पाक को लगा वह श्रीनगर से कश्मीर के राजा हरि सिंह को भगाकर कश्मीर पर कब्जा कर लेगा
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पहली जंग आजादी के तुरंत बाद 1948 की है जिसमें पाकिस्तान ने पेशावर के कमीश्नर की मदद से कबायलियों को कश्मीर फतह के लिए भेजा था। तब कश्मीर पूरी तरह आजाद था और उसका न भारत से विलय हुआ था न पाकिस्तान से। पाक को लगा वह श्रीनगर से कश्मीर के राजा हरि सिंह को भगाकर कश्मीर पर कब्जा कर लेगा क्योंकि राजा के पास अपनी सेना नहीं है।
राजा के जासूसों ने उन्हें खबर दी और कबायलियों के श्रीनगर पहुंचने से पहले ही राजा रातों-रात सच में नीचे जम्मू भाग गए। लेकिन पाकिस्तान का दांव उलटा पड़ गया। राजा ने भारत से विलय-पत्र पर दस्तखत कर के भारतीय सेना को मदद के लिए बुला लिया।
हमारी सेना ने उन्हें खदेड़ दिया। इस तरह से पाक ने इस जंग की भारी कीमत चुकाई और कश्मीर हमेशा के लिए पाकिस्तान के हाथ से फिसल गया। इस जंग में हमारा नुकसान ये हुआ कि हमने कश्मीर का बलूचिस्तान वाला हिस्सा खो दिया जिसे अब पीओके यानी पाक के कब्जे वाला कश्मीर कहते हैं।
भारतीय नेताओं को लगता था कि कश्मीर के इतने बड़े हिस्से को पालना और सुरक्षा देना मुश्किल था।
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भारतीय सेना को आगे बढ़ने से रोक दिया गया था, क्योंकि तब भारतीय नेताओं को लगता था कि कश्मीर के इतने बड़े हिस्से को पालना और सुरक्षा देना मुश्किल था।
कश्मीर में जरूर कारगिल से लेकर श्रीनगर तक सेना की स्थायी छावनियां बना दी गई जो तब से लेकर आज तक बरकरार हैं, क्योंकि भारतीय नेता जानते थे कि पाकिस्तान उस तरफ से कभी भी भौंचक्का कर देने वाला हमला करके कश्मीर को अपने कब्जे में कर सकता है।
दूसरी बार पाकिस्तान ने भारत से जंग की जुर्रत 1965 में की, तब नेहरूजी का इंतकाल हो चुका था। तीन साल पहले 62' की चीन से जंग हम हार चुके थे। धोती कुर्ता पहनने वाले नाटे कद के लाल बहादुर शास्त्री भारत के प्रधानमंत्री बने थे, जिन्हें पाकिस्तानी हुक्मरान देहाती और कमजोर समझते थे।
कश्मीर में अस्थिरता थी क्योंकि वहां के नेता शेख अब्दुल्ला को भारत ने देशद्रोह के इल्जाम में कश्मीर के एक शानदार कॉटेज में नजरबंद कर लिया था, जहां से कश्मीर का वादियां बड़ी खूबसूरत दिखती थीं। उस जमाने में पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल अयूब खान हुआ करते थे जिन्होंने पाक में पहली बार सैन्य विद्रोह की रिवायत शुरू कर सत्ता हथियाई थी। पाकिस्तान के युवा लेकिन अपनी नासमझी के लिए चर्चित नेता बिलावल भुट्टो के नाना जुल्फीकार अली भुट्टो उनके विदेश मंत्री थे।
कहते हैं विदेश मंत्री भुट्टो के बहकाने पर तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खान ने कश्मीर के तत्कालीन माहौल का फायदा उठाते हुए अपनी फौज को कश्मीरी लिबास पहनाकर युद्धविराम की सरहद पार करके कश्मीर में अराजकता फैलानी शुरू कर दी। ये कुछ कुछ 1948 जैसी ही साजिश थी। ताकि लगे कि शेख के कैद होने से कश्मीर में बगावत हो गई है।
रेडियो पाकिस्तान बार-बार यही चिल्ला रहा था कि कश्मीर में जनविद्रोह हो गया है, जैसे वो आजकल धारा 370 हटने के बाद कश्मीरयों पर जुल्म की कहानियां सुना रहा है। लेकिन सच ये है कि जमीन पर ऐसा कुछ नहीं था। कई पाक घुसपैठियों को तो कश्मीरियों ने ही पकड़ कर पुलिस के हवाले किया था। अपनी तमाम कोशिश नाकाम होती देख पाक ने प्लान बी के तहत 'ऑपरेशन ग्रांड स्लैम' शुरू किया, जिसके तहत वह अमेरिकी तोपें लेकर अखनूर के पास तक घुसते चले आए।
