फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

भारतीय सिनेमा: जी हां, लोकल ही है ग्लोबल, इसके मूल में ही भविष्य है!

सार

सिनेमा को अक्सर समाज का प्रतिबिंब कहा जाता है। फिल्म निर्माता समय-समय पर ऐसी कहानियां गढ़ने की कोशिश करते हैं, जो समाज के सूक्ष्म और व्यापक पहलुओं को दर्शाती हों। जिस तरह का सिनेमा काम करता है, वह अक्सर बड़े सामाजिक दृष्टिकोण से जुड़ता है। जैसे 1970 के दशक का 'एंग्री यंग मैन' युग, जिसमें बड़े पर्दे का नायक समाजिक बुराइयों से लड़ता था।
विज्ञापन
भारतीय सिनेमा अपने खुद के साहित्यिक खजाने का उपयोग क्यों नहीं कर रहा है? - फोटो : Adobe Stock
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

कोविड युग और ओटीटी प्लेटफार्मों के उदय ने दर्शकों की पसंद को काफी हद तक बदल दिया है। इससे बॉक्स ऑफिस की बिक्री में गिरावट आई है। पहले की कहानियां और कथानक, जिन्हें कभी सफलता की गारंटी माना जाता था, अब उतने दर्शक नहीं खींच पा रहे हैं। यहां तक कि तथाकथित 'स्टार्स'  के सिनेमा भी अब कड़ी परीक्षा के दायरे में आ गए हैं। अब न तो प्रसिद्धि और न ही स्टारडम, सिनेमाघरों में दर्शकों को खींचने में सक्षम हो रहे हैं। आखिर, इसकी वजह क्या है?

विज्ञापन


सिनेमा को अक्सर समाज का प्रतिबिंब कहा जाता है। फिल्म निर्माता समय-समय पर ऐसी कहानियां गढ़ने की कोशिश करते हैं, जो समाज के सूक्ष्म और व्यापक पहलुओं को दर्शाती हों। जिस तरह का सिनेमा काम करता है, वह अक्सर बड़े सामाजिक दृष्टिकोण से जुड़ता है। जैसे 1970 के दशक का 'एंग्री यंग मैन' युग, जिसमें बड़े पर्दे का नायक समाजिक बुराइयों से लड़ता था। यह उस समय की समाज की आकांक्षाओं को दर्शाता था, जो अत्यधिक गरीबी और राष्ट्रीय आपातकाल जैसी घटनाओं से प्रभावित थी।

बाद के दशकों में भी इसी तरह के सिनेमा को दर्शकों से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली। लेकिन वर्तमान में सफल सिनेमा के रुझान क्या हैं? कोविड के बाद सफल सिनेमा का पैटर्न कैसे बदला है? हम, एक समाज के रूप में, अभी भी कोविड के बाद अपनी जिंदगी को सामान्य बनाने की कोशिश कर रहे हैं। हमारी सिनेमा पसंद भी बदल रही है। कोविड के बाद के युग में भारतीय सिनेमा उद्योग का परिदृश्य, जो विभिन्न भाषाओं और राज्यों में फैला हुआ है, एक बदलाव के दौर से गुजर रहा है।
विज्ञापन


‘स्टीरियोटाइप्ड कहानियों पर बना सिनेमा बॉक्स ऑफिस पर विफल हो रहा हैं। यह एक गंभीर चर्चा का विषय है। यह चर्चा हमसे दो प्रमुख सवालों के जवाब मांगती है। पहला, भारतीय सिनेमा में सफलता का नया रुझान क्या है? और दूसरा, सिनेमा प्रेमियों की पसंद में यह बदलाव क्या कर रहा है, जिससे बॉक्स ऑफिस पर खराब परिणाम आ रहे हैं? पहला सवाल बहुत पेचीदा है और इसमें कोविड के बाद की सफलता के रुझानों का विश्लेषण करना शामिल है।

कोविड के बाद के परिवर्तन ने सिनेमा निर्माताओं को फिर से सोचने और सिनेमा कैसे बनाया जाए, इसकी रणनीति को फिर से संरेखित करने के लिए मजबूर कर दिया है। नई रणनीति का एक मुख्य हिस्सा है जड़ों से जुड़ी कहानियां। सिनेमा जो प्राचीन भारत या छोटे शहरों की कहानियों, टियर 2 प्लॉट्स, ग्रामीण परिदृश्यों, लोककथाओं आदि को बताता है।

