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मिशन चंद्रयान-3: चांद पर भारत, अंतरिक्ष में भारत की ऐतिहासिक सफलता

सार

2008 में भारत ने चंद्रयान-1 लॉन्च किया था। यह एक ऑर्बिटर अभियान था। ऑर्बिटर ने 10 महीने तक चांद का चक्कर लगाया था। चंद्रयान-2 अभियान 2019 में लांच किया गया जिसकी चन्द्रमा के सतह पर सफल लैंडिंग नहीं हो पाई थी लेकिन चंद्रयान -2 का आर्बिटर अभी तक काम कर रहा है। एक बार फिर चंद्रयान-3 के सफलतापूर्वक लांच होने के बाद भारत अंतरिक्ष में एक बड़ी शक्ति के तौर पर स्थापित हो गया है। 
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चंद्रयान-3 की सफल लॉन्चिंग - फोटो : Twitter
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विस्तार
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जिस देश में कभी साइकिल और बैलगाड़ी पर रखकर रॉकेट इधर से उधर ले जाए जाते थे, उसी देश ने आज चांद और आसमान पर कब्जा करना सीख लिया है। अंतरिक्ष की दुनिया में भारत ने एक बार फिर इतिहास रच दिया है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, इसरो ने अपने तीसरे चंद्र मिशन, चंद्रयान-3 को सफलतापूर्वक लॉन्च कर दिया है।

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चांद पर कदम रखने वाला ये हिंदुस्तान का तीसरा सबसे बड़ा मिशन है। इसे 642 टन वजनी, 43.5 मीटर ऊंचे एलवीएम3-एम4 रॉकेट से लॉन्च किया गया। यह देश का सबसे ताकतवर बाहुबली रॉकेट है जिसे फैट बाय राकेट के नाम से भी जानतें हैं। चंद्रयान-3 के पृथ्वी की कक्षा में पहुंचने के बाद लूनर ट्रांसफर ट्रेजेक्टरी में डाला गया। 615 करोड़ की लागत से तैयार हुआ यह मिशन करीब 45 से 48  दिन की यात्रा के बाद चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास लैंड करेगा।

अगर दक्षिणी ध्रुव पर लैंडर की सॉफ्ट लैंडिग होती है, तो भारत दक्षिणी ध्रुव पर पहुंचने वाला विश्व का पहला देश बन जाएगा। वास्तव में ये भारत के लिए एक ऐतिहासिक समय है। 
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2008 में भारत ने चंद्रयान-1 लॉन्च किया था। यह एक ऑर्बिटर अभियान था। ऑर्बिटर ने 10 महीने तक चांद का चक्कर लगाया था। चंद्रयान-2 अभियान 2019 में लांच किया गया था जिसकी चन्द्रमा के सतह पर सफल लैंडिंग नहीं हो पाई थी लेकिन चंद्रयान -2 का आर्बिटर अभी तक काम कर रहा है। एक बार फिर चंद्रयान-3 के सफलतापूर्वक लांच होने के बाद भारत अंतरिक्ष में एक बड़ी शक्ति के तौर पर स्थापित हो गया है। 


भारत के लिए जरूरी है ये मिशन

चांद हमें पृथ्वी के क्रमिक विकास और सौर मंडल के पर्यावरण की अविश्वसनीय जानकारियां दे सकता है। वैसे तो कुछ परिपक्व मॉडल मौजूद हैं, लेकिन चंद्रमा की उत्पत्ति के बारे में और अधिक स्पष्टीकरण की आवश्यकता है। चांद की सतह को व्यापक बनाकर इसकी संरचना में बदलाव का अध्ययन करने में मदद मिलेगी। चंद्रमा की उत्पत्ति और विकास के बारे में भी कई महत्वपूर्ण सूचनाएं जुटाई जा सकेंगी। वहां पानी होने के सबूत तो चंद्रयान-1 ने खोज लिए थे और चंद्रयान-2 से वहां की सतह की मैपिंग हो गई थी लेकिन चंद्रयान -3 से वहां पर मौजूद जरूरी मिनरल्स का पता लगाया जा सकेगा। 

रोवर सतह से जमा किए गए डेटा लैंडर को भेजेगा। लैंडर के जरिए ये डेटा इसरो के अंतरिक्ष स्टेशन तक पहुंचेगा। रोवर प्रज्ञान चंद्रमा के एक दिन या पृथ्वी के हिसाब से 14 दिनों तक सक्रिय रहेगा। एक चंद्र दिवस के बराबर चंद्रमा की सतह पर रहकर परीक्षण करेगा। चंद्रमा का एक दिन पृथ्वी के 14 दिनों के बराबर है।

