किसे चुनेगा बांग्लादेश, भारत या फिर चीन बांग्लादेश में जिस तरह की अस्थिरता पैदा हुई है, उसके बाद से ढाका आज दक्षिण एशियाई राजनीति के एक चौराहे पर खड़ा है। बांग्लादेश आज दो परस्पर विरोधी क्षेत्रीय सहयोग मॉडलों के केंद्र में खड़ा है, एक तरफ है भारत और दूसरी ओर है चीन। एक ओर भारत है, जिसके साथ ऐतिहासिक मित्रता, विश्वास और विकास-साझेदारी का एक इतिहास है। दूसरी ओर चीन है, तेज रफ्तार निवेश, लेकिन उसके साथ छिपी शर्तें और रणनीतिक पकड़।
बांग्लादेश किस रास्ते को चुनता है, यही उसके आर्थिक भविष्य और भू-राजनीतिक दिशा को तय करेगा। भारत और बांग्लादेश के रिश्ते को 1971 की मुक्ति संग्राम से अलग नहीं किया जा सकता। स्वतंत्रता संग्राम में समर्थन देने के बाद से भारत ने हमेशा पड़ोसी देश के साथ सहयोगात्मक विकास, सीमा प्रबंधन, जल बंटवारे और जन-जन के रिश्तों को प्राथमिकता दी है। पिछले एक दशक में भारत ने बांग्लादेश को 9.5 अरब डॉलर से अधिक की रियायती क्रेडिट लाइन दी, जो किसी भी एकल देश के लिए सबसे बड़ी राशि है। इसके जरिये पावर प्लांट, सड़क और रेल संपर्क, नदी परिवहन जैसे प्रोजेक्ट खड़े हुए।
रामपाल मैत्री सुपर थर्मल पावर प्रोजेक्ट (बांग्लादेश के बागेरहाट जिले में 1,320 मेगावाट (2 यूनिट × 660 मेगावाट) क्षमता: का कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्र।), साझा नदी-खोदाई कार्यक्रम और क्रॉस-बॉर्डर रेल लिंक भारत की दीर्घकालिक सोच का उदाहरण हैं। बुनियादी ढांचे से परे भी भारत ने शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक क्षेत्रों में मदद की है। हज़ारों बांग्लादेशी छात्र छात्रवृत्ति पर भारत में पढ़ते हैं, जबकि भारतीय अस्पताल इलाज के लिए पहली पसंद बने हुए हैं। बॉर्डर हाट्स स्थानीय अर्थव्यवस्था को सहारा देते हैं और ऊर्जा ग्रिड साझा समृद्धि सुनिश्चित करते हैं। इन पहलों को लोग साझेदारी मानते हैं, न कि किसी छिपे एजेंडे का हिस्सा।
दूसरी ओर, हाल के वर्षों में चीन का असर बांग्लादेश में बढ़ा है। बंदरगाह आधुनिकीकरण, औद्योगिक ज़ोन और आधारभूत संरचना के बड़े-बड़े वादों के साथ बीजिंग ने अपनी मौजूदगी गहरी कर रहा है। लेकिन इसके साथ कई शर्तें भी जुड़ी रहती हैं। चीनी कर्ज़ अक्सर सरकारी कंपनियों को ठेके देने के साथ आता है, जिससे निर्भरता का चक्र बनता है।
श्रीलंका के हम्बनटोटा बंदरगाह की तरह "ऋण-जाल" की आशंका बार-बार उठती है। प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) में भी चीन का वादा ज़्यादा और डिलीवरी कम रही है। 2024 में चीन ने सिर्फ़ 208 मिलियन डॉलर का निवेश किया, जबकि वियतनाम ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में इससे दस गुना ज्यादा हासिल किया। बीजिंग का मकसद साफ़ है, बंगाल की खाड़ी तक पहुंच, नया बाजार और भारत-चीन प्रतिद्वंद्विता में बढ़त। लेकिन ढाका के लिए खतरा यह है कि अल्पकालिक लाभ कहीं दीर्घकालिक संप्रभुता को कमजोर न कर दे।
देखने वाली बात है कि भारत और चीन के बीच सबसे बड़ा फर्क उनकी सोच में है। भारत सहयोग चाहता है-बिम्सटेक और बीबीआईएन जैसे ढांचों के जरिये ऊर्जा, परिवहन और सुरक्षा में साझेदारी। उसका मॉडल पारदर्शी है और ऋण का बोझ नहीं डालता। वहीं चीन का तरीका है-दबाव और नियंत्रण। बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के तहत वह बड़े निवेश तो दिखाता है, लेकिन इसके जरिये बंदरगाहों, ऊर्जा और औद्योगिक पार्कों पर पकड़ मजबूत करता है। सतह पर विकास और अंदर रणनीतिक हित-यही वजह है कि बांग्लादेशी जनता के मन में संशय बना रहता है।
निश्चित रूप से दो महाशक्तियों के बीच बांग्लादेश के लिए राह आसान नहीं। भारत साझेदारी और भरोसे का प्रतीक है, जबकि चीन संसाधनों और बड़े प्रोजेक्ट्स का वादा लेकर आता है। जनता की नज़र में भारत की मदद सहयोगात्मक और सच्ची लगती है। चीन के निवेश को लेकर उत्सुकता तो है, लेकिन साथ ही शंका भी-अल्पकालिक लाभ, दीर्घकालिक खतरा। ढाका को अपने हितों को ध्यान में रखते हुए सतर्कता से रास्ता चुनना होगा। अर्थव्यवस्था में विविधता, तकनीकी क्षमता का निर्माण और विदेशी निवेश को नए अवसरों में लगाना ही स्थायी समाधान होगा।
अगर यूं कहें कि बांग्लादेश में भारत और चीन की प्रतिस्पर्धा दो अलग-अलग मॉडल दिखाती है। भारत देता है साझेदारी-इतिहास और विश्वास पर टिकी, लोगों को जोड़ने वाली। चीन देता है निवेश-आकर्षक मगर रणनीतिक मकसद से बंधा हुआ। ढाका के सामने विकल्प सीधा नहीं है, लेकिन दांव बड़ा है-विकास, स्थिरता और संप्रभुता। और इन तीनों के लिए भारत का मॉडल कहीं ज्यादा मेल खाता है बांग्लादेश की आकांक्षाओं से, क्योंकि असली मित्रता और सुनियोजित रणनीति में फर्क साफ़ दिखता है।
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