हाल के वर्षों की सफलताएं इस बात की पुष्टि करती हैं कि इस फॉर्मूले ने सिनेमा निर्माताओं को बड़े पैमाने पर सफलता प्रदान की है। आइए इस प्रवृत्ति को और विस्तार से समझते हैं। पिछले तीन वर्षों में, यदि ईमानदारी से विश्लेषण किया जाए, तो हमें एहसास होता है कि अधिकांश सफल सिनेमा जिनमें प्रसिद्ध अभिनेता नहीं हैं, उनमें कुछ चीजें सामान्य होती हैं, जैसे दिलचस्प कंटेंट/अवधारणा पर आधारित फिल्म निर्माण, कंटेंट जो या तो बहुत स्थानीय, बहुत ग्रामीण या बहुत मध्यमवर्गीय होती है। इन सिनेमा का उद्देश्य बड़े पर्दे पर आम लोगों की भावनाओं को प्रस्तुत करना है।

आकर्षक ग्रामीण व सामान्य अनछुए परिदृश्य कहानी कहने में योगदान देता है। यह एक खुला रहस्य रहा है कि भारतीय सिनेमा, विशेष रूप से हिंदी सिनेमा, दशकों से वास्तविक लोगों की आकांक्षाओं को पकड़ने में विफल रहा है। बल्कि, इसने अक्सर गलत चित्रण किया और देश की ग़लत तस्वीर को चित्रांकन किया। यह सब कोविड के बाद के सिनेमाई युग में धराशायी हो गया। अब बेतरतीब ढंग से रची गई कहानियां काम नहीं कर रही हैं।

लोग ऐसी कंटेंट  को पसंद कर रहे हैं जो सांस्कृतिक और दृश्यात्मकता दोनों रूप से अधिक जड़ों से जुड़ी हो। इस प्रवृत्ति को 'आरआरआर', 'पोन्नियिन सेल्वन', 'ब्रह्मास्त्र पार्ट वन: शिवा', 'कांतारा', 'कश्मीर फाइल्स', 'पुष्पा', '12वीं फेल', 'द केरल स्टोरी' और 'अखंडा' जैसी सिनेमाओं की सफलता में देखा जा सकता है। लेकिन क्या यह कहना सही होगा कि जड़ों से जुड़ी कहानियां सफलता का नया मंत्र हैं?

अगर हम 2024 की कुछ सफल एवं समाज पर सकारात्मक छाप छोड़ने वाली सिनेमाओं का विश्लेषण करें, तो हमें 'कल्कि 2898-एडी', 'स्त्री-2', 'हनुमान', 'आर्टिकल 370', 'मुंज्या' और 'लापता लेडीज' जैसी फिल्में मिलती हैं। ये फिल्में या तो एक आम आदमी की कहानी कहती हैं, या छोटे शहरों की लोककथाओं पर आधारित हैं, या फिर हमारे समृद्ध इतिहास से प्रेरणा लेती हैं। लेकिन क्या हम इसमें कोई प्रवृत्ति देख सकते हैं? आइए और गहराई से जाकर इन कहानियों को समझें।

साल की सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली फिल्म 'कल्कि 2898-एडी'  महाभारत और विष्णु के अवतार कल्कि पर आधारित है। सिनेमाघरों में इस सिनेमा  को बहुत अच्छी प्रतिक्रिया मिली, खासकर महाभारत की घटनाओं को चित्रित करने वाले दृश्यों को सबसे ज़्यादा सराहा गया। हमारी सांस्कृतिक विरासत को भविष्य के गहनता से जोड़ने ने न सिर्फ भारत में बल्कि वैश्विक स्तर पर भी दर्शकों से जुड़ने में सफलता पाई। 
एक और फिल्म 'हनुमान' एक ग्रामीण लड़के द्वारा भगवान हनुमान की शक्तियों का पुनरुत्थान दिखाने वाली काल्पनिक कथा पर आधारित है। ग्रामीण परिदृश्य और बुराई पर अच्छाई की विजय की कहानी को दर्शकों ने बहुत पसंद किया। हमारी सांस्कृतिक कहानियों को कल्पना के साथ बुनने का यह विषय सिनेमा प्रेमियों को थिएटर तक खींच लाया।

