क्यों चिंतित है अमेरिका?
दरअसल, यह अमेरिका और बोइंग के लिए किसी वज्रपात से कम नहीं है। तथ्य चाहें जो हों, लेकिन यह घटना दुनिया की व्यापारिक संरचना में व्यापक बदलाव लेकर आई है। इसके बाद लगातार बोइंग यात्री विमान का दुर्घटनाग्रस्त होना हो सकता है संयोग हो, लेकिन इसके पीछे ट्रेड वॉर की रणनीति की भी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।
अति पुरानी तकनीक से बने मिग-21 ने अत्याधुनिक तकनीक की संरचना वाले एफ-16 को मार कर गिरा देना, यह भी कोई सामान्य घटना नहीं है। हालांकि भारतीय मीडिया ने यह प्रचारित करने की कोशिश की थी कि अमेरिका ने पाकिस्तान को कुछ करार के बाद एफ-16 बेचे थे, जिसमें आतंकी गतिविधि भी एक मुद्दा था और इसीलिए अमेरिका ने पाकिस्तान के खिलाफ जांच के आदेश दिए हैं, लेकिन बात कुछ और ही थी। चूंकि अमेरिकी कंपनी के द्वारा बने अत्याधुनिक लड़ाकू विमान को भारत ने उस मिग-21 विमान से मार गिराया, जिसका निर्माण रूस ने किया है। इसके कारण अमरिकी लड़ाकू हथियार पर प्रश्न खड़े होने लगे हैं और इसका सीधा फायदा रूस को हुआ है। इस घटना के बाद अमेरिका का हथियार मार्केट खराब हुआ है।
भारत-अमेरिका-चीन और रूस की स्थिति
आपको यह जानना जरूरी है कि इन दिनों रूस और चीन एक मंच पर हैं। पाकिस्तान इस गुटबंदी का हिस्सा बन गया है और डोनाल्ड ट्रंप के आर्थिक राष्ट्रवाद ने भारत को भी नाराज कर दिया है। हालांकि भारत-पाक के बीच गतिरोध पारंपरिक है, लेकिन हालिया गतिरोध के बाद जो वैश्विक मंच पर नफा-नुकसान का गणित प्रस्तुत हुआ है उससे इस आशंका को बल मिलने लगा है कि चीन-अमेरिका ट्रेड वॉर ने भारत-पाक गतिरोध को नये ढंग से परिभाषित करना प्रारंभ कर दिया है।
यह आशंका और मजबूत तब हो गई जब एफ-16 के धराशायी होते अमेरिका ने भारत के खिलाफ कड़ा रुख अख्तियार कर लिया। कई व्यापारिक समझौते रद्द कर दिए हैं और कई मामलों में आंख दिखाना प्रारंभ कर दिया, लेकिन इस खेल में अमेरिका बैकफुट पर दिख रहा है और यही कारण है कि अजहर मसूद के मामले में चीनी रणनीति का विरोध कर भारतीय मानस का वह मन जीतना चाहता है। हालांकि चीन ने उसे वहां भी मात देने की पूरी योजना बना रखी है।
विश्व के शक्ति का केन्द्र बड़ी तेजी से बदल रहा है।
- फोटो : फाइल फोटो
इधर दुनिया के कई आर्थिक रूप से संपन्न देशों ने चीन की वन बेल्ट पॉलिसी को ओके कर दिया है। इटली भी उसमें से एक है। इधर सउदी अरब, तुर्की आदि कई प्रभावशाली देशों ने अमेरिका से दूरी बनाना प्रारंभ कर दिया है। अमेरिका अब अपने बुने जाल में खुद फंसने लगा है। ऐसी परिस्थिति में भारत को अपने ढंग से अपनी विदेश नीति का एजेंडा तय करना होगा। कुछ बातें ऐसी होती हैं जिसका कोई महत्व दिखाई नहीं देता है, लेकिन उसी के ईद-गिर्द बातें घूमती रहती हैं।
इससे दो बातें तो समझ में आती है कि वर्तमान समय में जो संकट बोइंग के सामने है उसके पीछे केवल तकनीकी कारण ही नहीं अपितु कुछ राजनीतिक और कुछ व्यापारिक कारण भी हैं। हालांकि अभी स्थितितियां स्पष्ट नहीं हुई हैं और दुनिया में एक नए प्रकार का माहौल बनने लगा है। चीन बेहद ताकतवर देश बनकर उभरा है। अमेरिका चीनी उभार से खुश नहीं दिख रहा है। अमेरिका यह सोच रहा है कि चीन की दादागीरी यदि चलती रही तो एक दिन दुनिया का व्यापारिक शहंशाह अमेरिका या कोई अन्य देश नहीं चीन बन जाएगा।
क्यों बदल रहे हैं विश्व शक्ति के केंद्र?
कुल मिलाकर देखें तो विश्व के शक्ति का केन्द्र बड़ी तेजी से बदल रहा है। निःसंदेह आने वाले समय में आतंकवाद की परिभाषा भी बदलेगी। पाकिस्तान में चीन का निवेश बढ़ रहा है। यह आने वाले समय में और बढ़ेगा। यही नहीं विगत् दिनों रूस ने भी पाकिस्तान के साथ हथियारों का समझौता किया है। हालांकि रूस ने भारत को इस समझौते को लेकर आश्वस्त किया है और विश्वास दिलाया है कि इससे भारत को डरने की जरूरत नहीं है, लेकिन क्षणिक व राजनीतिक स्वार्थ को लेकर भारत को कुछ वैश्विक गलतियों से बचना चाहिए। जैसे हाल ही में भारत-पाकिस्तान के बीच उभरे मतभेद को लिया जा सकता है।
इस मतभेद में भारत ने जिस जल्दबाजी में कूटनीतिक निर्णय लिए उसके परिणाम नकारात्मक भी हो सकते थे। वर्तमान में न तो भारत 1947 वाला भारत है और न ही पाकिस्तान। पाकिस्तान की सामरिक स्थित हो सकती है बुरी हो, लेकिन वह जिस भौगोलिक स्थिति पर स्थित है वह बेहद महत्वपूर्ण है। फिर वह अभी अमेरिका, चीन, सउदी अरब, रूस जैसे प्रभावशाली देशों को साध रखा है। आर्थिक मोर्चे पर वह कमजोर हो सकता है लेकिन कूटनीतिक मोर्चे पर उसकी स्थिति तत्काल ज्यादा मजबूत हो गई है। भारत को इन सारी चीजों पर भी विचार करना चाहिए।
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