अखनूर जम्मू से कुछ ही किलोमीटर दूर है जहां आज भी सेना का एक बड़ा मुख्यालय है।
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अखनूर जम्मू से कुछ ही किलोमीटर दूर है जहां आज भी सेना का एक बड़ा मुख्यालय है। पाकिस्तान का इरादा जम्मू की उस अकेली सड़क पर कब्जा करना था जो उसे भारत से जोड़ती है।
इस सड़क पर कब्जा करते ही जम्मू कश्मीर भारत से कट जाता। ये बेहद खतरनाक चाल थी। हमला अचानक हुआ था। वहां हमारी जमीनी सेना इतनी जल्दी नहीं पहुंच सकती थी। सो भारतीय वायुसेना ने पाक टैंकों पर बमबारी शुरू कर दी। लेकिन वे आगे बढ़ते आ रहे थे।
भारत पर जबरदस्त दबाव था। लेकिन भारत की बहादुर फौज ने पंजाब की तरफ से लड़ाई का नया मोर्चा खोल दिया। भारतीय सेना टैंक लेकर धड़धड़ाते हुए पाकिस्तान की सीमा में घुस गई।
ऐसा पहली बार हुआ था जब भारतीय सेना ने भारत-पाक की नियंत्रण रेखा पार की, इसीलिए पाक कहता है कि युद्ध भारत ने शुरू किया क्योंकि उसने अंतरराष्ट्रीय सीमा पहले क्रास की। और मजा देखिए। भारत पंजाब की तरफ से पाकिस्तान के अंदर तक घुस जाएगा, इसकी अयूब और भुट्टो ने कल्पना तक नहीं की थी। उनकी सारी फौज तो जम्मू-कश्मीर की सरहद पर लगी थी।
भारतीय सेना लाहौर के बॉर्डर पर आकर रुक गई थी।
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पाकिस्तान के होश तब उड़ गए जब बीबीसी ने खबर चला दी की भारतीय सेना तो लाहौर के जिमखाना क्लब में पहुंच कर पटियाला पैग लगा रही है। एक अफवाह ये भी फैली कि भारतीय सेना ने लाहौर हवाई अड्डे और लाहौर रेडियो स्टेशन पर कब्जा कर लिया है। इस खबर से भारत में खुशी और उत्साह की लहर दौड़ गई।
भारत के पत्रकारों पर बड़े राष्ट्रवाद का बुखार चढ़ गया था। वे शाम की प्रेस ब्रीफिंग में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता से पूछ रहे थे कि सच क्या है? क्या हमने लाहौर पर कब्जा कर लिया है? उधर से नो कमेंट का जवाब आता।
65' की जंग की कहानी सुनाते हुए उस मोर्चे में शामिल एक तत्कालीन ले. जनरल ने मुझे एक निजी बातचीत में बताया कि दरअसल हमारी सेना लाहौर के बॉर्डर पर आकर रुक गई थी। क्योंकि हम हैरत में थे कि हम इतना अंदर आ गए और हमें रोकने पाकिस्तानी सेना अभी तक क्यों नहीं आई?
भारतीय सेना को लगा कि यह पाकिस्तान कोई ट्रैप या जाल है। जबकि सच यह था कि तब तक पाकिस्तान को यह खबर तक नहीं थी। पाक सेना इस मोर्चे पर करीब 18 घंटे बाद पहुंची। पंजाब की उस जमीन पर तब टैकों का बड़ा युद्ध हुआ। कहते हैं इतनी गोलाबारी दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पहली बार दुनिया के किसी युद्ध में हुई थी। तब तक संयुक्त राष्ट्र सक्रिय हो गया था।
1965 में सितम्बर के इसी महीने में सुरक्षा परिषद की आपात बैठक के बाद संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप के बाद लड़ाई बंद हुई। दोनों सेनाएं जहां थी वहीं रुक गईं।
इस दूसरी जंग की कीमत पाकिस्तान को ताशकंद समझौते के रूप में चुकानी पड़ी, जिसमें पाकिस्तान को कश्मीर मसले के अंतरराष्ट्रीय समाधान की मांग छोड़नी पड़ी और अखनूर से पीछे हटना पड़ा। और बदले में भारत ने पाक के जीते हुए लौहर के इलाके छोड़ने पड़े। ये पाक के लिए एक शर्मनाक समझौता था।
हालांकि इस ताशकंद समझौते के बाद ही, वहीं ताशकंद में ही हमारे प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री जी की रहस्यमयी रूप से मृत्यु हो गई थी।
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