खिलाफ सोशल मीडिया पर अभियान चलाया जा रहा है, जिस तरह भारत में बायकॉट के तर्क को समझना मुश्किल है, ठीक उसी तरह सना मरीन की आलोचना भी समझ से परे है। 

इसमें कोई दोराय नहीं है कि मुल्क की जिम्मेदारी संभालने वाले का व्यवहार और आचरण सामान्य लोगों से अलग होना चाहिए, लेकिन जीवन को आनंद के साथ जीने का जितना अधिकार एक सामान्य नागरिक को है, क्या उतना ही प्रधानमंत्री को नहीं होना चाहिए?

शायद आलोचकों के लिए प्रधानमंत्री की जिंदगी में ‘निजी’ कुछ नहीं होता, उनकी नज़र में PM की कुर्सी पर बैठा शख्स संवैधानिक मर्यादाओं से इस कदर जकड़ा होना चाहिए कि उसके लिए ‘अपना’ कुछ न रह जाए। पर क्या यह वाजिब है?

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सना मरीन के नेतृत्व में फिनलैंड लगातार पांचवीं बार दुनिया का सबसे खुशहाल देश चुना गया है। - फोटो : Pixabay
क्या प्रधानमंत्री की नहीं होती कोई व्यक्तिगत आजादी?

मानव और रोबोट में यही फर्क है कि इंसान खुद को व्यक्त कर सकता है, अपने इमोशन, खुशी को बयां कर सकता है और सना मरीन ने भी यही किया है। देश का संचालन कोई सामान्य कार्य नहीं है, बेहद बोझ वाले इस काम को समझना भी जरूरी है। ऐसे में इस ‘बोझ’ को लगातार उठाए रखने के लिए, उसे शारीरिक और मानसिक रूप दोनों से स्वस्थ होना ज़रूरी है। 

अपनों का साथ, उनके बीच बिताए पल, नाच-गाना स्वास्थ्य के लिए बेहद ज़रूरी हैं और यदि सना ने इसके लिए कुछ समय निकाल लिया, तो इसमें बवाल किस बात का? वो भी तब जब एक प्रधानमंत्री के रूप में वह अपनी सभी जिम्मेदारियों को बखूबी निभा रही हैं। 

सना मरीन 2019 से फ़िनलैंड की प्रधानमंत्री हैं और उनके कार्यकाल में फिनलैंड लगातार पांचवीं बार दुनिया का सबसे खुशहाल देश चुना गया है। रूस-यूक्रेन युद्ध के मुद्दे पर उन्होंने जो रुख अख्तियार किया, उसकी पूरी दुनिया कायल है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के सामने बोलने में दुनिया के ताकतवर देशों के नेता भी सहम जाते हैं, लेकिन सना ने उन्हें दो टूक शब्दों में कह दिया था कि फ़िनलैंड को भी नाटो में शामिल होने का अधिकार है। उन्होंने यह महज कहने के लिए नहीं कहा, बल्कि उनकी सरकार इस दिशा में आगे भी बढ़ी।
 
बतौर प्रधानमंत्री सना देश में समानता के लिए काम कर रही हैं, महिलाओं के अधिकार उनकी पहली प्राथमिकता हैं। 2020 में उन्हें BBC की विश्व की 100 सबसे ज्यादा प्रभावशाली महिलाओं की लिस्ट में शामिल किया था। फोर्ब्स पत्रिका ने भी सना मेरिन को प्रभावशाली महिलाओं की सूची में जगह दी है। वह टाइम मैग्जीन के कवर पेज पर भी आ चुकी हैं। 

इस आलोचना को तब सही कहा जा सकता था, जब सना की परफार्मेंस ठीक नहीं होती, लोग उनकी काम करने की कार्यशैली के खिलाफ जोर-शोर से प्रदर्शन कर रहे होते। हमें ये समझना ही होगा कि लिबरल सोसाइटी में प्रधानमंत्री को एक इंसान समझना चाहिए, कोई देवदूत नहीं। सना मरीन प्रधानमंत्री हैं, साथ ही वह एक इनसान भी हैं, लिहाजा उन्हें भी इनसान के तौर पर अपनी भावनाएं, प्रतिक्रियाएं और खुशी व्यक्त करने का अधिकार होना चाहिए।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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