भारत और नेपाल के बीच संबंध केवल पड़ोस के नहीं बल्कि संस्कार के भी हैं।
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दरअसल, भारत ओर नेपाल के प्राचीन संबंध रहे हैं। संबंधों की यह डोर इतनी महीन और गहरी है कि यह संबंध बेटी-रोटी का संबंध है। यह संबंध ब्याह-शादी के हैं, रक्षा के बंधन के हैं और उत्सव और त्योहारों के हैं।
भारत में तकरीबन 30 लाख से ज्यादा नेपाली रहते हैं और उन्हें यहां रहने, यहां की सेना में शामिल होने और सीमाओं में बिना किसी पहचान-पत्र और दस्तावेज के प्रवेश कर भारत में घर बनाने तक के अधिकार हैं।
यहां के शहरों में नेपालियों के नाम जमीन-जायदाद और संपत्ति है। घर हैं रिश्तेदार हैं। जाहिर है एक सामान्य नेपाली जिसे भारत में सभी सुविधाएं मिल रही हैं, जिसे दूसरे देश में भी अपने घर जैसा अनुभव हो रहा है तो उसके लिए भारत-नेपाल सीमा का कोई वास्तविक अर्थ नहीं हो सकता है।
संपत्ति और सुरक्षा के अधिकार बिल्कुल उसी तरह हैं जैसे भारत में एक भारतीय नागरिक की तरह रहते हैं ऐसे में लिपुलेख और कालापानी के नक्शे केवल सियासी शोर में जाकर विलीन हो जाते हैं।
बात यदि नक्शे पर दिखाए गए इलाकों की भी करें तो कालापानी क्षेत्र में रह रहे लोगों को भी नहीं पता की भारत और नेपाल को बांटने वाली सीमा कहां है। जबकि बुधी और गंजी जैसे इलाके साल भर निर्जन ही रहते हैं। जनसंख्या ना के बराबर ही मानें। यहां कोई आता-जाता नहीं।
हां आधी सदी पहले यहां से कुछ लोग मानसरोवर यात्रा में भागीदार थे लेकिन अब वह भी नहीं है। मानसरोवर यात्रा भी अब यहां के स्थानीय लोगों की मदद से कुमाऊं विकास मंडल निगम यानी की KMPN करवाता है।
सुगौली की संधि की बात करें तो नेपाल कूटी यांग्ती को काली नदी मानता है लेकिन भारत जिस जलधारा को काली नदी मानता है वह कालापानी से निकलती है। भारत का दावा है कि 1875 के नक्शे में भी काली नदी का उद्गम कालापानी के पूरब में दिखाया गया था। उस क्षेत्र में काली चट्टानों के कारण नदी का रंग काला नजर आता है, इसलिए नदी को काली, नाम दिया गया है।
यह जलधारा निश्चित रूप से कूटी गाड़ या कूटी यांग्ती से आकार में छोटी अवश्य है, मगर उत्तराखण्ड या भारत ही नहीं बल्कि विश्व में अनेक ऐसी नदियां हैं जिनमें बाद में बड़ी नदियों के मिलने पर भी छोटी नदी का ही मूल नाम आगे चलता है।
उत्तराखण्ड में टौंस नदी यमुना से आकार में कहीं बड़ी है, मगर जब वह देहरादून के निकट डाकपत्थर में यमुना से मिलती है तो अपना नाम खोकर यमुना ही हो जाती है। इसी क्षेत्र में आकार में बड़ी गोरी नदी भी संगम के बाद नाम खो कर कूटी ही हो जाती है।
कुल मिलाकर सुगौली की संधि काली नदी पर आधारित है। इस संधि के अनुसार ये नदी भारत और नेपाल की सीमा का काम करती है। भारत और नेपाल दोनों में इस नदी का बहुत अधिक महत्व है। काली नदी कालापानी से निकलती है, जहां पर एक मंदिर है। प्रत्येक मानसरोवर यात्री कालापानी में रुकता है और मंदिर में दर्शन कर दान-पुण्य करता है।
