बांग्लादेश में आज जो हालात हैं उनके लिए जिम्मेदार बांग्लादेशी नए शासकों को उनकी आजादी में भारत के योगदान की याद दिलाने के लिए 1971 के विश्व का राजनीतिक भूगोल बदलने वाले भारत -पाक युद्ध की 53 वीं वर्षगांठ आ गई है। बांग्लादेश के नए शासक कृतघ्नता की हदें पार कर चुके हैं। वे भूल गए कि भारत को उनकी आजादी की कीमत कितनी मंहंगी पड़ी थी।
1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध न केवल भारत और पाकिस्तान के लिए, बल्कि बांग्लादेश के लिए भी एक ऐतिहासिक निर्णायक पल था। भारत ने बांग्लादेश को स्वतंत्रता दिलाने में अहम भूमिका निभाई, और दोनों देशों के बीच गहरे सांस्कृतिक और राजनीतिक रिश्ते बने। हालांकि, वर्तमान में कुछ कारणों से बांग्लादेश में भारत के प्रति विरोध का रुख बढ़ा है, यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि बांग्लादेश की स्वतंत्रता में भारत का योगदान अभूतपूर्व था और इसे हमेशा याद किया जाएगा।
1971 का युद्ध भारत के लिए एक एक आर्थिक संकट छोड़ गया था। युद्ध की वजह से भारतीय सरकार को अपनी सैन्य क्षमताओं को बढ़ाने और युद्ध के दौरान संसाधनों की आपूर्ति को सुनिश्चित करने के लिए भारी खर्च करना पड़ा। इसके साथ ही, भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध में अपनी सैन्य शक्ति को मजबूत किया, जिससे युद्ध का खर्च अत्यधिक बढ़ गया।
युद्ध समाप्त होने के बाद भी, भारत को अपने सेना के पुनर्निर्माण और युद्ध के बाद की स्थिति को संभालने में मुश्किलों का सामना करना पड़ा। इस आर्थिक हानि की कीमत भारतवासियों को दशकों तक अतिरक्ति कर भुगतान करने से चुकानी पड़ी थी।
भारत में बांग्लादेश के स्वतंत्रता संग्राम और पाकिस्तान द्वारा दमनकारी कार्रवाईयों के कारण लाखों बांग्लादेशी शरणार्थी भारत में आ गए थे। 1971 में भारत के पश्चिम बंगाल, असम और त्रिपुरा जैसे राज्यों में शरणार्थियों का भारी प्रवाह हुआ। इन शरणार्थियों का बोझ भारतीय संसाधनों पर पड़ा, और यह आर्थिक और सामाजिक संकट का कारण बना। भारत ने इन शरणार्थियों की मदद की, लेकिन इससे भारतीय राज्यों में भी अस्थिरता बढ़ी।
भारत को बांग्लादेश के स्वतंत्रता संग्राम में हस्तक्षेप करने से पहले अंतरराष्ट्रीय समुदाय का कड़ा विरोध और पाकिस्तान के साथ कूटनीतिक तनाव का सामना करना पड़ा। युद्ध के बाद भी, भारत को अंतरराष्ट्रीय दबाव का सामना करना पड़ा, खासकर अमेरिका और चीन की प्रतिक्रिया के रूप में, जिन्होंने पाकिस्तान के समर्थन में बयान दिए थे। इन परिस्थितियों में भारत को अपने कूटनीतिक और सामरिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए कई राजनीतिक संघर्षों का सामना करना पड़ा।
हालांकि भारत ने बांग्लादेश की स्वतंत्रता में निर्णायक भूमिका निभाई, लेकिन बाद में भारतीय-बांग्लादेशी रिश्तों में कुछ तनाव भी उभरे। पाकिस्तान से बांग्लादेश की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, भारत और बांग्लादेश के बीच कुछ मतभेद उभरे, विशेष रूप से सीमा मुद्दों और अन्य कूटनीतिक विषयों पर। हालांकि, भारत-बांग्लादेश के रिश्ते सामान्य रहे, लेकिन समय-समय पर विभिन्न राजनीतिक कारणों से तनाव पैदा होता रहा।
