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कानून व्यवस्था: सख्त सजा के भय से ही संभव होगा “सुशासन”

सार

ईरान और इज़रायल के मध्य बारह दिवस के युद्ध उपरांत मध्यस्थता करने वाले बिग-बॉस डोनाल्ड ट्रम्प ने भी यही दोहराया कि शक्ति से ही शांति स्थापित की जा सकती है । 
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सख्त सजा का प्रावधान जरूरी (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : Freepik
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विस्तार
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हाल ही में 27 अप्रैल को संपन्न हुई मेरी पहली अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस (IAP) नीदरलैंड में आयोजित वेबिनार में मानद सदस्य के रूप में सम्मिलित होने के दौरान एक विदेशी सदस्य जिसने अपनी सेवा क्रॉउन प्रोसिक्युटर के रूप में यू.के. में भी दी, उसने अपनी बात-चीत के दौरान यह प्रकट किया कि  यूरोप के एक छोटे से शहर में जब मैं यात्रा कर रहा था तब उसने यह पाया कि आमतौर पर आपको ट्रेन या बस में आपके टिकट की जांच करने वाला टिकट इंस्पेक्टर दिखाई नहीं देता। आप ऐसी कई यात्राएं कर सकते हैं, जिसमें आपके टिकट की जांच ही न हो।

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किंतु काफी समय बाद अचानक न जाने कहां से तीन-चार इंस्पेक्टर प्रकट होंगे। सारे दरवाजो पर खड़े हो जाएंगे और तेजी से टिकटों की जांच कर लेंगे। जिसके पास टिकट नहीं होगा, उसे तत्काल वास्तविक कीमत का 150 गुना दाम चुकाना होता है। कोई बहाना नहीं चलता है। जुर्माना नहीं भरा तो आपको हिरासत में लिया जाएगा। 

हर यात्रा में ऐसी जांच होने की संभावना 30 में से एक बार होती है जबकि जुर्माना एक बार में 150 गुना होता है। यह सिद्धांत अमेरिका के राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने 1980 के दशक में निकाला था। सिद्धांत यह की मैं आप पर भरोसा करूंगा पर कभी- कभार परख भी लूंगा। यदि आप कसौटी पर खरे नहीं उतरे तो आपके सामने कानून की किताब रख दूंगा।
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“न्यूनतम सरकार-अधिकतम शासन”

हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री ने पहली शपथ के बाद “न्यूनतम सरकार-अधिकतम शासन” का वादा किया था। इसका सिर्फ इतना अर्थ है कि हर लेन- देन का सत्यापन नहीं किया जाएगा। हालांकि, यदि पकड़े गए तो सजा एक मिसाल होगी । 

ऐसी की वह नियम कायदे-तोड़ने के प्रति खौफ पैदा करेगी, इसे भारत में लागू करना चाहिए। यदि कोई फैक्ट्री मालिक मंजूरी के वक्त मानक रखे गए पर्यावरण नियमों का उल्लंघन करता है तो उसकी मंजूरी रद्द कर फैक्ट्री को सरसरी तौर पर बंद किया जा सकता है।

इसी प्रकार RTO, Pollution (नगरीय एवं शहरी विकास) -TNC जैसे मलाईदार विभाग पर नकेल कसने के लिए यह फार्मूला काम में लाया जा सकता है। कुछ वर्ष पूर्व, 68 वर्षीय फैरी कमांडर की कोरिया में नौका पलट गई, जिसमें कई यात्री मारे गए। उसे 36 साल कैद की सजा सुनाई गई। हत्या के आरोप में नहीं बल्कि लापरवाही बरतने के आरोप में। अब हर बस, टैक्सी, ट्रेन ड्राईवर या बोट कैप्टन,  विमान पायलट और कई अन्य इसे याद रखेंगे कि ’लापरवाही’ 36 साल के लिए जेल में पटक सकती है।  

अवंतिका तीर्थ नगरी उज्जैन में जहरीली शराब कांड में 18 व्यक्तियों की मौत हो गई, इस संबध में तत्कालिन SP ट्रांसफर किए गए, TI सस्पेंड/लाईन अटैच के साथ ही बीट के संलिप्त सिपाही आरोपी बनाए गए। प्रशासन के खिलाफ आंदोलन चला, बडे जोर-शोर से किसी न किसी के त्याग-पत्र  की मांग उठाई जाने लगी। लेकिन क्या यह समाधान है?