लोगों में इस जगह के लिए वैसा ही विश्वास है जैसा भारतीय हिंदुओ के लिए गंगा जी और यमुना जी के उद्गम स्थल गंगोत्री और यमुनोत्री के लिए है। एक तरह से नेपाली लोगों का ये मानना है कि कूटी यांग्ती को काली नदी के स्रोत के रूप में माना जाना चाहिए, लेकिन सार्वजनिक तौर पर सुगौली संधि बहुत अलग है।
बहरहाल, देखा जाए तो भारत-नेपाल बॅार्डर विवाद इसलिए भी होता रहता है क्योंकि यहां पर कोई सीमा स्तंभ नहीं हैं। 1961 के चीनी नेपाली समझौते में बॉर्डर पिलर नंबर-1, काली और तिनकर के बीच स्थित है लिम्पियाधुरा में नहीं। कई लोगों का मानना है कि लिम्पियाधुरा से भारत तिब्बत व्यापार किया जाता है परंतु ऐसा नहीं है, भारत- तिब्बत व्यापार हमेशा लिपुलेख से होता है, लिम्पियाधुरा से नहीं। लिपुलेख को भारत तिब्बत संधियों में माल और लोगों के लिए भूमि पारगमन के लिए एक बिंदु के रूप में पहचाना गया है।
नेपाल के लोग भारत में अपना कारोबार करते हैं। भारत के नेपाल के साथ सिर्फ व्यापारिक ही नहीं धार्मिक और सांस्कृतिक रिश्ते भी हैं। इस प्रथा ने हमेशा भारत-नेपाल को एक दूसरे को समझने की अनुमति दी है क्योंकि कालापानी के भारत के मानचित्र में होने के बाद भी नेपाल के किसी व्यक्ति को किसी तरह की कोई परेशानी नहीं है, उन्हें रस्सी के पुल को पार कर भारत में आने से कोई नहीं रोक सकता है। वे भारत आकर व्यापार कर सकते हैं प्रॅाप्रर्टी खरीद सकते हैं।
बताते चलें कि यहां से भारत में प्रवेश करने वालों का भूमि रिकॉर्ड पिथौरागढ़ जिले द्वारा रखा जाता है, नेपाली नागरिकों सहित भूमि का स्वामित्व उत्तराखंड राज्य द्वारा दर्ज किया जाता है और कर सहित भू राजस्व एकत्र किया जाता है।
कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए यहीं से जाना होता है।
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जहां तक पौराणिक मान्यता की बात है स्कंद पुराण और यहां तक की हिमालय गजेटियर्स के अनुसार स्कंदपुराण सहित हर पुराण में ओम पर्वत और आदि कैलास को भारतीय सभ्यता के विचार का केंद्र माना जाता है। नेपाल के वर्तमान राजनीतिक लोगों को यह समझने की आवश्यकता होगी की ऐसा कोई भी प्रस्ताव जो ओम पर्वत को हिंदू/जैन/ सिख तीर्थयात्रियों से दूर ले जाता है, वह इससे ज्यादा समस्याएं पैदा करेगा।
इस बात को ब्रिटिश, तिब्बती और चीनी सरकारें भी अच्छी तरह समझती हैं। इन सब कि शुरुआत 1841 में जोरावर सिंह कहलुरिया के अभियानों के माध्यम से की गई थी।
एडविन टी एटकिंसन केे लिखेे गए हिमालयन गजेटियर्स के (अध्याय 5) में कुमाऊं हिल्स के भूगोल और एंथ्रोपॉलिजी के हिसाब से रिकॉर्ड दस्तावेज में 1817 में संभागों के विभाजन के समय की गई संधि की व्याख्या में विवाद को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया है।
यही नहीं दोटी के गवर्नर कप्तान वेब बेम शाह ने इस बात को निर्णायक रूप से प्रदर्शित भी किया की कालापानी से उत्पन्न होने वाली कम धारा को काली नदी का उद्गम माना जाता था।
बताते चलें कि 4 फरवरी 1817 से 10 अक्टूबर 1817 तक इन रिकॅार्डों को गार्डिनर, नेपाल में पहली ब्रिटिश रेजिडेंट और नेपाल दरबार के बीच पत्राचार में रखा गया था।
लेखक पूूूर्व आईएफएस अधिकारी हैं।
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