माइक्रोआरएनए न केवल सी. एलिगेंस में बल्कि सभी जानवरों में पाया जाता है। अबतक एक हजार से ज्यादा माइक्रोआरएनए खोजे जा चुके हैं।
- फोटो : AdobeStock
खोज कैसे हुई
हमारे शरीर की हर कोशिका में लगभग 20,000 जीन होते हैं। ये जीन, प्रोटीन बनाने के लिए आवश्यक निर्देशों को एन्कोड करते हैं। प्रोटीन हमारे शरीर के लिए बिल्डिंग ब्लॉक्स की तरह होते हैं। लेकिन हर कोशिका के काम करने का तरीका अलग होता है। जैसे मांसपेशी कोशिका और तंत्रिका कोशिका अलग-अलग काम करती हैं। इसलिए हर कोशिका को अलग-अलग तरह के प्रोटीन की जरूरत होती है। इसका मतलब है कि हर कोशिका में कुछ खास जीन ही काम करते हैं। ये जीन, कोशिका के आसपास के वातावरण के अनुसार बदलते रहते हैं।
जब कोई जीन काम करना शुरू करता है, तो उस जीन से एक नया अणु बनता है जिसे मैसेंजर आरएनए कहते हैं। यह आरएनए प्रोटीन बनाने के लिए कोशिका के एक हिस्से में जाता है। बहुत समय तक वैज्ञानिकों का मानना था कि जीन की गतिविधि मुख्य रूप से डीएनए से जुड़ने वाले विशेष प्रोटीन द्वारा नियमित होती है, जिन्हें ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर कहा जाता है। लेकिन विक्टर एम्ब्रोस और गैरी रुवकुन ने एक नई खोज की। उन्होंने पाया कि माइक्रोआरएनए नाम के बहुत छोटे अणु भी इस काम में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
जब ये दोनों वैज्ञानिक 1993 में एक सीरिज में लगातार लैब में प्रयोग कर रहे थे, तो तब इन्होंने एक छोटे से कीड़े, सी. एलिगेंस में, एक विशेष प्रकार के मोलिक्युल की खोज की। इस मोलिक्युल को उन्होंने लिन-4 नाम दिया। बाद में यही मोलिक्युल माइक्रोआरएनए कहलाया। इसी तरह साल 2000 में वैज्ञानिकों ने एक और माइक्रोआरएनए, लेट-7 की खोज की। यह माइक्रोआरएनए न केवल सी. एलिगेंस में बल्कि सभी जानवरों में पाया जाता है। अबतक एक हजार से ज्यादा माइक्रोआरएनए खोजे जा चुके हैं।
कैंसर के इलाज के लिए जगी उम्मीद
इंपीरियल कालेज लंदन में मोलेक्युलर आंकोलाजी की लेक्चरर डॉ. क्लेयर फ्लेचर के अनुसार इस शोध ने कैंसर जैसी बीमारियों के इलाज के लिए विज्ञानियों के रास्ते खोल दिए हैं। माइक्रो आरएनए कोशिकाओं को नए प्रोटीन बनाने के लिए जेनेटिक निर्देश देता है। यह रोगों के उपचार के लिए दवाओं के विकास और बायोमार्कर के रूप में उपयोगी हो सकता है। त्वचा कैंसर के इलाज में माइक्रोआरएनए तकनीक किस तरह से मददगार हो सकती है, यह देखने के लिए क्लीनिकल परीक्षण चल रहे हैं।
हमारे गुणसूत्रों में मौजूद जानकारी हमारे शरीर की सभी कोशिकाओं के लिए निर्देश पुस्तिका की तरह है। हर कोशिका में एक जैसे गुणसूत्र होते हैं, इसलिए उन सभी के पास निर्देशों का एक ही सेट होता है। लेकिन मांसपेशी और तंत्रिका कोशिकाओं जैसी विभिन्न प्रकार की कोशिकाएं एक दूसरे से बहुत अलग होती हैं।
यह मनुष्यों सहित दूसरे जीवों के लिए बेहद मायने रखता है। आज, हम जानते हैं कि मानव शरीर में एक हजार से ज्यादा माइक्रो आरएनए होते हैं। ऐसे में उनकी खोज ने हमें जीवों के बढ़ने और काम करने के तरीके के बारे में एक नया पहलू समझने में मदद की है। 1901 के बाद से चिकित्सा के क्षेत्र में दिया जाने वाला यह 115वां नोबेल पुरस्कार है। 1901 से अब तक चिकित्सा के क्षेत्र में 229 लोगों को इस सम्मान से नवाजा जा चुका है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।