उम्मीद करता हूं कि आई.आई.टी. कानपुर में गठित जांच कमेटी किसी धार्मिक द्रष्टिकोण से बालातर, शायरी के फ़न के इन बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए अपना फ़ैसला सुनाएगी।
‘मधुशाला’ की मशहूर पंक्तियाँ हैं:
“बैर बढ़ाते मस्जिद-मन्दिर, मेल कराती मधुशाला”
बच्चन जी की इन पंक्तियों को क्या आप किसी विशेष धर्म विरोधी शायरी कहेंगे ?
“कंकर-पत्थर जोरि के मस्जिद लई बनाय,
ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, का बहरा भया खुदाय”
इस दोहे के कहने के बाद क्या किसी ने कबीर के विरुद्ध कोई फ़तवा जारी किया? जाहिर है कि शायर का इशारा पाखण्ड और आडम्बर की ओर है और लोगों ने इसी रूप में इसे समझा और सराहा भी I एक बात का ख़याल और रखें, जब हम किसी भी रचना को समझने की कोशिश करें तो उसे उस शायर की जिंदगी और उसके विचारों की रौशनी में भी ज़रूर देखें। जहां तक ‘फ़ैज़’ का ताल्लुक है, वह एक कम्युनिस्ट विचारों वाले लगभग नास्तिक शायर थे। इसलिए ‘फ़ैज़’ जैसे बड़े शायर की शायरी को किसी भी धार्मिक नज़रिये से देखना ग़लत होगा।
कुछ और उदाहरणों की मदद से मैं अपनी बात ख़त्म करने की कोशिश करता हूं I 90 के दशक में मशहूर शायर सुहैल अहमद ज़ैदी ने किसी एक पत्रिका के लिए साक्षात्कार के दौरान मुझे अपना एक बहुत ही उम्दा शेर सुनाया था, जो मुझे आज भी स्मरण है:
“सुहैल शाम ढल गयी, दुकान अपनी बढ़ गयी,
ज़रा सी रोशनी है और, हिसाब देखता हूं मैं”
इस शेर में चार मुख्य शब्द हैं ‘शाम, दुकान , रोशनी और हिसाब‘ और यह चारों शब्द अपने असल अर्थों में यहां इस्तेमाल नहीं हुए हैं। शाम ‘उम्र’ के अर्थ में, ‘दुकान’ से तात्पर्य किसी पर्चून की दुकान नहीं है बल्कि ज़िन्दगी ख़त्म होने के समय से है। ‘ज़रा सी रोशनी’ का मतलब है, अब शायर बहुत कमज़ोर हो चुका है और ‘हिसाब’ से ये मुराद नहीं कि वह दुकान का बही खाता देख रहा है, बल्कि वह अपने जीवन के आख़री पलों में सोच रहा है कि उसने सारी ज़िन्दगी किस तरह के काम किए -अच्छे और बुरे।
मशहूर शायर ‘मोमिन’ का शेर है:
“शब जो मस्जिद में जा फंसे मोमिन,
रात काटी ख़ुदा -ख़ुदा कर के “
यहां, अगर हम इन शब्दों के शाब्दिक अर्थ लें तो धार्मिक नज़रिये से यह बहुत ही आपत्तिजनक शेर हैI पर आज भी ‘मोमिन’ हर दिल अज़ीज़ शायर हैं I यहां ख़ुदा –ख़ुदा’ से उनका तात्पर्य यह नहीं है कि सारी रात उसने पूजा-अर्चना में गुज़ारी, बल्कि ‘ख़ुदा -ख़ुदा करके’ का अर्थ यह है कि रात बड़ी मुश्किल से कटी।
‘मीर’ का एक बड़ा मशहूर शेर है:
“इश्क़, एक मीर भारी पत्थर है
कब ये तुझ नातवान से उठता है”
स्पष्ट है कि शायर इस शेर के माध्यम से कुछ और कहना चाह रहा है। इसलिए हमें यह समझना होगा कि शायरी में अधिकतर अल्फाज़ अपने शाब्दिक अर्थों में इस्तेमाल नहीं होते और अगर ऐसा होता है तो वह शायरी नहीं बल्कि ‘स्टेटमेंट ऑफ़ फैक्ट्स है’, कमाल की शायरी नहीं। उम्मीद करता हूं कि आई.आई.टी. कानपुर में गठित जांच कमेटी किसी धार्मिक द्रष्टिकोण से बालातर, शायरी के फ़न के इन बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए अपना फ़ैसला सुनाएगी।
(लेखक रियाज़ ख़ान हैदराबाद स्थित एक आई.टी व इंजीनियरिंग सर्विसेज कम्पनी में निदेशक हैं )
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