पेप्सिको की पूर्व सीईओ इंद्रा नूई ने भारत और चीन के विकास मॉडल को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की। दरअसल, नूई ने भारत को उथल-पुथल से भरा, जबकि चीन को एकरूप देश बताया है। नूई के विचारों ने एक बार फिर उस बहस को सामने ला दिया है, जो वर्षों से समय-समय पर उठती रही है।
सवाल वही है, क्या भारत को चीन जैसा बनना चाहिए? क्या तेज रफ्तार विकास का मतलब केवल ऊंची-ऊंची इमारतें, चौड़ी सड़कें, विशाल कारखाने और बुलेट ट्रेनें हैं? या फिर किसी देश की असली ताकत उसके नागरिकों की स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक संस्थाओं और सामाजिक संतुलन में भी निहित होती है?
यह सच है कि भारत और चीन, दोनों एशिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं, लेकिन दोनों की विकास यात्रा की बुनियाद बिल्कुल अलग है। भारत का इतिहास, उसकी लोकतांत्रिक परंपरा, सामाजिक विविधता और संवैधानिक व्यवस्था उसे चीन से अलग पहचान देते हैं। इसलिए भारत की तुलना चीन से करना जितना स्वाभाविक है, उतना ही यह समझना भी जरूरी है कि भारत का रास्ता अलग है। शायद यही उसकी सबसे बड़ी ताकत भी है।
चीन के विकास मॉडल के पीछे की हकीकत
यदि इस तुलना को निष्पक्ष दृष्टि से देखें तो चीन का विकास मॉडल जितना आकर्षक दिखाई देता है, उसके पीछे उतनी ही कठोर प्रशासनिक व्यवस्था भी काम करती है। वहां कम्युनिस्ट पार्टी की एकदलीय व्यवस्था है, जहां सरकार का निर्णय अंतिम माना जाता है। बड़े बुनियादी ढांचे के निर्माण से जुड़े फैसले बहुत तेजी से लिए जाते हैं। उन्हें लागू भी कर दिया जाता है, लेकिन इसके साथ यह भी सच है कि वहां नागरिकों को सरकार के निर्णयों का विरोध करने या उन्हें अदालत में चुनौती देने की स्वतंत्रता भारत जैसी नहीं है। यदि किसी परियोजना के लिए हजारों लोगों को विस्थापित करना पड़े तो प्रक्रिया बहुत कम समय में पूरी हो जाती है।
भारत में भूमि अधिग्रहण से लेकर पर्यावरणीय स्वीकृति और न्यायिक समीक्षा तक कई स्तरों पर प्रक्रिया चलती है। कई बार इससे परियोजनाओं में देरी होती है, लेकिन यही लोकतंत्र की कीमत भी है। यहां एक सामान्य किसान भी अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है। सरकार के निर्णय को चुनौती दे सकता है। यही लोकतांत्रिक व्यवस्था नागरिकों के अधिकारों की सबसे बड़ी सुरक्षा है।
यही कारण है कि भारत की विकास यात्रा कई बार धीमी दिखाई देती है, लेकिन उसकी बुनियाद संवाद, सहमति और कानून के शासन पर टिकी होती है। विकास की गति महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि विकास की प्रक्रिया न्यायपूर्ण हो और उसमें समाज के सभी वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित हो।
फिर, चीन के विकास मॉडल के सामने आज कई नई चुनौतियां भी खड़ी हो गई हैं। दशकों तक चली 'वन चाइल्ड पॉलिसी' के कारण वहां जनसंख्या का संतुलन तेजी से बदल रहा है। कार्यशील आबादी घट रही है। बुजुर्गों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसका असर वहां की अर्थव्यवस्था और श्रम बाजार दोनों पर दिखाई देने लगा है।
चीनी समाज में मानसिक तनाव, अकेलापन और अत्यधिक प्रतिस्पर्धा भी गंभीर चिंता का विषय बन चुके हैं। पिछले कुछ वर्षों में वहां 'तांगपिंग' यानी 'लेट जाना' और 'बैलान' जैसी प्रवृत्तियों की चर्चा दुनिया भर में हुई। इन प्रवृत्तियों के माध्यम से बड़ी संख्या में युवा अत्यधिक प्रतिस्पर्धी जीवनशैली से दूरी बनाने की बात कर रहे हैं। वे बेहतर जीवन की तलाश में पारंपरिक सफलता की दौड़ से खुद को अलग करना चाहते हैं। यह स्थिति बताती है कि केवल आर्थिक विकास किसी समाज की सभी समस्याओं का समाधान नहीं कर सकता।