इस साल की एक और सफल फिल्म 'स्त्री-2' है जो भारत के एक छोटे शहर की प्रेतात्मा की कहानी बताती है। सिनेमा  में स्थानीय लोककथा, जिसे 'चंदेरी पुराण' के रूप में जाना जाता है, को भी शामिल किया गया, जो कई छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में आम है। इससे सिनेमा  की विश्वसनीयता और बढ़ गई।

यदि हम इस विश्लेषण को और आगे बढ़ाएं, तो हमें 'वेदा' जैसी फिल्में भी देखनी चाहिए, जो अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाईं। हालांकि सिनेमा  में जाति का मुद्दा अब भी एक प्रमुख थीम है, लेकिन सिनेमा  में इसे इस तरह से दिखाया गया जो अब बड़े समाज का हिस्सा नहीं है और इसे एक सीमित दृष्टिकोण में देखा जा सकता है।

'लापता लेडीज' में दिखाए गए 'घूंघट' की प्रथा भी एक ऐसा ही मुद्दा है। लेकिन 'वेदा' और 'लापता लेडीज' के बीच अंतर सिनेमा  के कुल संदेश में है। इसलिए, सिनेमा  निर्माताओं को हमारी सांस्कृतिक रूप से जड़ों से जुड़ी कहानियों को दर्शाते समय सकारात्मक और समाधान-उन्मुख दृष्टिकोण पर ध्यान देना चाहिए। कुछ अपवादों को छोड़कर, सांस्कृतिक रूप से जड़ों से जुड़ी कहानियों ने अपेक्षाकृत रूप से अच्छा प्रदर्शन किया है।

हालांकि, क्या यह एक प्रवृत्ति है? और यह भी महत्वपूर्ण है कि क्या सिनेमा  निर्माताओं ने इस पैटर्न की पहचान की है? और क्या सिनेमा प्रेमियों की पसंद में यह नया बदलाव भारतीय सिनेमा को बदलने वाला है? यह अभी तक स्पष्ट नहीं है। एक पैटर्न देखा गया है कि हमारी संस्कृति और धरोहर की गहराई को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ी है।

कई लोग इसे भारत के लिए पुनर्जागरण का समय भी कह रहे हैं, जहां अपने देश की वास्तविकता को समझने और उसके साथ जीने की इच्छा बढ़ी है। लोग भारत के उन पहलुओं से जुड़े हैं जिनसे वे पहले अनजान थे। वे अब अपनी कहानियों से ज़्यादा जुड़ाव महसूस कर रहे हैं, बजाय एक सतही-सपाट दुनिया से जो वास्तविकता से कटी हुई हो।

क्या यही कारण है कि बहुत सी पक्षपाती कथाओं पर आधारित कहानियों को अब कोई स्वीकार नहीं कर रहा है? या फिर ऐसी घिसी-पिटी कहानियों को, जो हमारी संस्कृति से बहुत कम जुड़ी हुई हैं, दर्शकों द्वारा अस्वीकार किया जा रहा है? यह भी देखा गया है कि इस बदलाव का एक बड़ा हिस्सा छोटे और मझोले शहरों और यहां तक कि गांवों के लोगों द्वारा प्रेरित है, जो महानगरों में भी सिनेमा देखने वालों का एक बड़ा हिस्सा बनाते हैं।

इस दर्शक वर्ग ने नायक पूजा से आगे बढ़ते हुए सिनेमा को एक वैकल्पिक दृष्टिकोण से देखना शुरू कर दिया है। ऑनलाइन सामग्री से अवगत हो चुके युवा अब पुराने ढर्रे वाली सामग्री से थक चुके हैं और बड़े पर्दे पर अपनी खुद की प्रासंगिक कहानियाँ देखना चाहते हैं। क्या यही कारण है कि छोटे शहरों की भावनाओं से जुड़ी कहानियाँ अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं? जब हम इस बदलाव के कारण की खोज करते हैं, तो कई सवाल सामने आते हैं, जिनमें से हर सवाल पहले से ज़्यादा जटिल होता है। लेकिन आने वाला समय ही हमें इन कारणों को थोड़ा और समझने में मदद करेगा।

