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आसपड़ोस की गॉसिप और वो शॉर्ट कपड़े पहनकर देर रात तक घूमने वाली बेशर्म लड़कियां..!

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आखिर कब बदलेगी समाज की लड़कियों को लेकर सोच? - फोटो : Social media
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कल शाम सड़क किनारे अपनी दोस्त के साथ टहलते हुए मेरी नज़र एक खूबसूरत लड़की पर गई जिसने शाॅर्ट्स और क्रॉप टॉप (वही टीशर्ट जिसमें आधा पेट दिखता है) पहनी थी। यकीनन वह बहुत स्मार्ट लग रही थी, लेकिन मैंने देखा कि उस लड़की को देखकर कुछ आंटी टाइप महिलाएं आपस में फुसफुसा रहीं थीं, ज़्यादा कुछ सुनाई तो नहीं दिया, लेकिन हां- ''बड़ी बेशर्म हैं आजकल की लड़कियां'', ये बात ज़रूर मेरे कानों में पड़ी।

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लड़कियों को लेकर कही जाने वाली यह अमर बात सुनकर एक आश्चर्य हुआ कि जो लड़की मॉर्डन, छोटे, स्टाइलिश या कह लें कि थोड़े बदन दिखाऊ कपड़े पहन लें तो वह पुरुषों ही नहीं, बल्कि महिलाओं की नज़र में भी बेशर्म हैं।

खैर, ये तो हुआ सबसे कॉमन पॉइंट। ऐसी कई सारी बातें हैं जहां लड़कियां केवल पुरुषों के द्वारा ही नहीं बल्कि महिलाओं द्वारा भी बेशर्म और चरित्रहीन घोषित कर जाती है। इसमें सबसे अहम है लड़कों से दोस्ती।
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दरअसल, लिव इन के इस दौर में भी मीडिल क्लास फैमिली की कोई लड़की यदि ज़्यादा लड़कों से दोस्ती कर ले, उनके साथ घूमने-फिरने, मूवी देखने जाए तो परिवार से ज़्यादा पड़ोसियों के पेट में दर्द होने लगता है और अगल-बगल की आंटियां तुरंत कानाफूसी शुरू कर देती हैं- ‘अरे जानती हो फलां की लड़की कितनी बेशर्म है दिनभर लड़कों के साथ आवारागर्दी करती रहती है, दोस्ती करने के लिए क्या उसे लड़कियां नहीं मिली थीं।

’मतलब लड़के अगर 10 लड़कियों के साथ घूम रहे हैं तो उसमें कोई बुराई नहीं है, लेकिन यदि किसी लड़की ने लड़कों से दोस्ती कर ली तो ये बात समाज को हज़म नहीं होती। यदि कोई महिला शादी के बाद किसी लड़के से दोस्ती रखती है तो झट लोग दोनों के अफेयर की चर्चा शुरू कर देते हैं और महिला को बेशर्मी का तमगा मिल जाता है।

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लड़कियों को सामान्य नजरों से देखना कब शुरू करेगा समाज? - फोटो : फाइल फोटो
यही नहीं सिगरेट, शराब पीना तो आजकल का फैशन बना हुआ है। जाहिर है यहां यह कहने का मतलब नहीं है कि ये अच्छी चीज़ है और इसे पीना चाहिए, लेकिन जब आप शराब पीने वाले लड़कों को बेशर्म नहीं कहते तो भला लड़कियों को क्यों कह रहे हैं? यदि लड़कों की तरह ही कोई लड़की अपनी लिमिट में रहकर पार्टी ये दोस्तों के साथ पी रही है तो झट से उसे बेशर्म होने का तमगा क्यों दे दिया जाता है? ऐसे कई सारे क्यों हैं जिन पर सवाल पूछना शुरू करें तो लड़कियों की दुनिया में सवाल ही रह जाएंगे और वे खुद ही एक सवाल बनकर रह जाएंगी। 

मसलन

क्यों लड़कियों को बाहर जाना आज भी एक कस्बे में एक सामान्य नहीं बल्कि विशेष घटना मानी जाती है? लड़कियों का कपड़े पहनना, बातें करना, उनका नाचना-गाना और यहां तक की खड़े रहना भी संदेह के कई कोणों से क्यों देखा जाता है? ट्रांस्पेरेंट टॉप से बाहर झांकती लाल रंग के ब्रा की पट्टी या छोटी टीशर्ट पहनकर हाथ ऊपर करने पर टमी दिख जाए तो लड़कियां बेशर्म हो जाती हैं, लेकिन कमर से नीची जींस पहनकर जिसमें लड़कों के अंडरवियर का ब्रांड भी दिख जाए तो वह लड़के संस्कारी ही बने रहते हैं, क्यों भई? देर रात से आने वाले लड़के मर्दानगी का प्रतीक है जबकि लड़की देर रात से घर लौटे तो उसका चरित्र क्यों संदेह के घेरे में आ जाता है?

बहरहाल, सोशल मीडिया और फिल्मों ने लड़कियों को लेकर बहुत हद तक समाज की प्रगतिशील सोच को बढ़ावा दिया है, लेकिन आज भी लड़कियों को उनके स्वाभाविक जीवन को हासिल करने के लिए लंबी लड़ाई दिखाई देती है। हमारी सोसायटी में लड़कियों को लेकर आज भी एक अलग तरह की मानसिकता क्यों काम करती है? परंपरा और संस्कृति की सारी बंदिशें आज भी लड़कियों पर भार की तरह है? भले ही लड़कियां हर मामले में लड़कों से अव्वल और हवाई जहाज उड़ाकर आसमान नाप रहीं हैं।

क्यों के साथ ऐसे कई सारे सवाल हैं जो आज भी लड़कियों के पूरे जीवन पर बंदिशों का ताला लगाकर आज भी उनके अस्तित्व को ही चुनौती दे रहे हैं। आखिर लड़कियों और लड़कों के बीच में अंतर का ये आधार हमारे समाज के कौन से विकास और प्रगतिशीलता की कहानी कह रहा है? आखिर समाज क्यों नहीं समझ पा रहा कि लड़कियां उतनी ही सक्षम हैं जितने लड़के। एक मनुष्य के रूप में लड़कियों की उतनी ही इच्छाएं हैं जितनी की लड़कों की।

लड़कियों को लेकर ये गॉसिप कब बंद होगी? आखिर लड़कियां कब बेशर्म नहीं कही जाएंगी? 
 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.
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