कानून व्यवस्था सख्त करने की जरूरत
- फोटो : एएनआई (फाइल)
आप किसी भी चीज को हाथ लगाएं उसमें स्तरहीनता, मिलावट ही मिलेगी। निःसंदेह यह दलील बेतुकी है कि विभाग के इंस्पेक्टर प्रत्येक मामले की असलियत नही जानते। छत्तीसगढ़ की घटना में जंग लगे उपकरण, मिलावटी/ विषैली दवाएं, गंदा सवंमित वातावरण, इन सबने भूमिका निभाई।
जरूरी था कि एक माह के भीतर विश्वसनीय , उच्चस्तरीय जांच पूरी कर ली जाती, 10 या 15 दोषियों को पहचान लिया जाता और 15 साल के लिए जेल भेज दिया जाता (संभवतः हत्या में सहायता देने अन्य किसी कानून के तहत)। उन्हें दुनिया को दिखा देना चाहिए कि वे प्राशासनिक सड़न को दूर करना चाहते हैं।
मुझे स्मरण होता है की आजाद हिंद-फौज के नायक क्रांतिकारी ‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस’ ने यह कहा था कि हमें आजादी मिलने के बाद भी सख्त अनुशासन और कठोर दण्ड की आवश्यकता होगी। इसी वैचारिक भावना के साथ हमारे यशस्वी ‘प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र भाई मोदी’ ने लाल किले से प्राचीर से कहा था कि अब सख्त शासन, गंभीर प्रवृति के अपराधियों के प्रति सजा के डर से पैदा होगी।
सामूहिक भीड़ (Moblitching) द्वारा हमले की नई साजिश यदि राजनैतिक अथवा किसी एक पार्टी से समयित हो तो निश्चित तौर पर यह गंभीर और राष्ट्र की आंतरिक सुरक्षाओं के लिए अत्यंत चुनौतीपूर्ण होने से है। यशस्वी प्रधानमंत्री ने अपनी तीसरी पारी (कार्यकाल) में संशोधित दण्ड-संहिता (BNS) का भारतीय न्याय-संहिता में (Moblitching) द्वारा मृत्यु पारित करने के अपराध को जघन्य ठहराते हुए धारा 103(2) में आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान तय करते हुए अजमानतीय घोषित किया गया है। इसी प्रकार राजद्रोहात्मक एवं देश के विरुद्ध विद्रोह के मामलों को धारा 152 के तहत गंभीर अपराध एवं सनसनी खेज ठहराते हुए आजीवन कारावास के दण्ड का निर्धारण (BNS) नवीन भारतीय संहीता मे किया गया है। निश्चित वंदनीय पहल है।
आए दिन समाज में मासूम बच्चियों के साथ होने वाले दुष्कर्म एवं बेजुबान बच्चियों की हत्या के अपराधी पॉक्सों एक्ट की धारा 3/4 सहित 5 (L&G) सहपठित धारा 376 (A&B) IPC के अंतर्गत निरंतर प्रदत्त फांसी की सजाओं से मध्यप्रदेश देशभर में टॉप पर अवश्य है। फिर भी इस प्रकृति के अपराध थमने का नाम क्यों नहीं लेते? क्योंकि अबतक कई वर्षो से उपेक्षित सजा के लिए Enforcement Agency अर्थात अभियोजन विभाग की स्थिति अत्यंत दयनीय है। नियमित कॉडर के अभियोजकों की संख्या मे कमी तथा उनकी तैयारी दौनो समान है।
राजनैतिक पदस्थापनाएं /स्थानांतरण उन पर प्रभावी है तथा इसके साथ ही अपराधीयों के छुटे जाने पर जवाबदेही का निर्धारण ही नहीं किया जाता जबकि इस संबंध मे हाल ही में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपने निर्धारण में अपराधिक न्याय प्रणाली में गंभीर मामलों में अपराधियों के छूटे जाने के कारणों में अभियोजकों की त्रुटियों एवं उनपर दायित्वों के निर्वहन की जवाबदेही तय किए जाने हेतु शासन को भी लेख किया गया है, लेकिन नतीजा सिफर-सिफर ।
हाल ही में भारत पाक युद्ध के रणनीतिकार देश के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने सुन्दरकांड की पक्ति दोहराते हुए लोकाचार में यह स्पष्ठ कहा कि हमने यह ‘सिंदूर’ ऑपरेशन हनुमान जी महाराज द्वारा लंका में कहे शब्द के अनुसार किया “जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे” अर्थात उक्त चौपाई का भावार्थ यह है कि जिन्होंने मुझे मारा है, उन्हें ही मैने मारा है।
यह राणनीति का धर्म शास्त्र से प्रमाण विधि स्तुतियोग्य है। ईरान और इज़रायल के मध्य बारह दिवस के युद्ध उपरांत मध्यस्थता करने वाले बिग-बॉस डोनाल्ड ट्रम्प ने भी यही दोहराया कि शक्ति से ही शांति स्थापित की जा सकती है । अंतत: आज अंतर्मन के भाव कुछ इस प्रकार है ।
आज हमने उगते सूरज में डूबता आतंकवाद देखा।
ऑपरेशन ‘सिंदूर’ से खौफजदा पाकिस्तान देखा ।
‘सिंदूर’ की रक्षा करता सेना का जवान देखा।
और अब सेना को भारत के शोर्य और पराक्रम
के साथ बदला लेते समूचे विश्व ने देखा।
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