लैंडर का भी मिशन जीवनकाल एक चंद्र दिवस ही होगा जबकि ऑर्बिटर आगे भी काम करता रहेगा।  इसमें लगे टेरेन मैपिंग कैमरा से चांद के कई और रहस्यों का पता चल पाएगा। चंद्रयान-3 का लैंडर जहां उतरेगा उसी जगह पर यह जांचेगा कि चंद्रमा  पर भूकंप आते हैं या नहीं। रोवर चंद्रमा के सतह की रासायनिक जांच करेगा कि तापमान और वातावरण में आर्द्रता है कि नहीं। इसरो का टेलीमेट्री, ट्रैकिंग एंड कमांड नेटवर्क चंद्रयान-3 के संपर्क में हैं। 

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चंद्रयान 3 को लेकर बड़ी आशाएं - फोटो : Istock

चांद पर क्या-क्या करेगा चंद्रयान 3

इसरो के अनुसार चंद्रयान-3 चांद के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र में उतरेगा जहां अभी तक कोई देश नहीं पहुंचा है। इसका मकसद, चंद्रमा की जानकारी जुटाना है। ऐसी खोज करना जिनसे भारत के साथ ही पूरी मानवता को फायदा होगा। इन परीक्षणों और अनुभवों के आधार पर ही भावी चंद्र अभियानों की तैयारी में जरूरी बड़े बदलाव होंगे, ताकि भविष्य के चंद्र अभियानों की नई टेक्नोलॉजी को बनाने और उन्हें तय करने में मदद मिले।

चंद्रयान-3 में कुल सात वैज्ञानिक पेलोड है, इनमें चार लेंडर के दी रोवर में तथा एक प्रपल्सन माड्यूल में लगाए गए हैं। लैंडर का वजन 1,752 किलोग्राम है तथा इसमें चार वैज्ञानिक पे लोड शामिल किए गए है। इसमें एक पे लोड चंद्रमा के ध्रुवीय क्षेत्र में चंद्र सतह के तापीय गुणों को मापेगा, जबकि एक अन्य उपकरण की मदद से चंद्रमा पर भूकंपीय गतिविधियों का आकलन होगा।

तीसरे उपकरण लैग्मुइर प्रोब (एलपी) के जरिए चंद्रमा पर प्लाजमा घनत्व तथा इसकी विविधता का आकलन किया जाएगा। चौथा उपकरण, चंद्र सतह पर परिवेश का पता लगाएगा। रोवर में भी दो उपकरण या पेलोड लगे हैं, जो चांद पर मौजूद सतह की विस्तृत पड़ताल करेंगे।

साउथ पोल पर कदम रखने वाला पहला देश बन सकता है भारत

दरअसल, चांद फतह कर चुके अमेरिका, रूस और चीन ने अभी तक चांद के साउथ पोल पर कदम नहीं रखा है। चांद के इस भाग के बारे में अभी बहुत जानकारी भी सामने नहीं आ पाई है। भारत के चंद्रयान-1 मिशन के दौरान साउथ पोल में बर्फ के बारे में पता चला था। तभी से चांद के इस हिस्से के प्रति दुनिया के देशों की रुचि जगी है।

भारत इसबार के मिशन में साउथ पोल के नजदीक ही लैंड करेगा। ऐसे में माना जा रहा है कि भारत मिशन मून के जरिए दूसरे देशों पर बढ़त हासिल कर लेगा। कहा जा रहा है कि चंद्रयान-3 के जरिए भारत एक ऐसे अनमोल खजाने की खोज कर सकता है जिससे न केवल अगले करीब 500 साल तक इंसानी ऊर्जा जरूरतों को पूरा किया जा सकता है बल्कि खरबों डॉलर की कमाई भी हो सकती है। 

चांद से मिलने वाली यह ऊर्जा ने केवल सुरक्षित होगी बल्कि तेल, कोयले और परमाणु कचरे से होने वाले प्रदूषण से मुक्त होगी। स्पेक्टोमीटर (एपीएक्सएस) की मदद से सात धातुओं की खोज का भी प्रयास रहेगा। इनमें मैग्नीशियम, सिलिकॉन, पोटेशियम, कैल्शियम, टाइटेनियम, आयरन तथा एलुमिनियम शामिल है। इस उपकरण से निकलने वाली किरणें इन धातुओं को खोजने का प्रयास करेंगी।

इसके पीछे मकसद यह देखना है कि क्या वहां ऐसी धातुएं अभी हैं या कभी थीं, जो इंसानी जीवन के लिए महत्वपूर्ण हैं। इससे चंद्रमा की संरचना को समझने में भी मदद मिलेगी। धातुओं से ही यह पता चलेगा कि चांद इंसानी जीवन के लिए कितना उपयोगी है।

मिशन चंद्रयान-3 में भारत के लिए चुनौतियां भी कम नहीं हैं। भारत दूसरी बार चांद की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करेगा। चांद पर सफल लैंडिंग करते ही भारत ऐसा करने वाले अमेरिका, रूस और चीन के साथ चौथा देश हो जाएगा।  कुल मिलाकर चंद्रयान 3 मिशन की सफलता भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है साथ ही यह मिशन भविष्य में अंतरिक्ष शोध की नई संभावनाओं को भी जन्म देगा।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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