वास्तविकता यह है कि सार्वजनिक क्षेत्र की हर ठेका प्रणाली भीतर तक सड़ चुकी है। यहां तक कि मिलावटी दवाओं का बोलबाला है। दुकानों में कम तोला जाता है। हर खाद्य पदार्थ में मिलावट है- कुछ में तो खतरनाक चींजें डाली जाती हैं।

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कानून व्यवस्था सख्त करने की जरूरत - फोटो : एएनआई (फाइल)
आप किसी भी चीज को हाथ लगाएं उसमें स्तरहीनता, मिलावट ही मिलेगी। निःसंदेह यह दलील बेतुकी है कि विभाग के इंस्पेक्टर प्रत्येक मामले की असलियत नही जानते। छत्तीसगढ़ की घटना में जंग लगे उपकरण, मिलावटी/ विषैली दवाएं, गंदा सवंमित वातावरण, इन सबने भूमिका निभाई।

जरूरी था कि एक माह के भीतर विश्वसनीय , उच्चस्तरीय जांच पूरी कर ली जाती, 10 या 15 दोषियों को पहचान लिया जाता और 15 साल के लिए जेल भेज दिया जाता (संभवतः हत्या में सहायता देने अन्य किसी कानून के तहत)। उन्हें दुनिया को दिखा देना चाहिए कि वे प्राशासनिक सड़न को दूर करना चाहते हैं। 

मुझे स्मरण होता है की आजाद हिंद-फौज के नायक क्रांतिकारी ‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस’ ने यह कहा था कि हमें आजादी मिलने के बाद भी सख्त अनुशासन और कठोर दण्ड की आवश्यकता होगी। इसी वैचारिक भावना के साथ हमारे यशस्वी ‘प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र भाई मोदी’ ने लाल किले से प्राचीर से कहा था कि अब सख्त शासन, गंभीर प्रवृति के अपराधियों के प्रति सजा के डर से पैदा होगी।

सामूहिक भीड़ (Moblitching) द्वारा हमले की नई साजिश यदि राजनैतिक अथवा किसी एक पार्टी से समयित हो तो निश्चित तौर पर यह गंभीर और राष्ट्र की आंतरिक सुरक्षाओं के लिए अत्यंत चुनौतीपूर्ण होने से है। यशस्वी प्रधानमंत्री ने अपनी तीसरी पारी (कार्यकाल) में संशोधित दण्ड-संहिता (BNS) का भारतीय न्याय-संहिता में (Moblitching) द्वारा मृत्यु पारित करने के अपराध को जघन्य ठहराते हुए धारा 103(2) में आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान तय करते हुए अजमानतीय घोषित किया गया है। इसी प्रकार राजद्रोहात्मक एवं देश के विरुद्ध विद्रोह के मामलों को धारा 152 के तहत गंभीर अपराध एवं सनसनी खेज ठहराते हुए आजीवन कारावास के दण्ड का निर्धारण (BNS) नवीन भारतीय संहीता  मे किया गया है। निश्चित वंदनीय पहल है।

आए दिन समाज में मासूम बच्चियों के साथ होने वाले दुष्कर्म एवं बेजुबान बच्चियों की हत्या के अपराधी पॉक्सों एक्ट की धारा 3/4 सहित 5 (L&G) सहपठित धारा 376 (A&B) IPC के अंतर्गत निरंतर प्रदत्त फांसी की सजाओं से मध्यप्रदेश देशभर में टॉप पर अवश्य है। फिर भी इस प्रकृति के अपराध थमने का नाम क्यों नहीं लेते? क्योंकि अबतक कई वर्षो से उपेक्षित सजा के लिए Enforcement Agency अर्थात अभियोजन विभाग की स्थिति अत्यंत दयनीय है। नियमित कॉडर के अभियोजकों की संख्या मे कमी तथा उनकी तैयारी दौनो समान है।

राजनैतिक पदस्थापनाएं /स्थानांतरण उन पर प्रभावी है तथा इसके साथ ही अपराधीयों के छुटे जाने पर जवाबदेही का निर्धारण ही नहीं किया जाता जबकि इस संबंध मे हाल ही में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपने निर्धारण में अपराधिक न्याय प्रणाली में गंभीर मामलों में अपराधियों के छूटे जाने के कारणों में अभियोजकों की त्रुटियों एवं उनपर दायित्वों के निर्वहन की जवाबदेही तय किए जाने हेतु शासन को भी लेख किया गया है, लेकिन नतीजा सिफर-सिफर । 

हाल ही में भारत पाक युद्ध के रणनीतिकार देश के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने सुन्दरकांड की पक्ति दोहराते हुए लोकाचार में यह स्पष्ठ कहा कि हमने यह ‘सिंदूर’ ऑपरेशन हनुमान जी महाराज द्वारा लंका में कहे शब्द के अनुसार किया “जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे” अर्थात उक्त चौपाई का भावार्थ यह है कि जिन्होंने मुझे मारा है, उन्हें ही मैने मारा है।

यह राणनीति का धर्म शास्त्र से प्रमाण विधि स्तुतियोग्य है। ईरान और इज़रायल के मध्य बारह दिवस के युद्ध उपरांत मध्यस्थता करने वाले बिग-बॉस डोनाल्ड ट्रम्प ने भी यही दोहराया कि शक्ति से ही शांति स्थापित की जा सकती है । अंतत: आज अंतर्मन के भाव कुछ इस प्रकार है ।
 
आज हमने उगते सूरज में डूबता आतंकवाद देखा।
ऑपरेशन ‘सिंदूर’ से खौफजदा पाकिस्तान देखा । 
‘सिंदूर’ की रक्षा करता सेना का जवान देखा।
और अब सेना को भारत के शोर्य और पराक्रम 
के साथ बदला लेते समूचे विश्व ने देखा।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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