कुल मिला कर देखा जाय तो बांग्लादेश की स्वतंत्रता के लिए भारत को जो कीमत चुकानी पड़ी, वह केवल युद्ध में हुई हानि तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह एक व्यापक संघर्ष था जिसमें सैनिकों की शहादत, आर्थिक दबाव, शरणार्थी संकट और कूटनीतिक चुनौतियां शामिल थीं। इसके बावजूद, भारत का योगदान बांग्लादेश की स्वतंत्रता के लिए अमूल्य था, और इस संघर्ष ने भारतीय सैन्य और कूटनीतिक शक्ति को नई पहचान दी।
1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भारत ने पाकिस्तान की सेना 91,000 सैनिकों को युद्ध बंदी बना लिया था। यह संख्या युद्ध के बाद एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में सामने आई, क्योंकि यह भारत के लिए एक ऐतिहासिक विजय थी। पाकिस्तान के लिए यह एक बड़ा झटका था, क्योंकि इतनी बड़ी संख्या में सैनिकों का आत्मसमर्पण न केवल उनकी सैन्य शक्ति को कमजोर करता था, बल्कि यह पाकिस्तान के लिए एक मानवीय और मानसिक आघात भी था।
भारत ने इन बंदियों को युद्ध के बाद उचित मानवीय व्यवहार दिया और उन्हें उनके अधिकारों के अनुसार रखा। इसके बाद, शिमला समझौता (1972) के तहत, पाकिस्तान ने इन युद्ध बंदियों को भारत से वापस लेने का वचन दिया। शिमला समझौता, जो भारत और पाकिस्तान के बीच 1971 के युद्ध के बाद हुआ, के तहत पाकिस्तान ने इन बंदियों को भारत को सौंपा। यह समझौता दोनों देशों के बीच संबंधों को सामान्य करने की दिशा में एक कदम था।
बांग्लादेश की स्वतंत्रता के लिए 1971 में भारत द्वारा पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध में संलग्न होने के कारण भारतीय सरकार ने वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता को पूरा करने के लिए ‘‘सुरक्षात्मक कर’’ (डिफेंस टैक्स) और ‘‘बांग्लादेश मुक्तिवाहिनी सहायता कर’’ जैसे विशेष कर लगाए थे। यह कर मुख्य रूप से युद्ध के खर्च को पूरा करने के लिए थे।‘‘बांग्लादेश स्वतंत्रता युद्ध कर’’ कहा गया। 1971 के युद्ध में भारतीय सैन्य बलों की काफी भारी लागत आई थी। युद्ध में भाग लेने के लिए भारतीय सेना को सैन्य उपकरण, आपूर्ति और अन्य आवश्यक वस्त्रों के लिए वित्तीय संसाधनों की जरूरत थी।
इसमें युद्ध सामग्री, सैनिकों के लिए वेतन, साजो-सामान, शरणार्थियों के लिए सहायता आदि की व्यवस्था शामिल थी। इसके अतिरिक्त, आयकर में वृद्धि की गई। खासकर उच्च आय वाले व्यक्तियों से अधिक कर वसूला गया। यह कदम सरकार ने अपने सैन्य खर्चों और शरणार्थियों के पुनर्वास तथा युद्ध से संबंधित अन्य खर्चों को पूरा करने के लिए उठाया था। यह कर 1971 से 1973 तक लागू था।
इस अवधि के दौरान भारतीय जनता पर अतिरिक्त कर भार डाला गया, जो युद्ध की आवश्यकताओं और देश की सुरक्षा को बनाए रखने के लिए जरूरी था। हालांकि, टैक्स का आकार और दायरा सरकार की जरूरतों के हिसाब से बढ़ाया गया।
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