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी, मजबूत पारिवारिक व्यवस्था और सामाजिक विविधता है। यहां परिवार आज भी सामाजिक सुरक्षा का सबसे बड़ा आधार है। समाज में संवाद की परंपरा है। असहमति के लिए स्थान है। लोकतांत्रिक संस्थाओं के माध्यम से अपनी बात रखने की स्वतंत्रता भी है। यही विशेषताएं भारत को एक अलग विकास मॉडल प्रदान करती हैं। धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से देखें तो भारत और चीन के बीच का अंतर और भी स्पष्ट दिखाई देता है।
चीन में धार्मिक गतिविधियों और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों पर राज्य का गहरा नियंत्रण है। तिब्बत की बौद्ध परंपरा हो या शिंजियांग क्षेत्र में उइघुर मुसलमानों से जुड़े मुद्दे, इन विषयों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार चर्चा होती रही है। वहां धार्मिक संस्थाएं भी राज्य की निर्धारित सीमाओं के भीतर ही काम कर सकती हैं।
वसुधैव कुटुंबकम् और सर्वधर्म समभाव वाला भारत
भारत की तस्वीर इससे बिल्कुल अलग है। यह विविधताओं का देश है, जहां अलग-अलग धर्म, भाषाएं, परंपराएं और जीवन पद्धतियां सदियों से साथ-साथ विकसित हुई हैं। वसुधैव कुटुंबकम् और सर्वधर्म समभाव जैसे विचार केवल हमारे ग्रंथों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि हमारे सामाजिक जीवन का हिस्सा भी हैं।
यहां हर कुछ किलोमीटर पर भाषा बदल जाती है। खान-पान बदल जाता है। लोक परंपराएं बदल जाती हैं, लेकिन यही विविधता भारत की सबसे बड़ी सांस्कृतिक शक्ति बन जाती है। भारत का लोकतंत्र भी केवल चुनाव तक सीमित व्यवस्था नहीं है।
इंद्रा नूई की टिप्पणी का सार भी शायद यही है कि भारत को अपनी ताकत पहचाननी चाहिए। किसी दूसरे देश का मॉडल आंख बंद करके अपनाने की आवश्यकता नहीं है। हर देश की अपनी ऐतिहासिक परिस्थितियां, सामाजिक संरचना और राजनीतिक व्यवस्था होती है। जो मॉडल चीन के लिए उपयुक्त रहा, जरूरी नहीं कि वही भारत के लिए भी उपयुक्त हो।
आज जब भारत 'विकसित भारत' के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है, तब हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल तेज आर्थिक विकास हासिल करना नहीं है। चुनौती यह भी है कि विकास ऐसा हो, जिसमें नागरिक सम्मान सुरक्षित रहे, पर्यावरण संरक्षित रहे, न्याय व्यवस्था मजबूत रहे और समाज की विविधता भी बनी रहे।
दरअसल, किसी भी राष्ट्र की सफलता केवल उसकी जीडीपी से नहीं मापी जा सकती। उसके नागरिक कितने स्वतंत्र हैं, न्याय तक उनकी पहुंच कितनी आसान है, उनकी सांस्कृतिक पहचान कितनी सुरक्षित है और उन्हें अपनी बात कहने की कितनी आजादी है, ये भी उतने ही महत्वपूर्ण पैमाने हैं। भारत की सबसे बड़ी पूंजी उसकी लोकतांत्रिक चेतना है।
यहां विकास का अर्थ केवल आर्थिक प्रगति नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, संवैधानिक मूल्यों और मानवीय गरिमा के साथ आगे बढ़ना है। यही वह रास्ता है, जो भारत को दुनिया के सामने एक अलग पहचान देता है।
निस्संदेह, भारत के सामने अनेक चुनौतियां हैं, लेकिन इनका समाधान लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करके नहीं, बल्कि उन्हें और अधिक सक्षम, पारदर्शी और उत्तरदायी बनाकर ही निकलेगा। 'विकसित भारत' का सपना तभी सार्थक होगा, जब ऊंची इमारतों के साथ मजबूत संस्थाएं भी खड़ी हों। तेज रफ्तार अर्थव्यवस्था के साथ नागरिकों का भरोसा भी बढ़े। आधुनिक तकनीक के साथ मानवीय संवेदनाएं भी जीवित रहें। आर्थिक समृद्धि के साथ सांस्कृतिक आत्मविश्वास भी निरंतर सशक्त होता रहे।
-------------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।