यह कहना सुरक्षित है कि कोविड के बाद के युग में, सिनेमा  उद्योग सफलता के नए फॉर्मूलों की पहचान करने की कोशिश कर रहा है। दर्शकों को सिनेमाघरों की ओर खींचने के लिए कई फिल्मों को फिर से रिलीज भी किया गया है। एक फॉर्मूला जो काम कर रहा है, वह है सांस्कृतिक रूप से जड़ों से जुड़ा हुआ सिनेमा। इसका एक स्पष्ट उदाहरण 'तुम्बाड' जैसी फिल्म का फिर से रिलीज़ होना और सिनेमाघरों मे पहली रिलीज से ज्यादा सफल होना है।

सवाल यह भी उठता है कि भारतीय सिनेमा अपने खुद के साहित्यिक खजाने का उपयोग क्यों नहीं कर रहा है? हमारी समृद्ध साहित्यिक परंपरा पर आधारित फिल्में क्यों नहीं बन रही हैं? क्यों मुंशी प्रेमचंद,  भीष्म साहनी,  जयशंकर प्रसाद,  धर्मवीर भारती,  श्री लाल शुक्ल जैसे हिंदी साहित्यकारों की कहानियां अब बड़े पर्दे पर नहीं लाई जा सकती हैं? हर भारतीय भाषा में ऐसे महान साहित्यकार हैं, लेकिन क्या सिनेमा  निर्माताओं ने उन्हें पढ़ा है, यह एक बड़ा सवाल है। हमारे लोककथाओं पर आधारित कहानियां अधिक बार क्यों नहीं बन रही हैं?

यह सवाल विशेष रूप से तब और महत्वपूर्ण हो जाता है जब हम 'कांतारा' और हाल ही में 'मुंज्या' जैसी सिनेमाओं की सफलता देखते हैं। क्या कारण है कि सिनेमा  उद्योग हमारे पुराणों, पंचतंत्र और उपनिषदों की कहानियों का अधिक अन्वेषण नहीं कर रहा है? हमारे पास इतनी विशाल कहानियों की धरोहर है, लेकिन इसे बड़े पर्दे पर लाने के लिए क्यों उपयोग नहीं किया जा रहा है? क्यों सिनेमा उद्योग अप्रासंगिक सामग्री या झूठे आख्यानों को बढ़ावा देने पर जोर दे रहा है?

जब हम तुलनात्मक विश्लेषण करते हैं, तो हमें 'गहराइयां' और 'बैड न्यूज' जैसी फिल्में असफल होते हुए दिखाई देती हैं। इसी तरह, 'कॉल मी बे'  जैसी वेब सीरीज  जो भारतीय वास्तविकता से पूरी तरह से असंबद्ध थी, को भी दर्शकों ने खारिज कर दिया। दूसरी तरफ हम देखते हैं कि 'मंजुम्मल बॉयज़', 'अवेशम', 'गरुडन' और 'भ्रमयुगम' जैसी फिल्में, जो अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी हुई हैं, बॉक्स ऑफिस पर बेहतरीन प्रदर्शन कर रही हैं।

इतनी स्पष्ट प्रवृत्ति देखने के बाद भी, कुछ सिनेमा  निर्माता अभी तक अपनी जड़ता को छोड़ने और अधिक सांस्कृतिक रूप से जड़ों से जुड़ी कहानियों को अपनाने के लिए तैयार क्यों नहीं हैं? कुछ सिनेमा  निर्माता हमें ऐसी सामग्री दिखाना चाहते हैं, जो माइक्रो-माइनॉरिटी के लिए ही प्रासंगिक है। माइक्रो-माइनॉरिटी की कहानियों और संस्कृति को अब बहुसंख्यक पर थोपा नहीं जा सकता। यह प्रवृत्ति बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों में भी परिलक्षित होती है।

जो सिनेमा  निर्माता अभी भी सतही कहानियाँ परोस रहे हैं या फॉल्स-नैरेटिव बुन रहे हैं, उन्हें जल्द ही एहसास हो जाना चाहिए कि अब ऐसी चीजें काम नहीं करेंगी, क्योंकि अब यह दर्शकों के साथ सही तालमेल नहीं बैठा पा रही हैं। जब सिनेमा निर्माताओं ने खुद ही हमेशा कहा है कि सिनेमा समाज का प्रतिबिंब है, तो वे आज के समाज को क्यों नहीं समझ पा रहे हैं? या ऐसा है कि वे जानबूझकर इसे नजरअंदाज कर रहे हैं, ताकि अपने एजेंडे को आगे बढ़ा सकें?

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें